भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसंहिता ॥ ८५

आचामेद्वाजलस्थोपि बाह्यःसपितृदैवतैः ॥ १५ ॥
शिरःप्रावृत्यकण्ठंवा मुक्तकच्छशिखोपिवा।
विनायज्ञोपवीतेन आचान्तोप्यशुचिर्भवेत् ॥ १६ ॥
जलेस्थलस्थोनाचामेज्जलस्थश्चबहिःस्थले ।
उभेस्पृष्ट्वासमाचामेदुभयत्रशुचिर्भवेत् ॥ १७ ॥
स्नात्वापीत्वाक्षुतेसुप्ते भुक्त्वारथ्योपसर्पणे ।
आचान्तःपुनराचामेद्वासोविपरिधायच ॥ १८ ॥
क्षुतेनिष्ठीवनेचैव दन्तोच्छिष्टेतथाऽनृते ।
पतितानांचसंभाषे दक्षिणंश्रवणंस्पृशेत् ॥ १९ ॥
ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च सोमःसूर्योऽनिलस्तथा ।
तेसर्वेह्यपितिष्ठन्ति कर्णंविप्रस्यदक्षिणे ॥ २० ॥
भास्करस्यकरैःपूतं दिवास्नानंप्रशस्यते ।
अप्रशस्तंनिशिस्नानं राहोरन्यत्रदर्शनात् ॥ २१ ॥
मरुतोवसवोरुद्रा आदित्याश्चाथदेवताः ।


बैठा आचमन करता है वह मनुष्य पितर और देवताओं से बाह्य ( देव कर्म पितृ कर्म के अयोग्य ) है ॥ १५ ॥ शिर वा कंठ को बांध कर कांख खोल के वा शिखा को खोलकर, अथवा जनेऊ के बिना जो आचमन करता है वह आचमन करके भी अशुद्ध ही रहता है ॥ १६ ॥ स्थल में बैठा मनुष्य जल में और जल में बैठा स्थल में आचमन न करै किन्तु स्थल में बैठा हो तो स्थल में ही आचमन करै और जल में बैठा हो तो जल में ही आचमन करे तो शुद्ध होता है ॥ १७ ॥ आचमन किये पीछे यदि स्नान करे, जल पीवै, छींक आवे, सोवै, खावे, अथवा मार्ग में चले, वस्त्र पहिने, (कपड़ा बदले) तो फिर से आचमन करै ॥ १८ ॥ छींकना, थूकना, दांतों में उच्छिष्ट (जूठन) निकलना, अथवा झूठ बोलना, वा पतितों के संग संभाषण करना, इन के होने पर ब्राह्मण अपने दहिने कान का स्पर्श करे ॥ १९ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सोम, सूर्य, वायु, ये सब देवता ब्राह्मण के दहिने कान में रहते हैं ॥ २० ॥ सूर्य की किरणों से पवित्र हुआ जो दिनमें स्नान करना है बहुत उत्तम है और राहु के द्वारा हुए चन्द्र ग्रहण को छोड़ कर रात्रि का स्नान अधम कहा है ॥ २१ ॥ उनचाश मरुत्, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, और बाहर आदित्य, ये सब देवता चन्द्रग्रहण के समय