अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९३
संभाराञ्छोधयेत्सर्वान्गोकेशैश्चफलोद्द्भवान् ।
ताम्राणिपञ्चगव्येन कांस्यानिदशभस्मभिः ॥ ३९ ॥
प्रायश्चित्तंचरेद्विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम् ।
गोद्वयंदक्षिणांदद्यात्प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ४० ॥
इतरेषामहोरात्रं पञ्चगव्येनशोधनम् ।
सपुत्रःसभृत्यश्च कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ ४१ ॥
उपवासैर्व्रतैःपुण्यैः स्नानसंध्यार्चनादिभिः ।
जपहोमदयादानैः शुद्ध्यन्तेब्राह्मणादयः ॥ ४२ ॥
आकाशंवायुरग्निश्च मेध्यंभूमिगतंजलम् ।
नदुष्यन्तिचदर्भाश्च यज्ञेषुचमसायथा ॥ ४३ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अमेध्यंरेतोगामांसं चाण्डालान्नमथापिवा ।
यदिभुक्तंतुविप्रेण कृच्छ्रंचान्द्रायणंचरेत् ॥ १ ॥
... कर घर के सब सामान की शुद्धि करे तथा फल सम्बन्धी तनादि की शुद्धि गौके बालों से करे । तांबे के पात्रों की पञ्चगव्य के मर्दन से और कांसे के पात्रों की दश प्रकार के भस्मों से शुद्धि करे ॥ ३९ ॥ फिर वह ब्राह्मण विद्वान् ब्राह्मणों की आज्ञानुसार प्रायश्चित्त करे । अर्थात् दो प्राजापत्य व्रत करे और दो गौ दक्षिणा में देवे ॥ ४० ॥ उस घर के अन्य लोग एक दिन रात पञ्चगव्य पीके उपवास द्वारा शुद्धिकरैं। फिर पुत्र और भृत्यादि सहित ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ४१ ॥ सामान्य कर उपवास, व्रत, पुण्य, तीर्थादि में स्नान, देवपूजा, जप, होम, दया, दान, इत्यादि कामों के द्वारा ब्राह्मणादि शुद्ध होते हैं ॥४२॥ आकाश, वायु, अग्नि, शुद्धभूमि में भरा वा नदी में बहता हुआ जल, और दाभ ये पदार्थ नीच के स्पर्शादि से दूषित नहीं होते कि जैसे यज्ञों में सोमरस के चमस उच्छिष्ट नहीं होते ॥ ४३ ॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥
लहसुन आदि अभक्ष्य, वीर्य, गो मांस, चाण्डाल का अन्न, यदि ब्राह्मण इन पदार्थों को खालैवे तो कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत करे ॥ १ ॥
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