भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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८४ पराशरस्मृतिः ॥

स्नानानिपञ्चपुण्यानि कीर्त्तितानिमनीषिभिः ।
आग्नेयंवारुणंब्राह्मं वायव्यंदिव्यमेवच ॥ ९ ॥
आग्नेयं भस्मनास्नानमवगाह्यतुवारुणम् ।
आपोहिष्ठेतिचब्राह्मं वायव्यं गोरजःस्मृतम् ॥ १०॥
यत्तसातपवर्षेण स्नानंतद्दिव्यमुच्यते ।
तत्रस्नात्वातुगंगायां स्नातोभवतिमानवः ॥ ११ ॥
स्नातुंयान्तंद्विजंसर्वे देवाःपितृगणैःसह ।
वायुभूतास्तुगच्छन्ति तृषार्त्ताःसलिलार्थिनः ॥ १२ ॥
निराशास्तेनिवर्त्तन्ते वस्त्रनिष्पीडनेकृते ।
तस्मान्नपीडयेद्वस्त्रमकृत्वापितृतर्पणम् ॥ १३ ॥
रोमकूपेष्ववस्थाप्य यस्तिलैस्तर्पयेत्पितॄन् ।
तर्पितास्तेनतेसर्वे रुधिरेणमलेनच ॥ १४ ॥
अवधूनोतियःकेशान् स्नात्वाप्रस्रवतोद्विजः ।


मुनि लोगों ने पांच स्नान पवित्र कहे हैं १ आग्नेय, २ वारुण, ३ ब्राह्म, ४ वायव्य, ५ दिव्य, ॥९॥ भस्म से किया स्नान आग्नेय, जल से किये को वारुण, (आपो हिष्ठाः ) इन तीन आदि मंत्रों से किये स्नान को ब्राह्म, गौओं के पगों से उड़ी धूलि से किये को वायव्य स्नान कहते हैं ॥१०॥ और जो वर्षाके समय धूप भी निकल रही हो उस समय मेघ की बूंदों से जो स्नान करे उसे दिव्य स्नान कहते हैं क्योंकि उस वर्षा में स्नान करके मनुष्य को गंगा के स्नान का फल होता है ॥ ११ ॥ जिस समय ब्राह्मण स्नान करने को जाता है उस समय सब देवता, पितरों के सहित तृषा से पीड़ित हुए जल के लिये वायु का रूप धारण करके ब्राह्मण के पीछे २ चलते हैं ॥१२॥ यदि वह ब्राह्मण तर्पण करनेसे पहिले वस्त्र (धोती ) निचोड़ ले तो वे निराश होकर लौट जाते हैं । तिससे देव, ऋषि, पितरों का तर्पण किये विना वस्त्र को न निचोड़े ॥१३॥ रोमों पर तिलों को रखकर जो मनुष्य पितरों का तर्पण करता है उसने अपने रुधिर और मल से उन सब पितरों को तृप्त किया जानो ॥१४॥ जो द्विज ब्राह्मण स्नान करके टपकते हुए केशों को झाड़ता है और जल के भीतर खड़ा या