अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 407, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ पराशरस्मृतिः ॥
तं शूद्रं वर्जयेद्विप्रः श्वपाकमिव दूरतः ॥ १५ ॥ द्विजशुश्रूषणरतान्मद्यमांसविवर्जितान् । स्वकर्मनिरतान्नित्यं ताञ्शूद्रान्न त्यजेद्द्विजः ॥१६॥ अज्ञानाद्भुञ्जते विप्राः सूतके मृतकेऽपि वा । प्रायश्चित्तं कथं तेषां वर्णैर्वर्णं विनिर्दिशेत् ॥ १७ ॥ गायत्र्यष्टसहस्रेण शुद्धिः स्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पञ्चसहस्रेण त्रिसहस्रेण क्षत्रिये ॥ १८ ॥ ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते प्राणायामेन शुद्ध्यति। अथवा वामदेव्येन साम्नार्केण शुद्ध्यति ॥ १९ ॥ शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं शूद्रवेश्मन आगतम् । पक्वं विप्रगृहे पूतं भोज्यं तन्मनुरब्रवीत् ॥ २० ॥ आपत्काले तु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि । मनस्तापेन शुद्ध्येत द्रुपदां वा शतं जपेत् ॥ २१ ॥
नीच समझ कर ब्राह्मण दूर से त्याग देवे ॥१५॥ मद्य मांस जिन ने त्याग दिये हो ब्राह्मणों की सेवा शुश्रूषा में जो तत्पर हों ऐसे स्वकर्मनिष्ठ शूद्रों का त्याग ब्राह्मण न करे ॥ १६ ॥ जो ब्राह्मण लोग अज्ञान से जन्म सूतक में वा मृतक अशुद्धि में किसी के यहां भोजन करते हैं उन का वर्ण २ में प्रायश्चित्त कैसे हो ॥ १७ ॥ शूद्र के सूतक में किये भोजन पर आठ हजार गायत्री जपने से शुद्धि होती, वैश्य के घर में भोजन करने से पांच हजार गायत्री का और क्षत्रिय के घर में सूतक के समय भोजन करे तो तीन हजार गायत्री का जप करने से शुद्धि होती है ॥ १८ ॥ और ब्राह्मण के घर में सूतक के समय खावे तो प्राणायाम करने से ही शुद्ध हो जाता है । अथवा एक बार वामदेव्य साम का गान करने से शुद्ध हो जाता है ॥ १९ ॥ सूखा अन्न, गोरस, घी, तेल, इन को शूद्र के घर से लाकर ब्राह्मण के घर में पकाने पर भोजन करने योग्य पवित्र होजाता है यह मनु जी ने कहा है ॥२०॥ यदि आपत्काल में ब्राह्मण ने शूद्र के घर में भोजन कर लिया हो तो मन में पश्चात् ताप करने से शुद्ध हो जाता है अथवा (द्रुपदादिव०) मन्त्र को एक सौ जप लेवे ॥ २१ ॥