अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ पराशरस्मृतिः ॥
मदमोहगतानाारी क्रोधाद्दण्डादिताडिता ।
अद्वितीयंगताचैव पुनरागमनंभवेत् ॥ ३३ ॥
दशमेतुदिनेप्राप्ते प्रायश्चित्तं नविद्यते ।
दशाहंनत्यजेन्नारीं त्यजेन्नष्टप्लुतांतथा ॥ ३४ ॥
भर्त्ताचैवचरेत्कृच्छ्रं कृच्छ्राद्धंचैवबान्धवाः ।
तेषांभुक्त्वाचपीत्वा अहोरात्रेणशुद्ध्यति ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणीतुयदागच्छेत्परपुंसाविवर्जिता ।
गत्वापुंसांशतंयाति त्यजेयुस्तांतुगोत्रिणः ॥ ३६ ॥
पुंसोयदिगृहंगच्छेत्तदशुद्धंगृहंभवेत् ।
पितृमातृगृहंयच्च जारस्यैवतुतद्गृहम् ॥ ३७ ॥
उल्लिख्यतद्गृहंपश्चात्पञ्चगव्येनसेचयेत् ।
त्यजेन्मृन्मयंपात्रं वस्त्रंकाष्ठंचशोधयेत् ॥ ३८ ॥
मद्यादि नशा पीकर वा अज्ञानाहंकार से बिगड़ती हुई स्त्री को क्रोध के साथ पति आदि ने पीटाहो और घरसे निकल जावे परन्तु अन्य पुरुष से संपर्क न होने का पक्का प्रमाण मिले तो उसे फिर अपने घर में रख लेना चाहिये ॥३३॥ यदि स्त्री को घर से निकले दश दिन बीत जावे तो उस का प्रायश्चित्त नहीं होसकता । अर्थात् दश दिन तक न त्यागे और दश दिन के भीतर भी स्वधर्म से नष्ट हुई सुन ले तो अवश्य त्याग देवे ॥ ३४ ॥ जिस की स्त्री बाहर निकल गयी हो वह पति एक कृच्छ्रव्रत करे और स्त्री के भाई आदि आधा कृच्छ्रव्रत करें । तब उन के घर अन्य बिरादरी के लोग खा पीकर एक दिन रात में शुद्ध करें ॥ ३५ ॥ यदि कोई ब्राह्मणी पति आदि के रोकने पर भी अन्य पुरुष के साथ कहीं चली जावे और जाकर सैकड़ों पुरुषों से मेल करे वह फिर भी लौट आना चाहे तो कुटुम्बी लोग उस का त्याग ही कर देवें ॥ ३६ ॥ यदि वह ब्राह्मणी पति के घर में आवे तो वह घर अशुद्ध हो जायगा । और यदि अपने मा बाप के घर में जाके रहे तो वह भी व्यभिचारी जार का घर कहावेगा ॥ ३७ उस घर को ऊपर २ से छील कर फिर से लेपन करके उस में पञ्चगव्य का सेचन करे । उस घर में जितने मट्टी के पात्र हों सब निकाल के फेंक देवे तथा वस्त्रों और काष्ठ के पात्रों की शुद्धि करे ॥ ३८ ॥