अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ पराशरस्मृतिः ॥
तथैवक्षत्रियोवैश्यस्तदर्द्धंतुसमाचरेत् । शूद्रोऽप्येवंयदाभुङ्क्ते प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ २ ॥ पञ्चगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चंपिवेद्द्विजः। एकद्वित्रिचतुर्गावो दद्याद्विप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥ शूद्रान्नंसूतकस्यान्नमभोज्यस्यान्नमेवच । शङ्कितंप्रतिषिद्धान्नं पूर्वोच्छिष्टंतथैवच ॥ ४ ॥ यदिभुक्तंतुविप्रेण अज्ञानादापदापिवा । ज्ञात्वासमाचरेत्कृच्छ्रं ब्रह्मकूर्चंतुपावनम् ॥ ५ ॥ व्यालैर्नकुलमार्जारैरन्नमुच्छिष्टितंयदा । तिलदर्भोदकैःप्रोक्ष्य शुद्ध्येतेनात्रसंशयः ॥ ६ ॥ शूद्रोऽप्यभोज्यंभुक्त्वाऽन्नं पञ्चगव्येनशुद्ध्यति । क्षत्रियोवापिवैश्यश्च प्राजापत्येनशुद्ध्यति ॥७॥ एकपङ्क्त्युपविष्टानां विप्राणांसहभोजने । यद्येकोऽपित्यजेत्पात्रं शेषमन्नंनभोजयेत् ॥ ८ ॥
वैसे ही क्षत्रिय वा वैश्य उक्त पदार्थों को खावे तौ उस से आधा व्रत करे। तथा शूद्र भी उक्त पदार्थों को खावे तो एक प्राजापत्य व्रत करे ॥२॥ फिर शूद्र पञ्चगव्य पीवे और द्विज ब्रह्म कूर्च पीवे। एक,दो,तीन, तथा चार गौओं का दान चारों वर्ण क्रम से करें ॥ ३ ॥ शूद्र का, सूतक वाले का, जिस के अन्न का निषेध किया है उसका, जिसमें अपवित्र होने की शंका होगयी हो, जिस (वामी आदि) का खाना मना किया हो, और जो पहिले भोजन करने से बचा हो ॥ ४ ॥ ऐसा पूर्वोक्त शूद्रादि का अन्न ब्राह्मण ने अज्ञान से वा आपत्काल में यदि खाया हो तो जानलेने पर कृच्छ्रव्रत करे और ब्रह्मकूर्च भी पवित्र करने वाला है ॥५॥ जिस अन्नमें से सांप, न्योला और बिलाव ने कुछ खाके उच्छिष्ट कर दिया हो उस पर तिल और दाभ मिलाये जल से मार्जन करने से निःसन्देह शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ शूद्र भी अभोज्य अन्न को खावे तो पञ्चगव्य से शुद्ध होता है। तथा क्षत्रिय और वैश्य भी अशुद्ध वा वर्जित अन्न को खावें तो प्राजापत्य व्र-व्रत करने से शुद्ध होते हैं ॥७॥ एक पांति में बैठ कर एक साथ भोजन करते हुए ब्राह्मणों में से यदि एक मनुष्य भी पत्तल को त्याग देवे तो पङ्क्ति वाले सभी शेष अन्न को उच्छिष्ट समझ कर न खावें ॥८॥ यदि कोई ब्राह्मण अज्ञान