अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ पराशरस्मृतिः ॥
सर्वेसोमेप्रलीयन्ते तस्मात्स्नानंतुतद्ग्रहे ॥ २२ ॥ खलयज्ञेविवाहेच संक्रान्तौग्रहणेतथा । शर्वर्य्यांदानमस्त्येव नाऽन्यत्रतुविधीयते ॥ २३ ॥ पुत्रजन्म नियज्ञेच तथाचात्ययकर्मणि । राहोश्चदर्शनेदानं प्रशस्तंमान्यदानिशि ॥ २४ ॥ महानिशा तुविज्ञेया मध्यस्थंप्रहरद्वयम् । प्रदोषपश्चिमौयामौ दिनवत्स्नानमाचरेत् ॥ २५ ॥ चैत्यवृक्षश्चितिस्थितश्च चाण्डालःसोमविक्रयी । एतांस्तुब्राह्मणःस्पृष्ट्वा सवासाजलमाविशेत् ॥ २६ ॥ अस्थिसंचयनात्पूर्वं रुदित्वास्नानमाचरेत्। अन्तर्दशाहेविप्रस्य ह्यूर्ध्वमाचमनंस्मृतम् ॥ २७ ॥ सर्वंगंगासमंतोयं राहुग्रस्तेदिवाकरे । सोमग्रहेतथैवोक्तं स्नानदानादिकर्मसु ॥ २८ ॥
चंद्रमा में लीन होते (छिप जाते हैं) तिससे चन्द्रग्रहण का मोक्ष होने पर स्नान अवश्य करे ॥ २२ ॥ खलियान में होने वाले खलयज्ञ, विवाह, संक्रांति, और चन्द्र ग्रहण इन में रात्रि में भी दान कहा ही है अन्यत्र नहीं ॥ २३ ॥ पुत्रका जन्म होने पर, यज्ञ में, मृतक के कर्म में, राहु के दर्शन ( ग्रहण ) में, इन ही अवसरों पर रात्री में दान करना उत्तम कहा है अन्यत्र नहीं ॥ २४ ॥ रात्रि के बीच के दो पहरों को महानिशा कहते हैं । इस से सायंकाल तथा प्रातः काल की रात के दो प्रहरों में दिन के समान स्नान दानादि करे ॥ २५ ॥ चैत्य का वृक्ष जो मरघट पर उगाहो, चिता, चांडाल, यज्ञ में सोम लता का बेचने वाला, इन का स्पर्श करके ब्राह्मण सचैल स्नान करे ॥ २६ ॥ अस्थि संचय्न (मरे के फूल इकट्ठे करने ) से पहिले रोवे तो स्नान करे । ब्राह्मणों को दशदिन के भीतर रोने पर स्नान करना और दशदिन बीते पर आचमन करना कहा है ॥ २७ ॥ जिस समय राहु, सूर्य वा चंद्रमा को ग्रसे उस समय स्नान दान आदि कर्मों में सब जल गंगा जल के समान कहे हैं ॥ २८ ॥