अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ८९
कुशैःपूतं भवेत्स्नानं कुशैनोपस्पृशेद्विजः । कुशैनोद्धृतंतोयं सोमपानसमंभवेत् ॥ २९ ॥ अग्निकार्यात्परिभ्रष्टाः संध्योपासनवर्जिताः । वेदंचैवानधीयानाः सर्वेतेवृषलाःस्मृताः ॥ ३० ॥ तस्माद्वृषलभीतेन ब्राह्मणेनविशेषतः । अध्येतव्योप्येकदेशो यदि सर्वंनशक्यते ॥ ३१ ॥ शूद्रान्नरसपुष्टस्याप्यधीयानस्यनित्यशः । जपतो जुह्वतोवापि गतिरूर्ध्वानविद्यते ॥ ३२ ॥ शूद्रान्नंशूद्रसंपर्कः शूद्रेणतुसहासनम् । शूद्राज्ज्ञानागमश्चापि ज्वलन्तमपिपातयेत् ॥ ३३ ॥ यःशूद्र्यापाचयेन्नित्यं शूद्रीचगृहमेधिनी । वर्जितःपितृदेवेभ्यो रौरवंद्यातिसद्विजः ॥ ३४ ॥ मृतसूतकपुष्टाङ्गं द्विजंशूद्रान्नभोजिनम् ।
कुशों से मार्जन पूर्वक स्नान करना पवित्र कारक होता है और कुशों से ही ब्राह्मणादि द्विज आचमन करे क्योंकि कुशों से उठाया जल सोम के पीने तुल्य पवित्र होता है ॥२९॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्र से भ्रष्ट और संध्योपासन से वर्जित हैं और विधिपूर्वक वेद को भी नहीं पढ़ते वे सब शूद्र के तुल्य कहे हैं ॥३०॥ तिससे शूद्र होजाने के भयसे विशेषकर ब्राह्मणको चाहिये कि यदि सब वेदको न पढ़ सके तो वेद का कोई एक भाग ही पढ़े ॥३१॥ जो ब्राह्मण शूद्रके दिये अन्न को खाके पुष्ट हुआ हो वह प्रतिदिन वेद का अध्ययन, जप, तथा होम करता हुआ भी स्वर्गको प्राप्त नहीं होता ॥३२॥ शूद्र का अन्न, शूद्र का संपर्क, (मेल) शूद्र के संग एक जगह निवास होना, शूद्र से शिक्षा लेना, ये काम प्रतापी तेजस्वी ब्राह्मण को भी पतित करदेते हैं ॥ ३३ ॥ जो द्विज शूद्री स्त्री से भोजन बनवाता हो और जिस के घर में शूद्री ही स्त्री हो वह द्विज पितर और देवताओं से वर्जित हुआ रौरव नरक को प्राप्त होता है ॥३४॥ मरण तथा जन्म के सूतक का अन्न खा २ के जिस का शरीर पुष्ट हुआ हो और जो शूद्र