अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ७५
मोहाद्भुञ्जीतयस्तत्र पंक्तावुच्छिष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेद्विप्रः कृच्छ्रं सांतपनंतथा ॥ ९ ॥ पीयूषंश्वेतलशुनं वृन्ताकफलगृञ्जने । पलाण्डुं वृक्षनिर्यासान्देवस्वंकवकानिच ॥ १० ॥ उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरमज्ञानाद्भक्षयेद्विजः । त्रिरात्रमुपवासेन पञ्चगव्येनशुध्यति ॥ ११ ॥ मण्डूकंभक्षयित्वातु मूषिकामंसमेवच । ज्ञात्वाविप्रस्त्वहोरात्रं यावकान्नेनशुध्यति ॥ १२ ॥ क्षत्रियश्चापिवैश्यश्च क्रियावन्तौशुचिव्रतौ । तद्गृहेषुद्विजैर्भोज्यं हव्यकव्येषुनित्यशः ॥ १३ ॥ घृतंक्षीरंतथातैलं गुडंतैलेनपाचितम् । गत्वा नदीतटेविप्रो भुञ्जीयाच्छूद्रभाजने ॥ १४ ॥ मद्यमांसरतंनित्यं नीचकर्मप्रवर्त्तकम् ।
से उस पांतिमें उच्छिष्ट अन्नको खावे तो ब्राह्मण कृच्छ्र सान्तपन व्रत प्रायश्चित्त करे ॥९॥ गिजरी, (दशदिनके भीतरका गोदुग्ध) सफेद लहसुन, बैंगन, गाजर, प्याज, वृक्षोंका गोंद, देवताका धन, कठफूल ॥१०॥ उंटिनीका दूध, भेड़ का दूध इन सब को जो ब्राह्मण अज्ञानसे खावे वह तीन उपवास करके पञ्चगव्य से शुद्ध होता है ॥११॥ मेंढक, चूहा इन का मांस ब्राह्मण जान कर खालेंगे तो एक दिन रात कुलत्थी अन्न खाने से शुद्ध होता है ॥ १२ ॥ जो क्षत्रिय और वैश्य बाहरी भीतरी सब प्रकार की शुद्धि नियम से रखते हुए सन्ध्या तर्पण पञ्चमहायज्ञादि कर्म यथावत् करते हों उन के घरों में देव पितर सम्बन्धी कामों के समय ब्राह्मणों को सदा भोजन करना चाहिये ॥१३॥ घी, दूध, तेल, गुड़, और गुड़ से पकाया कोई पदार्थ हो शूद्र के घर के इन सब को नदी किनारे जाकर शूद्र के पात्र में भी ब्राह्मण खा सकता है ॥ १४ ॥ जो मद्य मांस खाने पीने में तत्पर तथा नीच कर्मों का प्रवर्त्तक हो ऐसे शूद्र को चाण्डाल के तुल्य