अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ 99
दासनापितगोपाल-कुलमित्रार्द्धसीरिणः ।
एतेशूद्रेषुभोज्यान्ना यश्चात्मानंनिवेदयेत् ॥ २२ ॥
शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ।
संस्कृतस्तुभवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तुनापितः ॥ २३ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तुयःसुतः ।
सगोपालइतिख्यातो भोज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २४ ॥
वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ।
सह्यार्द्धिकइतिज्ञेयो भोज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २५ ॥
भाण्डस्थितमभोज्येषु जलंदधिघृतंपयः ।
अकामतस्तुयोभुङ्क्ते प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ २६ ॥
ब्राह्मणःक्षत्रियोवैश्यः शूद्रोत्राप्युपसर्पति ।
दास नाम कहार, नाई, आभीर ( अहीर ) अपने कुल का मित्र ( कुल मित्र शब्द का अपभ्रंश कुर्मी हुआ हो यह भी सम्भव है ) खेती में आधा साझी, ये सब शूद्रों में भोजन करने योग्य हैं अर्थात् इन का तथा शरणागत शूद्र का सूखा अन्न आटा दान आदि भोजनार्थ लेने में ब्राह्मण को दोष नहीं लगता है ॥ २२ ॥ ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में जो सन्तान पैदा हो उस का संस्कार यदि ब्राह्मण ने कराया हो तो वह दास ( कहार ) माना जावे और यदि संस्कार न हो तो वह नाई होगा । ( यहां संस्कार पद से ब्राह्मण द्वारा पालन पोषण अर्थ लेना चाहिये ) ॥ २३ ॥ क्षत्रिय पुरुष से शूद्र की कन्या में जो सन्तान पैदा हो उस को गोपाल कहते हैं । ब्राह्मण लोग उस गोपाल का अन्न खा सकते हैं इस में सन्देह नहीं ॥ २४ ॥ क्षत्रिय से वैश्य की कन्या में जो सन्तान पैदा हो और ब्राह्मण उस का संस्कार करे तो वह आर्द्धिक कहाता है और ब्राह्मण लोग उस का अन्न निःसन्देह खावे ॥ २५ ॥ जिन का अन्न खाना वर्जित है उन के पात्र में रक्खा जल, दही, घी, वा दूध इन को जो कामना के बिना खाता है उस का प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥ २६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र यदि उक्त अपराध का प्रायश्चित्त धर्म सभा से