भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 414

भाषार्थसहिता ॥ ८३

पुनःसंस्कारमर्हन्ति त्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ २ ॥ अजिनंमेखलादण्डो भैक्षचर्याव्रतानिच । निवर्त्तन्तेद्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि ॥ ३ ॥ स्त्रीशूद्रस्यचशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यंसमाचरेत् । पञ्चगव्यंचकुर्वीत स्नात्वापीत्वाशुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ जलाग्निपतनेचैव प्रव्रज्यानाशकेषुच । प्रत्यवसितवर्णानां कथंशुद्धिर्विधीयते ॥ ५ ॥ प्राजापत्यद्वयेनैव तीर्थाभिगमनेनच । वृषैकादशदानेन वर्णाःशुद्ध्यन्तितेत्रयः ॥ ६ ॥ ब्राह्मणस्यप्रवक्ष्यामि वनंगत्वाचतुष्पथे । सशिखंवपनंकृत्वा प्राजापत्यद्वयंचरेत् ॥ ७ ॥ गोद्वयंदक्षिणांदद्याच्छुद्धिंपराशरोऽब्रवीत् । मुच्यतेतेनपापेन ब्राह्मणत्वंचगच्छति ॥ ८ ॥


जिस में मदिरा मिली हो उस को खाकर ब्राह्मणादि तीनों द्विजाति फिर से संस्कार के योग्य होते हैं ॥ २ ॥ द्विजातियों के फिर (दुवारा) उपनयन संस्कार कर्म में मृगछाला, मूँजी मेखला, पलाशादि का दंड, भिक्षा मांगने के नियम, ये सब निवृत्त हो जाते हैं ॥३॥ स्त्री और शूद्र को यदि उक्त दोष लगे तो प्राजापत्य व्रत करें और पंचगव्य बनावें स्नान करके पंचगव्य को पीकर शुद्ध होते हैं ॥ ४ ॥ स्नान का नियम बिगड़ने, वा स्थापित अग्नि के बुझ जाने पर और संन्यास धर्म को बिगाड़ने वाला कोई काम बन पड़े तो हीन हुए तीनों वर्णों की कैसे शुद्धि हो सो कहते हैं ॥ ५ ॥ दो प्राजापत्य व्रतों से, तीर्थों की यात्रा से, ग्यारह बैलों का दान करने से, वे तीनों वर्ण क्रम से शुद्ध होते हैं ॥६॥ उन में ब्राह्मण का प्रायश्चित्त प्रथम कहते हैं। वह ब्राह्मण वन में जाकर चौराहे पर शिखा सहित सब बालों का मुंडन कराके दो प्राजापत्य व्रत करै ॥७॥ फिर दो गौ दक्षिणा में देवे यह शुद्धि पाराशर ने कही है। फिर ब्राह्मण उस पाप से छूटजाता है और ब्राह्मणपन को प्राप्त हो जाता है ॥८॥