भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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८२ पराशरस्मृतिः ॥

स्नात्वातिष्ठन्नहःशेषमभिवाद्यप्रसादयेत् ॥ ५३ ॥
ताडयित्वातृणेनापि कण्ठेबध्वापिवाससा ।
विवादेनापिनिर्जित्य प्रणिपत्यप्रसादयेत् ॥ ५४ ॥
अवगूर्यत्वहोरात्रं त्रिरात्रंक्षितिपातने ।
अतिकृच्छ्रं चरुधिरे कृच्छ्रमन्तरशोणिते ॥ ५५ ॥
नवाहमतिकृच्छ्रं स्यात्पाणिपूरान्नभोजनम् ।
त्रिरात्रमुपवासःस्यादतिकृच्छ्रःसउच्यते ॥ ५६ ॥
सर्वेषामेवपापानां संकरेसमुपस्थिते ।
शतसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रीशोधनं परम् ॥ ५७ ॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्र एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
दुःस्वप्नंयदिपश्येत्तु वान्तेवाक्षरकर्मणि ।
मैथुनेप्रेतधूमेच स्नानमेवविधीयते ॥ १ ॥
अज्ञानात्प्राश्यविण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेवच ।


जितना दिन शेष हो उतने कालतक स्नान करके खड़ा रहै फिर अभिवादन करके प्रसन्न (राजी) करावै॥५३॥ तृण से भी ब्राह्मण को ताड़ना करके और ब्राह्मण के कण्ठ में वस्त्र भी बांधकर अथवा ब्राह्मण को शास्त्रार्थ में जीतकर नमस्कार करके प्रसन्न करै ॥५४॥ ब्राह्मण की ओर गुर्गा कर या ऐंठ दिखा के एक दिन रात और पृथिवी पर पटक देकर तीन दिन रात उपवास करै। ब्राह्मण के रुधिर निकालने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे और रुधिर न निकले किन्तु दर्दी चोट लगे तो कृच्छ्रव्रत करै ॥५५॥ जो नौ ९ दिन तक पकाया हुआ अंजुलि भर अन्न खावै यह अतिकृच्छ्र होता है। या तीन दिन रात उपवास करे उसे अतिकृच्छ्र कहते हैं ॥ ५६ ॥ यदि सब पापों का संकर होजाय अर्थात् अनेक प्रकार के अनेक पाप जिस ने किये हों वह सौ हजार (एक लाख) वा सवा लाख गायत्री का अभ्यास जप करे यह अनुष्ठान परम शुद्धि करने वाला है ॥५७॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
वमन, क्षौर कर्म, मैथुन, प्रेत का धूम, इन विषयों में वा इन का खोटा स्वप्न देखे तो तत्काल स्नान करना कहा है ॥ १ ॥ अज्ञान से विष्ठा, मूत्र, और

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