अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषाधर्मसंहिता ॥ 99
दासनापितगोपाल-कुलमित्रार्द्धसीरिणः ।
एतेशूद्रेषुभोज्यान्ना यश्चात्मानंनिवेदयेत् ॥ २२ ॥
शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ।
संस्कृतस्तुभवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तुनापितः ॥ २३ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तुयःसुतः ।
सगोपालइतिख्यातो भोज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २४ ॥
वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेनतुसंस्कृतः ।
सह्यार्द्धिकइतिज्ञेयो भोज्योविप्रैर्नसंशयः ॥ २५ ॥
भाण्डस्थितमभोज्येषु जलंदधिघृतंपयः ।
अकामतस्तुयोभुङ्क्ते प्रायश्चित्तंकथंभवेत् ॥ २६ ॥
ब्राह्मणःक्षत्रियोवैश्यः शूद्रोत्राप्युपसर्पति ।
दास नाम कहार, नाई, आभीर ( अहीर ) अपने कुल का मित्र ( कुल मित्र शब्द का अपभ्रंश कुर्मी हुआ हो यह भी सम्भव है ) खेती में आधा साझी, ये सब शूद्रों में भोजन करने योग्य हैं अर्थात् इन का तथा शरणागत शूद्र का सूखा अन्न आटा दान आदि भोजनार्थ लेने में ब्राह्मण को दोष नहीं लगता है ॥ २२ ॥ ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में जो सन्तान पैदा हो उस का संस्कार यदि ब्राह्मण ने कराया हो तो वह दास ( कहार ) माना जावे और यदि संस्कार न हो तो वह नाई होगा । ( यहां संस्कार पद से ब्राह्मण द्वारा पालन पोषण अर्थ लेना चाहिये ) ॥ २३ ॥ क्षत्रिय पुरुष से शूद्र की कन्या में जो सन्तान पैदा हो उस को गोपाल कहते हैं । ब्राह्मण लोग उस गोपाल का अन्न खा सकते हैं इस में सन्देह नहीं ॥ २४ ॥ क्षत्रिय से वैश्य की कन्या में जो सन्तान पैदा हो और ब्राह्मण उस का संस्कार करे तो वह आर्द्धिक कहाता है और ब्राह्मण लोग उस का अन्न निःसन्देह खावे ॥ २५ ॥ जिन का अन्न खाना वर्जित है उन के पात्र में रक्खा जल, दही, घी, वा दूध इन को जो कामना के बिना खाता है उस का प्रायश्चित्त कैसे हो ? ॥ २६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र यदि उक्त अपराध का प्रायश्चित्त धर्म सभा से
७८ | पराशरस्मृतिः ॥
ब्रह्मकूर्चोपवासेन यथावर्णस्यनिष्कृतिः ॥ २७ ॥
शूद्राणांनोपवासःस्याच्छूद्रोदानेनशुद्ध्यति ।
ब्रह्मकूर्चमहोरात्रं श्वपाकमपिशोधयेत् ॥ २८ ॥
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
निर्दिष्टंपञ्चगव्यंच पवित्रंपापशोधनम् ॥ २९ ॥
गोमूत्रंकृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैवगोमयम् ।
पयश्चताम्रवर्णाया रक्तायागृह्यतेदधि ॥ ३० ॥
कपिलायाघृतंग्राह्यं सर्वंकापिलमेववा ।
मूत्रमेकपलंदद्यादङ्गुष्ठाद्धंतुगोमयम् ॥ ३१ ॥
क्षीरंसप्तपलंदद्याद्दधित्रिपलमुच्यते ।
घृतमेकपलंदद्यात्पलमेकंकुशोदकम् ॥ ३२ ॥
गायत्र्यादायगोमूत्रं गन्धद्वारेतिगोमयम् ।
चाहें तो ब्रह्मकूर्च रूप उपवास से यथा योग्य भिन्न २ प्रकार वर्णों का प्राय- श्चित्त जानो ॥२७॥ शूद्रों के लिये ब्रह्मकूर्चादि का पान वा उपवास करना निषिद्ध है किन्तु शूद्रदान करने से शुद्ध हो जाता है । ब्राह्मणादि द्विज पु- रुष एक दिन रात ब्रह्मकूर्च उपवास करे तो चाण्डाल के तुल्य लगे दोष को भी यह व्रत शुद्ध कर देता है ॥ २८ ॥ (अब तक पूर्व में कई बार ब्रह्मकूर्च उप- वास का प्रसंग आचुका है सो अब यहां से ४० श्लोक तक ब्रह्मकूर्च का विधान कहते हैं सो जहां २ ब्रह्मकूर्च कहा है वहां २ इसी विधान को जान लेना ) गो मूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोदधि, गोग्हृत, और कुशों को पीस कर नि- चोड़ा जल इस प्रकार कुशोदक और पञ्चगव्य का निम्न रीति से सेवन करना परम पवित्र होने से पापों का शोधन करने वाला है ॥ २९ ॥ काली गौ का गोमूत्र लेवे, श्वेत गौ का गोबर लेवे, ताम्र वर्ण गौ का दूध लेवे, लाल गौ का दही ॥ ३० ॥ कपिला गौ का घी लेना चाहिये । अथवा गो मूत्रादि सभी कपिला गौ का लेवे । एक पल ( चार तोला ) गोमूत्र, अपने आधे अंगूठे भर गोबर ॥ ३१ ॥ सात पल ( अट्ठाईश तोला ) गौ का दूध लेवे, तीन पल ( १२ तोला ) दही, एक पल ( ४ तोला ) घी और एक पल कुशोदक लेवे ॥ ३२ ॥ ( तत्सवितु० ) गायत्री से गोमूत्र, ( गन्धद्वारां० ) लक्ष्मीसूक्त के मन्त्र से
भाषार्थसहिता ॥ ९५
आप्यायस्वेतिचक्षीरं दधिक्राव्णस्तथादधि ॥ ३३ ॥
तेजोसिशुक्रमित्याज्यं देवस्यत्वाकुशोदकम् ।
पञ्चगव्यमृचापूतं स्थापयेदग्निसन्निधौ ॥ ३४ ॥
आपोहिष्ठेतिचालोढ्य मानस्तोकेतिमन्त्रयेत् ।
सप्तावरास्तुयेदर्भा अच्छिन्नाग्राःशुक्त्विषः ॥ ३५ ॥
एतैरुद्धृत्यहोतव्यं पञ्चगव्यंयथाविधि ।
इरावतीइदंविष्णुर्मानस्तोकेचशंवतो ॥ ३६ ॥
एताभिश्चैवहोतव्यं हुतशेषंपिवेद्द्विजः ॥ ३७ ॥
आलोड्यप्रणवेनैव निर्मन्थ्यप्रणवेनतु ।
उद्धृत्यप्रणवेनैव पिबेच्चप्रणवेनतु ॥ ३८ ॥
पत्वगस्थिगतंपापं देहेतिष्ठतिदेहिनाम् ।
ब्रह्मकूर्चोदहेत्सर्वं यथेवाग्निरिवेन्धनम् ॥ ३९ ॥
गोबर, (आप्यायस्व समेतु० यजु० अ० १२ । ११२) मन्त्रसे दूध, (दधिक्राव्णोअकारि० यजु० अ० २३ । ३२) मन्त्रसे दही, (तेजोऽसि शुक्रमस्य० यजु० १ । ३१) मन्त्र से घी, (देवस्यत्वा०-हस्ताभ्यां गृह्णामि । यजु०अ० १।२९) मन्त्र से कुशोदक लेवे । इस प्रकार ऋचाओं से पवित्र किये पञ्चगव्य तथा कुशोदक को लेकर अग्निकुण्ड के समीप स्थापित करे ॥ ३३।३४ ॥ फिर (आपोहिष्ठा० यजु० अ० ११ । ५२) इत्यादि तीन मन्त्रों से गोमूत्रादि सब को मिलाके (आलोडन करके) (मानस्तोके० यजु० अ० १६ । १६) मन्त्र से अभिमन्त्रण करे अर्थात् मन्त्र पढ़ता हुआ गोमूत्रादि को देखे । फिर जिसका अग्रभाग न टूटा हो ऐसे ठोकर हरे कम से कम सात दर्भों से ॥ ३५ ॥ कुशोदक सहित पञ्चगव्य को लेर कर निम्न मन्त्रों से यथाविधि होम करे । (इरावती धेनुमती० यजु०अ० ५।१६) (इदं विष्णुर्विच० यजु० अ०५ । १५) (मानस्तोकेतनये० यजु० अ० १६ । १६) और यजु० अ० ३६ के (शंनो मित्रः०) त्यादि शं शब्द वाले मन्त्रों से ॥३६॥ होम करे फिर होमसे शेष बचे भागको निम्न प्रकार पीये ॥३७॥ ओंकार से आलोडन कर ओंकार से मन्थन कर ओंकार से ही उठाकर तथा ओंकार पढ़ के ही पीवे ॥ ३८ ॥ जो पाप मनुष्यों के शरीर की त्वचा तथा हड्डियों में भी पैठ गया हो उस सब को यह ब्रह्मकूर्च ऐसे ही भस्म कर देता है जैसे कि ईंधन को अग्नि जलावे ॥ ३९॥
८० पराशरस्मृतिः ॥
पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम् ।
वरुणश्चैव गोमूत्रे गोमये हव्यवाहनः ।
दध्नि वायुः समुद्दिष्टः सोमः क्षीरे घृते रविः ॥ ४० ॥
पिबतः पतितं तोयं भाजने मुखनिःसृतम् ।
अपेयं तद्विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ ४१ ॥
कूपे च पतितं दृष्ट्वा श्वशृगालौ च मर्कटम् ।
अस्थिचर्मादिपतिताः पीत्वामेध्या अपो द्विजः ॥ ४२ ॥
नारं तु कुणपं काकं विड्वराहं खरोष्ट्रकम् ।
गावं यं सौप्रतीकं च मायूरं खाड्गकं तथा ॥ ४३ ॥
वैयाघ्रं मार्क्षं सैंहं वा कूपे यदि निमज्जति ॥ ४४ ॥
तडागस्याऽपि दुष्टस्य पीतं स्यादुदकं यदि ॥
प्रायश्चित्तं भवेत्पुंसः क्रमेणैतेन सर्वशः ॥ ४५ ॥
विप्रः शुद्ध्येत्त्रिरात्रेण क्षत्रियस्तु दिनद्वयात् ।
एकाहेन तु वैश्यश्च शूद्रानक्तेन शुद्ध्यति ॥ ४६ ॥
परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्य च ।
यह ब्रह्मकूर्च्च अनेक देवताओं से अधिष्ठित होने से तीनों लोक में अति पवित्र है। गो मूत्र में वरुण देवता, गोबर में अग्नि, दही में वायु, दूध में सोम, और घी में सूर्य नारायण विराजते हैं ॥ ४० ॥ जल पीने समय मुख से निकल के जलपात्र में जूठा जल गिर जाय तो वह पात्रका जल पीने योग्य नहीं है। यदि उस को पीलेवै तो चान्द्रायण व्रत करे ॥४१॥ यदि कुए में कुत्ता, गीदड़, बन्दर, हाड़, चाम आदि गिरे हुए देखकर भी द्विज पुरुष उस अशुद्ध जल को पी लेवे ॥ ४२ ॥ मनुष्य का मुर्दा देह, कौवा, विष्ठा खाने वाला सूअर, गधा, ऊंट, गवय, (नीलगाय) हाथी, मोर, गैंडा, ॥ ४३ ॥ बाघ, रीछ, सिंह, ये यदि कूप में डूब जांय ॥ ४४ ॥ और तालाब का बिगड़ा हुआ खराब दुर्गन्धयुक्त जल भी यदि पीया जाय तो पुरुषों का क्रम से यह निम्न प्रायश्चित्त है कि ॥ ४५ ॥ ब्राह्मण तीन दिन रात, क्षत्रिय दो दिन रात, के उपवास से वैश्य एक दिन रात के उपवास से और शूद्र रातभर के उपवास से शुद्ध होता है ॥ ४६ ॥ जो पुरुष परपाक से निवृत्त हो और जो परपाक रत हो इन दोनोंका और १५ श्लोक
भाषार्थसहिता ॥ ८१
अपचस्यचभुक्त्वाऽन्नं द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ ४७ ॥
अपचस्यतुयद्दानन्दातुरस्यकुतःफलम् ।
दाताप्रतिग्रहीताच द्वौतौनिरयगामिनौ ॥ ४८ ॥
गृहीत्वाग्निंसमारोप्य पञ्चयज्ञान्ननिर्वपेत् ।
परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिःपरिकीर्त्तितः ॥ ४९ ॥
पञ्चयज्ञान्स्वयं कृत्वा परान्नेनोपजीवति ।
सततं प्रातरुत्थाय परपाकरतस्तुसः ॥ ५० ॥
गृहस्थधर्मेयोविप्रो ददातिपरिवर्जितः ।
ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैरपचःपरिकीर्तितः ॥ ५१ ॥
युगेयुगेतुयेधर्मास्तेषुतेषुचयेद्विजाः ।
तेषांनिन्दानकर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः ॥ ५२ ॥
हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारंचगरीयसः ।
में कहे अपच का अन्न खाकर ब्राह्मण चान्द्रायण व्रत करे ॥ ४७ ॥ अपच पुरुष को जो दान देवे उस का दाता को फल कहां ? दान का दाता और लेने वाला ये दोनों नरक में जाते हैं ॥ ४८ ॥ जो पुरुष अग्नि को स्थापन करके अरणी में समारोप करके पञ्चमहायज्ञ न करे । मुनियों ने उसको "परपाक निवृत्त" कहा है ॥ ४९ ॥ और जो नित्य प्रातःकाल उठकर आप ही पञ्चमहायज्ञ करके अन्य के पकाये अन्न को खाता हो वह "परपाकरत" कहलाता है॥५०॥ अर्थात् ये दोनों ही बुरे निन्दित हैं । पर नाम वैश्वदेवार्थ अन्न पकाना चाहिये उसी का शेष खाना अमृतभोजन है । और पर नाम अन्य के पकाये में खाने की रुचि न रक्खे। गृहस्थोंके धर्म में तत्पर जो ब्राह्मण हो और दान धर्मसे वर्जित हो (दान कुछ न देता हो अर्थात् पञ्चमहायज्ञों द्वारा देवनादि को भी कुछ न देता हो) धर्म तत्त्व के ज्ञाता ऋषियों ने उसे "अपच" कहा है ॥५१॥ युग २ में जो भिन्न २ धर्म हैं उन २ धर्मों में तत्पर जो ब्राह्मण उन ब्राह्मणों की निन्दा नहीं करनी चाहिये क्योंकि वे ब्राह्मण युग के अनुरूप हैं सत्ययुगी, त्रेतायुगी, द्वापरयुगी, और कलियुगी ब्राह्मण भिन्न २ होंगे । कलि में अन्य युगों कैसे ब्राह्मण भी हो ही नहीं सकते ॥५२॥ बड़े विद्वान् धर्मनिष्ठ ब्राह्मण को हुंकार और किसी मान्य पुरुष से त्वंकार ( हुंः या तूं ) जिस समय कहे उस समय
११
८२ पराशरस्मृतिः ॥
स्नात्वातिष्ठन्नहःशेषमभिवाद्यप्रसादयेत् ॥ ५३ ॥
ताडयित्वातृणेनापि कण्ठेबध्वापिवाससा ।
विवादेनापिनिर्जित्य प्रणिपत्यप्रसादयेत् ॥ ५४ ॥
अवगूर्यत्वहोरात्रं त्रिरात्रंक्षितिपातने ।
अतिकृच्छ्रं चरुधिरे कृच्छ्रमन्तरशोणिते ॥ ५५ ॥
नवाहमतिकृच्छ्रं स्यात्पाणिपूरान्नभोजनम् ।
त्रिरात्रमुपवासःस्यादतिकृच्छ्रःसउच्यते ॥ ५६ ॥
सर्वेषामेवपापानां संकरेसमुपस्थिते ।
शतसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रीशोधनं परम् ॥ ५७ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्र एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
दुःस्वप्नंयदिपश्येत्तु वान्तेवाक्षरकर्मणि ।
मैथुनेप्रेतधूमेच स्नानमेवविधीयते ॥ १ ॥
अज्ञानात्प्राश्यविण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेवच ।
जितना दिन शेष हो उतने कालतक स्नान करके खड़ा रहै फिर अभिवादन करके प्रसन्न (राजी) करावै॥५३॥ तृण से भी ब्राह्मण को ताड़ना करके और ब्राह्मण के कण्ठ में वस्त्र भी बांधकर अथवा ब्राह्मण को शास्त्रार्थ में जीतकर नमस्कार करके प्रसन्न करै ॥५४॥ ब्राह्मण की ओर गुर्गा कर या ऐंठ दिखा के एक दिन रात और पृथिवी पर पटक देकर तीन दिन रात उपवास करै। ब्राह्मण के रुधिर निकालने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे और रुधिर न निकले किन्तु दर्दी चोट लगे तो कृच्छ्रव्रत करै ॥५५॥ जो नौ ९ दिन तक पकाया हुआ अंजुलि भर अन्न खावै यह अतिकृच्छ्र होता है। या तीन दिन रात उपवास करे उसे अतिकृच्छ्र कहते हैं ॥ ५६ ॥ यदि सब पापों का संकर होजाय अर्थात् अनेक प्रकार के अनेक पाप जिस ने किये हों वह सौ हजार (एक लाख) वा सवा लाख गायत्री का अभ्यास जप करे यह अनुष्ठान परम शुद्धि करने वाला है ॥५७॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
वमन, क्षौर कर्म, मैथुन, प्रेत का धूम, इन विषयों में वा इन का खोटा स्वप्न देखे तो तत्काल स्नान करना कहा है ॥ १ ॥ अज्ञान से विष्ठा, मूत्र, और
भाषार्थसहिता ॥ ८३
पुनःसंस्कारमर्हन्ति त्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ २ ॥ अजिनंमेखलादण्डो भैक्षचर्याव्रतानिच । निवर्त्तन्तेद्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि ॥ ३ ॥ स्त्रीशूद्रस्यचशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यंसमाचरेत् । पञ्चगव्यंचकुर्वीत स्नात्वापीत्वाशुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ जलाग्निपतनेचैव प्रव्रज्यानाशकेषुच । प्रत्यवसितवर्णानां कथंशुद्धिर्विधीयते ॥ ५ ॥ प्राजापत्यद्वयेनैव तीर्थाभिगमनेनच । वृषैकादशदानेन वर्णाःशुद्ध्यन्तितेत्रयः ॥ ६ ॥ ब्राह्मणस्यप्रवक्ष्यामि वनंगत्वाचतुष्पथे । सशिखंवपनंकृत्वा प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ७ ॥ गोद्वयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिंपराशरोऽब्रवीत् । मुच्यतेतेनपापेन ब्राह्मणत्वंचगच्छति ॥ ८ ॥
जिस में मदिरा मिली हो उस को खाकर ब्राह्मणादि तीनों द्विजाति फिर से संस्कार के योग्य होते हैं ॥ २ ॥ द्विजातियों के फिर (दुवारा) उपनयन संस्कार कर्म में मृगछाला, मूँजी मेखला, पलाशादि का दंड, भिक्षा मांगने के नियम, ये सब निवृत्त हो जाते हैं ॥३॥ स्त्री और शूद्र को यदि उक्त दोष लगे तो प्राजापत्य व्रत करें और पंचगव्य बनावें स्नान करके पंचगव्य को पीकर शुद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ स्नान का नियम बिगड़ने, वा स्थापित अग्नि के बुझ जाने पर और संन्यास धर्म को बिगाड़ने वाला कोई काम बन पड़े तो हीन हुए तीनों वर्णों की कैसे शुद्धि हो सो कहते हैं ॥ ५ ॥ दो प्राजापत्य व्रतों से, तीर्थों की यात्रा से, ग्यारह बैलों का दान करने से, वे तीनों वर्ण क्रम से शुद्ध होते हैं ॥६॥ उन में ब्राह्मण का प्रायश्चित्त प्रथम कहते हैं। वह ब्राह्मण वन में जाकर चौराहे पर शिखा सहित सब बालों का मुंडन कराके दो प्राजापत्य व्रत करै ॥७॥ फिर दो गौ दक्षिणा में देवे यह शुद्धि पाराशर ने कही है। फिर ब्राह्मण उस पाप से छूटजाता है और ब्राह्मणपन को प्राप्त हो जाता है ॥८॥
८४ पराशरस्मृतिः ॥
स्नानानिपञ्चपुण्यानि कीर्त्तितानिमनीषिभिः ।
आग्नेयंवारुणंब्राह्मं वायव्यंदिव्यमेवच ॥ ९ ॥
आग्नेयं भस्मनास्नानमवगाह्यतुवारुणम् ।
आपोहिष्ठेतिचब्राह्मं वायव्यं गोरजःस्मृतम् ॥ १०॥
यत्तसातपवर्षेण स्नानंतद्दिव्यमुच्यते ।
तत्रस्नात्वातुगंगायां स्नातोभवतिमानवः ॥ ११ ॥
स्नातुंयान्तंद्विजंसर्वे देवाःपितृगणैःसह ।
वायुभूतास्तुगच्छन्ति तृषार्त्ताःसलिलार्थिनः ॥ १२ ॥
निराशास्तेनिवर्त्तन्ते वस्त्रनिष्पीडनेकृते ।
तस्मान्नपीडयेद्वस्त्रमकृत्वापितृतर्पणम् ॥ १३ ॥
रोमकूपेष्ववस्थाप्य यस्तिलैस्तर्पयेत्पितॄन् ।
तर्पितास्तेनतेसर्वे रुधिरेणमलेनच ॥ १४ ॥
अवधूनोतियःकेशान् स्नात्वाप्रस्रवतोद्विजः ।
मुनि लोगों ने पांच स्नान पवित्र कहे हैं १ आग्नेय, २ वारुण, ३ ब्राह्म, ४ वायव्य, ५ दिव्य, ॥९॥ भस्म से किया स्नान आग्नेय, जल से किये को वारुण, (आपो हिष्ठाः ) इन तीन आदि मंत्रों से किये स्नान को ब्राह्म, गौओं के पगों से उड़ी धूलि से किये को वायव्य स्नान कहते हैं ॥१०॥ और जो वर्षाके समय धूप भी निकल रही हो उस समय मेघ की बूंदों से जो स्नान करे उसे दिव्य स्नान कहते हैं क्योंकि उस वर्षा में स्नान करके मनुष्य को गंगा के स्नान का फल होता है ॥ ११ ॥ जिस समय ब्राह्मण स्नान करने को जाता है उस समय सब देवता, पितरों के सहित तृषा से पीड़ित हुए जल के लिये वायु का रूप धारण करके ब्राह्मण के पीछे २ चलते हैं ॥१२॥ यदि वह ब्राह्मण तर्पण करनेसे पहिले वस्त्र (धोती ) निचोड़ ले तो वे निराश होकर लौट जाते हैं । तिससे देव, ऋषि, पितरों का तर्पण किये विना वस्त्र को न निचोड़े ॥१३॥ रोमों पर तिलों को रखकर जो मनुष्य पितरों का तर्पण करता है उसने अपने रुधिर और मल से उन सब पितरों को तृप्त किया जानो ॥१४॥ जो द्विज ब्राह्मण स्नान करके टपकते हुए केशों को झाड़ता है और जल के भीतर खड़ा या
भाषार्थसंहिता ॥ ८५
आचामेद्वाजलस्थोपि बाह्यःसपितृदैवतैः ॥ १५ ॥
शिरःप्रावृत्यकण्ठंवा मुक्तकच्छशिखोपिवा।
विनायज्ञोपवीतेन आचान्तोप्यशुचिर्भवेत् ॥ १६ ॥
जलेस्थलस्थोनाचामेज्जलस्थश्चबहिःस्थले ।
उभेस्पृष्ट्वासमाचामेदुभयत्रशुचिर्भवेत् ॥ १७ ॥
स्नात्वापीत्वाक्षुतेसुप्ते भुक्त्वारथ्योपसर्पणे ।
आचान्तःपुनराचामेद्वासोविपरिधायच ॥ १८ ॥
क्षुतेनिष्ठीवनेचैव दन्तोच्छिष्टेतथाऽनृते ।
पतितानांचसंभाषे दक्षिणंश्रवणंस्पृशेत् ॥ १९ ॥
ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च सोमःसूर्योऽनिलस्तथा ।
तेसर्वेह्यपितिष्ठन्ति कर्णंविप्रस्यदक्षिणे ॥ २० ॥
भास्करस्यकरैःपूतं दिवास्नानंप्रशस्यते ।
अप्रशस्तंनिशिस्नानं राहोरन्यत्रदर्शनात् ॥ २१ ॥
मरुतोवसवोरुद्रा आदित्याश्चाथदेवताः ।
बैठा आचमन करता है वह मनुष्य पितर और देवताओं से बाह्य ( देव कर्म पितृ कर्म के अयोग्य ) है ॥ १५ ॥ शिर वा कंठ को बांध कर कांख खोल के वा शिखा को खोलकर, अथवा जनेऊ के बिना जो आचमन करता है वह आचमन करके भी अशुद्ध ही रहता है ॥ १६ ॥ स्थल में बैठा मनुष्य जल में और जल में बैठा स्थल में आचमन न करै किन्तु स्थल में बैठा हो तो स्थल में ही आचमन करै और जल में बैठा हो तो जल में ही आचमन करे तो शुद्ध होता है ॥ १७ ॥ आचमन किये पीछे यदि स्नान करे, जल पीवै, छींक आवे, सोवै, खावे, अथवा मार्ग में चले, वस्त्र पहिने, (कपड़ा बदले) तो फिर से आचमन करै ॥ १८ ॥ छींकना, थूकना, दांतों में उच्छिष्ट (जूठन) निकलना, अथवा झूठ बोलना, वा पतितों के संग संभाषण करना, इन के होने पर ब्राह्मण अपने दहिने कान का स्पर्श करे ॥ १९ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सोम, सूर्य, वायु, ये सब देवता ब्राह्मण के दहिने कान में रहते हैं ॥ २० ॥ सूर्य की किरणों से पवित्र हुआ जो दिनमें स्नान करना है बहुत उत्तम है और राहु के द्वारा हुए चन्द्र ग्रहण को छोड़ कर रात्रि का स्नान अधम कहा है ॥ २१ ॥ उनचाश मरुत्, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, और बाहर आदित्य, ये सब देवता चन्द्रग्रहण के समय
८६ पराशरस्मृतिः ॥
सर्वेसोमेप्रलीयन्ते तस्मात्स्नानंतुतद्ग्रहे ॥ २२ ॥ खलयज्ञेविवाहेच संक्रान्तौग्रहणेतथा । शर्वर्य्यांदानमस्त्येव नाऽन्यत्रतुविधीयते ॥ २३ ॥ पुत्रजन्म नियज्ञेच तथाचात्ययकर्मणि । राहोश्चदर्शनेदानं प्रशस्तंमान्यदानिशि ॥ २४ ॥ महानिशा तुविज्ञेया मध्यस्थंप्रहरद्वयम् । प्रदोषपश्चिमौयामौ दिनवत्स्नानमाचरेत् ॥ २५ ॥ चैत्यवृक्षश्चितिस्थितश्च चाण्डालःसोमविक्रयी । एतांस्तुब्राह्मणःस्पृष्ट्वा सवासाजलमाविशेत् ॥ २६ ॥ अस्थिसंचयनात्पूर्वं रुदित्वास्नानमाचरेत्। अन्तर्दशाहेविप्रस्य ह्यूर्ध्वमाचमनंस्मृतम् ॥ २७ ॥ सर्वंगंगासमंतोयं राहुग्रस्तेदिवाकरे । सोमग्रहेतथैवोक्तं स्नानदानादिकर्मसु ॥ २८ ॥
चंद्रमा में लीन होते (छिप जाते हैं) तिससे चन्द्रग्रहण का मोक्ष होने पर स्नान अवश्य करे ॥ २२ ॥ खलियान में होने वाले खलयज्ञ, विवाह, संक्रांति, और चन्द्र ग्रहण इन में रात्रि में भी दान कहा ही है अन्यत्र नहीं ॥ २३ ॥ पुत्रका जन्म होने पर, यज्ञ में, मृतक के कर्म में, राहु के दर्शन ( ग्रहण ) में, इन ही अवसरों पर रात्री में दान करना उत्तम कहा है अन्यत्र नहीं ॥ २४ ॥ रात्रि के बीच के दो पहरों को महानिशा कहते हैं । इस से सायंकाल तथा प्रातः काल की रात के दो प्रहरों में दिन के समान स्नान दानादि करे ॥ २५ ॥ चैत्य का वृक्ष जो मरघट पर उगाहो, चिता, चांडाल, यज्ञ में सोम लता का बेचने वाला, इन का स्पर्श करके ब्राह्मण सचैल स्नान करे ॥ २६ ॥ अस्थि संचय्न (मरे के फूल इकट्ठे करने ) से पहिले रोवे तो स्नान करे । ब्राह्मणों को दशदिन के भीतर रोने पर स्नान करना और दशदिन बीते पर आचमन करना कहा है ॥ २७ ॥ जिस समय राहु, सूर्य वा चंद्रमा को ग्रसे उस समय स्नान दान आदि कर्मों में सब जल गंगा जल के समान कहे हैं ॥ २८ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ८९
कुशैःपूतं भवेत्स्नानं कुशैनोपस्पृशेद्विजः । कुशैनोद्धृतंतोयं सोमपानसमंभवेत् ॥ २९ ॥ अग्निकार्यात्परिभ्रष्टाः संध्योपासनवर्जिताः । वेदंचैवानधीयानाः सर्वेतेवृषलाःस्मृताः ॥ ३० ॥ तस्माद्वृषलभीतेन ब्राह्मणेनविशेषतः । अध्येतव्योप्येकदेशो यदि सर्वंनशक्यते ॥ ३१ ॥ शूद्रान्नरसपुष्टस्याप्यधीयानस्यनित्यशः । जपतो जुह्वतोवापि गतिरूर्ध्वानविद्यते ॥ ३२ ॥ शूद्रान्नंशूद्रसंपर्कः शूद्रेणतुसहासनम् । शूद्राज्ज्ञानागमश्चापि ज्वलन्तमपिपातयेत् ॥ ३३ ॥ यःशूद्र्यापाचयेन्नित्यं शूद्रीचगृहमेधिनी । वर्जितःपितृदेवेभ्यो रौरवंद्यातिसद्विजः ॥ ३४ ॥ मृतसूतकपुष्टाङ्गं द्विजंशूद्रान्नभोजिनम् ।
कुशों से मार्जन पूर्वक स्नान करना पवित्र कारक होता है और कुशों से ही ब्राह्मणादि द्विज आचमन करे क्योंकि कुशों से उठाया जल सोम के पीने तुल्य पवित्र होता है ॥२९॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्र से भ्रष्ट और संध्योपासन से वर्जित हैं और विधिपूर्वक वेद को भी नहीं पढ़ते वे सब शूद्र के तुल्य कहे हैं ॥३०॥ तिससे शूद्र होजाने के भयसे विशेषकर ब्राह्मणको चाहिये कि यदि सब वेदको न पढ़ सके तो वेद का कोई एक भाग ही पढ़े ॥३१॥ जो ब्राह्मण शूद्रके दिये अन्न को खाके पुष्ट हुआ हो वह प्रतिदिन वेद का अध्ययन, जप, तथा होम करता हुआ भी स्वर्गको प्राप्त नहीं होता ॥३२॥ शूद्र का अन्न, शूद्र का संपर्क, (मेल) शूद्र के संग एक जगह निवास होना, शूद्र से शिक्षा लेना, ये काम प्रतापी तेजस्वी ब्राह्मण को भी पतित करदेते हैं ॥ ३३ ॥ जो द्विज शूद्री स्त्री से भोजन बनवाता हो और जिस के घर में शूद्री ही स्त्री हो वह द्विज पितर और देवताओं से वर्जित हुआ रौरव नरक को प्राप्त होता है ॥३४॥ मरण तथा जन्म के सूतक का अन्न खा २ के जिस का शरीर पुष्ट हुआ हो और जो शूद्र
८८ | पराशरस्मृतिः ॥
अहंतन्नविजानामि कांकांयोनिं गमिष्यति ॥ ३५ ॥
गृध्रोद्वादशजन्मानि दशजन्मानिसूकरः ।
श्वयोनौसप्तजन्मानि इत्येवंमनुरब्रवीत् ॥ ३६ ॥
दक्षिणार्थंतुयोविप्रः शूद्रस्यजुहुयाद्धविः ।
ब्राह्मणस्तुभवेच्छूद्रः शूद्रस्तुब्राह्मणोभवेत् ॥ ३७ ॥
मौनव्रतंसमाश्रित्य आसीनो नवदेद्विजः ।
भुञ्जानोहि वदेद्यस्तु तदन्नंपरिवर्जयेत् ॥ ३८ ॥
अर्द्धभुक्तेतुयोविप्रस्तस्मिन्पात्रे जलं पिबेत् ।
हतंदैवं च पित्र्यंच आत्मानंचोपघातयेत् ॥ ३९ ॥
भुञ्जानेषुतुविप्रेषु योऽग्रे पात्रंविमुञ्चति ।
समूढः सचपापिष्ठो ब्रह्मघ्नः सखलूच्यते ॥ ४० ॥
भाजनेष्वचतिष्ठत्सु स्वस्तिकुर्वन्तियेद्विजाः।
नदेवास्तृप्तिमायान्ति निराशाःपितरस्तथा ॥ ४१ ॥
के अन्न को खाता हो हम नहीं जानते कि वह ब्राह्मण किस २ योनि में जायगा ? ॥३५ ॥ परन्तु मनुजी ने ऐसा कहा है कि बारह जन्म तक गीध पक्षी, दश जन्मतक सूकर और सात जन्म तक कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है ॥३६॥
जो ब्राह्मण दक्षिणा के लिये शूद्र के हविष्य का होम करे वह ब्राह्मण तो जन्मान्तर में शूद्र होता और वह शूद्र ब्राह्मण कुल में जन्मता है ॥ ३७ ॥
मौनव्रत को धारण करके जो ब्राह्मण बैठा हुआ न बोले और वह भोजन करता हुआ बोले उस के अन्न को त्याग देना चाहिये ॥ ३८ ॥ आधा भोजन किये पीछे जो ब्राह्मण उसी भोजन के पात्र में जल पीवे उस के देवताओं और पितरों का कर्म नष्ट होता और वह अपने को भी नष्ट करता है ॥३९॥
पांति में ब्राह्मणों के भोजन करते हुए जो पहिले पात्र को छोड़ देता है वह मूढ़ बड़ा पापी और ब्रह्महत्यारा कहाता है ॥ ४० ॥ भोजन पात्रों (पत्तलों) के उठाने से पहिले जो ब्राह्मण स्वस्ति (कल्याण हो) कहते हैं उस ब्रह्मभोज पर देवता तृप्त नहीं होते और पितर भी निराश हो के लौट जाते हैं ॥४१॥
भाषाधर्मसंहिता ॥
अस्नात्वानैवभुञ्जीत द्विजश्चाग्निमपूजयन् ।
नपर्णपृष्ठे भुञ्जीत रात्रौदीपंविनातथा ॥ ४२ ॥
गृहस्थस्तुदयायुक्तो धर्ममेवानुचिन्तयेत् ।
पोष्यवर्गार्थसिद्धयर्थं न्यायवर्तीसबुद्धिमान् ॥ ४३ ॥
न्यायोपार्जितवित्तेन कर्त्तव्यह्यात्मरक्षणम् ।
अन्यायेनतुयोजीवे त्ससर्वकर्मबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥
अग्निचित्कपिलासत्री राजाभिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात्पश्येत्तु नित्यशः ॥ ४५ ॥
अरणिंकृष्णमार्जारं चन्दनंसुमणिंघृतम् ।
तिलान्कृष्णाजिनं छागंगृहेचैतानिरक्षयेत् ॥ ४६ ॥
गवांशतंसैकवृषं यत्रतिष्ठत्ययन्त्रितम् ।
तत्क्षेत्रंदशगुणितं गोचर्मपरिकीर्तितम् ॥ ४७ ॥
ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो मनोवाक्कायकर्मभिः ।
एतद्गोचर्मदानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषैः ॥ ४८ ॥
विशेष कर ब्राह्मण को चाहिये कि-स्नान किये बिना और अग्नि को पूजे बिना भोजन न करे, पत्तों की पीठ ( उलटी पत्तल ) पर और रात्रि में दीपक के जलाये बिना अंधेरे में भोजन न करे ॥४२॥ दया युक्त हुआ गृहस्थ पुरुष धर्म की ही चिन्ता करे । अपने पोष्यवर्ग ( पुत्र वा भृत्य आदि ) के निर्वाह की सिद्धि के लिये बुद्धिमान् सदैव न्याय से प्राप्त धनादि का संचय करे ॥ ४३ ॥ न्याय के साथ धर्मानुकूल संचय किये धन से अपनी रक्षा करे । क्योंकि जो पुरुष अधर्म अन्याय से जीविका करता है वह सब कर्म धर्मों से बाहर (अनधिकारी) होजाता है ॥ ४४ ॥ चयन यज्ञ करने वाला, कपिला गौ, सत्रयज्ञ करने वाला, राजा, भिक्षु, ( संन्यासी ) समुद्र, ये सब दर्शन से ही दर्शन कर्त्ता को पवित्र कर देते हैं। तिससे इन का नित्य दर्शन करे ॥४५॥ अरणि, काला बिलाव, चन्दन, उत्तम मणि, घी, तिल, काला मृगचर्म, बकरा, इन को घर में रक्खा करे ॥४६॥ जितनी जगह में सौ गौ और एक बैल बिना बांधे खड़े हो सकें उस से दशगुणी जगह भूमि को गोचर्म कहते हैं ॥४७॥ इस गोचर्ममात्र भूमिके दान से मनुष्य मन, वाणी, और शरीर से किये ब्रह्महत्या आदि पापों से छूट जाताहै ॥४८॥
१२
९० पराशरस्मृतिः ॥
कुटुंबिनेदरिद्राय श्रोत्रियायविशेषतः । यद्दानंदीयतेतस्मै तद्दानंशुभकारकम् ॥ ४९ ॥
वापीकूपतडागाद्यैर्वाजपेयशतैर्मखैः । गवांकोटिप्रदानेन भूमिहर्तानशुद्ध्यति ॥५० ॥
आषोडशदिनादर्वाक् स्नानमेवरजस्वला । अतऊर्ध्वंत्रिरात्रंस्यादुशनामुनिरब्रवीत् ॥ ५१ ॥
युगंयुगद्वयंचैव त्रियुगंचचतुर्युगम् । चाण्डालसूतिकोदक्या पतितानामधःक्रमात् ॥ ५२ ॥
ततःसन्निधिमात्रेण सचैलंस्नानमाचरेत् । स्नात्वावलोकयेत्सूर्यमज्ञानात्तत्स्पृशतेयदि ॥ ५३ ॥
वापीकूपतड़ागेषु ब्राह्मणोज्ञानदुर्बलः । तोयं पिवतिवक्त्रेण श्वयोनौजायतेध्रुवम् ॥ ५४ ॥
यस्तुक्रुद्धःपुमान्भार्यां प्रतिज्ञाप्याप्यगम्यताम् । पुनरिच्छतितांगन्तुं विप्रमध्येतुश्रावयेत् ॥ ५५ ॥
जो ब्राह्मण कुटुम्ब वाला हो, दरिद्र हो, और विशेष कर वेदपाठी हो, उनको जो दान दिया जाता है वही दान उस दाता के लिये शुभ करने वाला होता है ॥४९॥ दी हुई भूमि को हर लेने वाला मनुष्य बावड़ी, कूप, तालाब आदि के धर्मार्थ बनवाने से, सौ १०० वाजपेय यज्ञों के करने से, और कोटि गौओं का दान देने से भी शुद्ध नहीं हो सक्ता ॥ ५० ॥ यदि रजोदर्शन से सोलह-दिन के बीच कोई स्त्री फिर से रजस्वला हो तो स्नान ही से शुद्ध हो जाती है । सोलहवें दिन के बाद रजोधर्म हो तो तीन दिन में शुद्धि होगी यह उशना मुनि ने कहा है ॥५१॥ जानकर चाण्डाल के छूने पर दो दिन में, सूतिका स्त्री के छूने पर चार दिन में, रजस्वला के छूने पर छः दिनमें, और पतित स्त्री के छूने पर आठ दिन में शुद्ध होता है ॥५२॥ चाण्डालादि के समीप बैठे तो सचैल स्नान करै । यदि अज्ञान से चाण्डालादि को छू लेवै तो स्नान करके सूर्य नारायण का दर्शन करै ॥ ५३ ॥ हाथों के विद्यमान रहते भी जो अज्ञानी ब्राह्मण बावड़ी कुआ या तालाब में मुख लगाकर जल पीता है वह निश्चय करके जन्मान्तर में कुत्ता होता है ॥ ५४ ॥ जो मनुष्य क्रुद्ध होके अपनी स्त्री से प्रतिज्ञा करै कि तू दूषित होने से गमन करने योग्य नहीं है और फिर उस स्त्रीका संग करना चाहे तो इस बात को ब्राह्मणों की मण्डली वा सभा में सुना देवे ॥ ५५ ॥
भाषाधंसहिता ॥ ९१
श्रान्तःक्रुद्धस्तमोऽन्धोवा क्षुत्पिपासाभयार्दितः । दानपुण्यमकृत्वावा प्रायश्चित्तंदिनत्रयम् ॥ ५६ ॥ उपस्पृशेत्त्रिषवणं महानद्युपसंगमे । चीर्णान्तेचैवगांदद्याद् ब्राह्मणान्भोजयेद्दश ॥ ५७ ॥ दुराचारस्यविप्रस्य निषिद्धाचरणस्यच । अन्नंभुक्त्वाद्विजःकुर्याद्दिनमेकमभोजनम् ॥ ५८ ॥ सदाचारस्यविप्रस्य तथावेदान्तवेदिनः । भुक्त्वाऽन्नंमुच्यतेपापादहोरात्रंतुवैनरः ॥ ५९ ॥ ऊर्ध्वोच्छिष्टमधोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतीतथा । कृच्छ्रत्रयंप्रकुर्वीत अशौचमरणेतथा ॥ ६० ॥ कृच्छ्रे देव्ययुतंचैव प्राणायामशतद्वयम् । पुण्यतीर्थेह्यार्द्रशिराः स्नानंद्वादशसंख्यया । द्वियोजनंतीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकंप्रकल्पितम् ॥ ६१ ॥ गृहस्थःकामतःकुर्याद्रेतःसेचनंभुवि ।
जो थका हो, क्रोध करे, मादकद्रव्य खाने आदि से उन्मत्त, बेहोश मूर्च्छित हुआ हो, क्षुधा, प्यास वा भय से पीड़ित हो गया हो ऐसी दशाओं में दान पुण्य न करे तो वह ब्राह्मण तीन दिन प्रायश्चित्त करै ॥५६॥ और गंगा आदि बड़ी नदियों के संगम में सायं, प्रातः, और मध्याह्न में तीन बार स्नान और आचमन करै । प्रायश्चित्त किये पीछे एक गोदान करे और दश ब्राह्मण जिमावे ॥ ५७ ॥ दुराचारी और निषिद्ध आचरण करने वाले ब्राह्मण का अन्न खा कर द्विज पुरुष एक दिन भोजन न करै ॥ ५८ ॥ उत्तम सदाचारी और वेदान्त को जानने वाले ब्राह्मणका अन्न खाकर मनुष्य एक दिन रात में अनेक पापों से छूटजाता है ॥ ५९ ॥ नाभि से ऊपर उच्छिष्ट होने वा नाभि से नीचे के भाग में अशुद्ध होने की दशा में कोई मरे, वा खटिया पर मरे, अथवा जो सूतक में मरे, उस के लिये पुत्रादि वारिस लोग शुद्धि के बाद तीन कृच्छ्र व्रत करें ॥ ६० ॥ दश हजार गायत्री का जप, दोसौ २०० प्राणायाम, और पवित्र तीर्थ में बारह बार शिर भिगो २ कर स्नान करे ये सब एक कृच्छ्र का फल देते हैं। इस कारण कृच्छ्र व्रत करने में असमर्थ हो तो उक्त गायत्री जपादि को तिगुणा करे । और दो योजन तक तीर्थयात्रा को भी एक कृच्छ्र माना है ॥ ६१ ॥ यदि गृहस्थ पुरुष जानकर अपने वीर्यको
९२ पराशरस्मृतिः ॥
सहस्रंतुजपेद्देव्याः प्राणायामैस्त्रिभिःसह ॥ ६२ ॥ चातुर्वेद्योपपन्नस्तु विधिवद्ब्रह्मघातके । समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तंसमादिशेत् ॥ ६३ ॥ सेतुबन्धपथेभिक्षां चातुर्वर्ण्यात्समाचरेत् । वर्जयित्वाविकर्मस्थान् छत्रोपानद्विवर्जितः ॥ ६४ ॥ अहंदुष्कृतकर्मावै महापातककारकः । गृहद्वारेषुतिष्ठामि भिक्षार्थीब्रह्मघातकः ॥ ६५ ॥ गोकुलेषुवसेच्चैव ग्रामेषुनगरेषुच । तपोवनेषुतीर्थेषु नदीप्रस्रवणेषुच ॥ ६६ ॥ एतेषुख्यापयन्नैनः पुण्यंगत्वातुसागरम् । दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥ ६७ ॥ रामचन्द्रसमादिष्टं नलसंचयसंचितम् । सेतुंदृष्ट्वासमुद्रस्य ब्रह्महत्यांव्यपोहति । सेतुंदृष्ट्वाविशुद्धात्मा त्ववगाहेतसागरम् ॥ ६८ ॥ यजेतवाश्वमेधेन राजातुपृथिवीपतिः ।
भूमि पर गिरावे तौ वह तीन प्राणायाम के साथ एक हजार गायत्री का जप करे ॥ ६२ ॥ विधिपूर्वक जिसने चारों वेद पढ़े जाने हों वह यदि ब्रह्महत्या करे तो सेतुबंध रामेश्वर पर जाना प्रायश्चित्त बतावे ॥ ६३ ॥ और वह प्रायश्चित्ती जूता और छाता का धारण न करके सेतुबन्ध के मार्ग में हिंसा चोरी व्यभिचारादि दुष्कर्मियों को छोड़ के शेष चारों वर्णों से भिक्षा मांगता खाता जावे ॥ ६४ ॥ वह भिक्षा मांगते समय ऐसे कहा करे कि "मैं खोंटा कर्म करने वाला और महापातक कर्त्ता हूं। मुझे ब्रह्महत्या लगी है भिक्षा के लिये आपके द्वारे पर खड़ा हूं" ॥६५॥ ग्राम, वा नगरों की गोशाला धर्मशालादि में रात को बसे। तपो बनों में, तीर्थों में, नदी के सोताओं पर ॥६६॥ इन सब स्थानों में अपने पाप को प्रकट करता हुआ दश योजन चौड़े और सौ योजन लंबे पवित्र समुद्र पर जावे ॥ ६७ ॥ महाराजा भगवान् रामचन्द्र जी की आज्ञा से नलवानरके बनाये हुए समुद्र के सेतु को देखकर ब्रह्महत्या को दूरकरता है। सेतु के दर्शन करके विशुद्ध मन हुआ सागर में स्नान करे ॥६८॥ और पृथ्वी का पति राजा ब्रह्महत्या करे
पाराशरसंहिता ॥
पुनःप्रत्यागतोवेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥ ६९ ॥
सपुत्रःसहभृत्यश्च कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
गाश्चैकशतंदद्याच्चातुर्विद्येषुदक्षिणाम् ॥ ७० ॥
ब्राह्मणानांप्रसादेन ब्रह्महातुविमुच्यते ।
विन्ध्यादुत्तरतोयस्य संवासःपरिकीर्त्तितः ॥ ७१ ॥
पराशरमतंतस्य सेतुबन्धस्यदर्शनात् ।
सवनस्थांस्त्रियंहत्वा ब्रह्महत्याव्रतंचरेत् ॥ ७२ ॥
सुरापश्चद्विजःकुर्यान्नदींगत्वासमुद्रगाम् ।
चान्द्रायणेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ ७३ ॥
अनडुत्सहितांगांच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ७४ ॥
सुरापानंसकृत्कृत्वा अग्निवर्णांसुरांपिवेत् ।
सपावयेदिहात्मानमिहलोकेपरत्रच ॥ ७५ ॥
अपहृत्यसुवर्णंतु ब्राह्मणस्यततःस्वयम् ।
गच्छेन्मुशलमादाय राजानंस्ववधायतु ॥ ७६ ॥
तो अश्वमेध यज्ञ करै। फिर तीर्थ यात्री लौटकर घर में बसने के लिये आवे ॥ ६९ ॥ तब पुत्र और भृत्यों सहित ब्राह्मणों को जिमावे और चारो वेदों को पढ़ने जानने वाले ब्राह्मणों को सौ १०० गौ दक्षिणा में देवे ॥ ७० ॥ तब ब्राह्मणों को प्रसन्न सन्तुष्ट करने से ब्रह्महत्या से छूटजाता है। विन्ध्याचल पर्वत से उत्तर जो वसता है ॥७१॥ उस के लिये पाराशर ऋषि ने सेतुबन्ध का दर्शन कहा है। जिस के शीघ्र सन्तान होने वाला हो ऐसी स्त्री को मार डाले तो ब्रह्महत्या का व्रत करे ॥ ७२ ॥ मदिरा पीने वाला ब्राह्मण समुद्र तक जाने वाली नदी पर जाके चान्द्रायण व्रत करे फिर व्रत के पूरे होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ७३ ॥ एक बैल सहित एक गौ ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ७४ ॥ अथवा जो शुद्ध ब्राह्मण एक बार भी मदिरा को पीवे वह अग्नि वर्ण (अत्यन्त उष्ण) मदिरा पीकर प्राण त्याग करे तो इस लोक और परलोक में अपने को पवित्र कर लेता है ॥७५॥ ब्राह्मण के सुवर्ण को चुराकर आप ही मूसल को हाथ में लेके अपने मारने के लिये राजा के समीप जाय ॥७६॥
९५ पराशरस्मृतिः ॥
हतःशुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौमुक्तएवच ।
कामतस्तु कृतंयत्स्यान्नान्यथावधमर्हति ॥ ७७ ॥
आसनाच्छयनाद्यानात्संभाषात्सहभोजनात् ।
संक्रामन्तीहपापानि तैलविन्दुरिवाम्भसि ॥ ७८ ॥
चान्द्रायणंयावकंच तुलापुरुषएवच ।
गवांचैवानुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ७९ ॥
एतत्पाराशरंशास्त्रं श्लोकोनांशतपञ्चकम् ।
द्विनवत्यासमायुक्तं धर्मशास्त्रस्यसंग्रहः ॥ ८० ॥
यथाध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदंतथा ।
अध्येतव्यंप्रयत्नेन नियतंस्वर्गकामिना ॥ ८१ ॥
इति श्रीपाराशरीये धर्म्मशास्त्रे सकलप्रायश्चित्त
निर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः समाप्तः
समाप्ता च पाराशरसंहिता ॥
तब यदि राजा मरवा डाले वा उचित समझ के छोड़ देवे तो भी दोनों हालत में पाप से छूट जाता है ॥ यदि जान कर चोरी की हो तो मारने के योग्य है अन्यथा वध करने योग्य नहीं है ॥ ७७ ॥ एक जगह बैठने, लेटने, एक सवारी में बैठ कर चलने, पास २ बैठ कर वार्तालाप करने और साथ २ बैठ कर भोजन करने से पापियों के पाप अरुद्ध लोगों को लगते हैं कि जैसे जल में तेल का बिन्दु फैलजाता है ॥ ७८ ॥
चान्द्रायण, यावक (जौ को ही खाना,) और तुला पुरुष =तुलादान करना, गौओं के पीछे गमन करना, अर्थात् तन मन धन से गोरक्षा में तत्पर होना ये काम सब पापों को नाश करने वाले हैं ॥ ७९ ॥ यह पाराशर ऋषि का कहा धर्मशास्त्र जिसमें पांच सौ वानवे ५९२ श्लोक हैं । सो यह धर्मशास्त्र का संक्षेप से संग्रह किया है ॥ ८० ॥ जैसे वेद के अध्ययन सम्बन्धी कर्म पुण्योत्पादक हैं वैसा ही यह धर्मशास्त्र है इसलिये स्वर्ग की इच्छा रखने वाले पुरुष को यह धर्मशास्त्र यत्न से पढ़ना चाहिये ॥ ८१ ॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के पं० भीमसेन शर्मकृत भाषानुवाद में समस्त प्रायश्चित्त निर्णय नामक बारहवां १२ अध्याय पूरा हुआ ॥
और यह ११ वीं पाराशरस्मृति समाप्त हुई ॥
॥ श्रीगणेशायनमः ॥
अथ व्यासस्मृतिप्रारम्भः
वाराणस्यांसुखासीनं वेदव्यासंतपोनिधिम् ।
पप्रच्छुर्मुनयोऽभ्येत्य धर्मान्वर्णव्यवस्थितान् ॥ १ ॥
सपृष्टःस्मृतिमान्स्मृत्वा स्मृतिंवेदार्थगर्भिताम् ।
उवाचाथप्रसन्नात्मा मुनयःश्रूयतामिति ॥ २ ॥
यत्रयत्रस्वभावेन कृष्णसारोमृगःसदा ।
चरतेतत्रवेदोक्तो धर्मोभवितुमर्हति ॥ ३ ॥
श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोघायत्रदृश्यते ।
तत्रश्रौतं प्रमाणन्तु तयोर्द्वैधेस्मृतिर्वरा ॥ ४ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्त्रयोवर्णाद्विजातयः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्मयोग्यास्तुनेतरे ॥ ५ ॥
शूद्रोवर्णश्चतुर्थोपि वर्णत्वाद्धर्ममर्हति ।
काशी में सुख पूर्वक बैठे हुए तपस्वी वेदव्यास जी के समीप जा कर मुनियों ने वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी धर्म पूछे ॥ १ ॥ मुनियों से पूछे हुए बुद्धिमान् वेदव्यास जी वेदार्थगर्भित धर्मशास्त्र का स्मरण कर और प्रसन्न होके तुम सुनो ऐसा बोले ॥ २ ॥ जिस २ देश में स्वभाव से ही कृष्ण मृग सदैव विचरता है उस देश में वेदोक्त धर्म का प्रचार वा अनुष्ठान ठीक २ हो सकता है ॥ ३ ॥ जिस विषय में श्रुति स्मृति-और पुराण का परस्पर विरोध दीख पड़े वहां वेदोक्त का प्रमाण मानो तथा स्मृति और पुराण के विरोध में स्मृति उत्तम है अर्थात् स्मृति का कहा कर्म करना चाहिये ॥ ४ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ये तीन वर्ण द्विजाति कहाते हैं और विशेष कर ये ही तीनों वेद स्मृति, और पुराणों में कहे धर्म के अधिकारी हैं अन्य नहीं ॥ ५ ॥ चौथा शूद्र भी वर्ण होने से वेद मन्त्र, स्वधा, स्वाहा, वषट्कार आदि को छोड़ के शेष स्मृति-
२ व्यासस्मृति ॥
वेदमन्त्रस्वधास्वाहा वषट्कारादिभिर्विना ॥ ६ ॥
विप्रवद्विप्रविन्नासु क्षत्रविन्नासुक्षत्रवत् ।
जातकमीदिकुर्वीत ततःशूद्रासुशूद्रवत् ॥ ७ ॥
वैश्यासुविप्रक्षत्राभ्यां ततःशूद्रासुशूद्रवत् ।
अधमादुत्तमायां तु जातःशूद्राधमःस्मृतः ॥ ८ ॥
ब्राह्मण्यांशूद्रजनितश्चण्डालोधर्मवर्जितः ।
कुमारीसम्भवस्त्वेकः सगगोत्रायांद्वितीयकः ॥ ६ ॥
ब्राह्मण्यांशूद्रजनितश्चण्डालस्त्रिविधःस्मृतः ।
वर्द्धकीनापितोगोप आज्ञापःकुम्भकारकः ॥ १० ॥
वणिक्किरातकायस्थ मालाकारकुटुम्बिनः ।
वरटोमेदचाण्डाल दासश्वपचकोलकाः ॥ ११ ॥
एतेऽन्त्यजाःसमाख्याता येचान्येचगवाशनाः ।
पुराणोक्त प्रतिज्ञा पूजनादि धर्म का आचरणही है ॥ ६ ॥ ब्राह्मण के साथ विवाही क्षत्रिय कन्या के पुत्रों के जातकर्मादि संस्कार ब्राह्मण के तुल्य, क्षत्रिय से विवाही वैश्यकन्या के पुत्रों के वैश्य के तुल्य और ब्राह्मण क्षत्रिय से विवाही शूद्रकन्या के जातकर्मादि संस्कार शूद्र के तुल्य करे ॥ ७ ॥ अथवा ब्राह्मण क्षत्रिय से विवाही वैश्यकन्या के बालकों के संस्कार वैश्य के तुल्य करे और वैश्य से विवाही शूद्रकन्या से उत्पन्न पुत्रों के जातकर्मादि संस्कार भी शूद्र के ही तुल्य करे। निर्वल अर्थात् उत्तम वर्ण की कन्या में जो पैदा हो वह शूद्र से भी नीच कहा है ॥ ८ ॥ ब्राह्मणी में जो शूद्र से पैदा हो वह सब धर्मों से वर्जित चाण्डाल कहाता है और वह दो प्रकार का है, एक वह जो कुमारी कन्या से पैदा हो, दूसरा वह जो सगगोत्रा (विवाही) से पैदा हो ॥ ९ ॥ ब्राह्मणी में शूद्र से पैदा हुआ चाण्डाल तीन प्रकार का होता है। बढ़ई, नाई, गोप, आज्ञा से जो घड़े बनावे वह (कुम्हार) ॥ १० ॥ वणिक् (जो लेनदेन करे और निषिद्ध जाति हो) किरात, कायस्थ, माली, कुटुम्बी, बरट, मेद चण्डाल, दास, श्वपच, कोलक, ॥ ११ ॥ ये सब और जो गोमांस खावें वे अन्त्यज कहाते हैं इन के संग बोलने से स्नान करे और इन के देखने से सूर्य