अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ८१
अपचस्यचभुक्त्वाऽन्नं द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् ॥ ४७ ॥
अपचस्यतुयद्दानन्दातुरस्यकुतःफलम् ।
दाताप्रतिग्रहीताच द्वौतौनिरयगामिनौ ॥ ४८ ॥
गृहीत्वाग्निंसमारोप्य पञ्चयज्ञान्ननिर्वपेत् ।
परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिःपरिकीर्त्तितः ॥ ४९ ॥
पञ्चयज्ञान्स्वयं कृत्वा परान्नेनोपजीवति ।
सततं प्रातरुत्थाय परपाकरतस्तुसः ॥ ५० ॥
गृहस्थधर्मेयोविप्रो ददातिपरिवर्जितः ।
ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैरपचःपरिकीर्तितः ॥ ५१ ॥
युगेयुगेतुयेधर्मास्तेषुतेषुचयेद्विजाः ।
तेषांनिन्दानकर्तव्या युगरूपाहितेद्विजाः ॥ ५२ ॥
हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारंचगरीयसः ।
में कहे अपच का अन्न खाकर ब्राह्मण चान्द्रायण व्रत करे ॥ ४७ ॥ अपच पुरुष को जो दान देवे उस का दाता को फल कहां ? दान का दाता और लेने वाला ये दोनों नरक में जाते हैं ॥ ४८ ॥ जो पुरुष अग्नि को स्थापन करके अरणी में समारोप करके पञ्चमहायज्ञ न करे । मुनियों ने उसको "परपाक निवृत्त" कहा है ॥ ४९ ॥ और जो नित्य प्रातःकाल उठकर आप ही पञ्चमहायज्ञ करके अन्य के पकाये अन्न को खाता हो वह "परपाकरत" कहलाता है॥५०॥ अर्थात् ये दोनों ही बुरे निन्दित हैं । पर नाम वैश्वदेवार्थ अन्न पकाना चाहिये उसी का शेष खाना अमृतभोजन है । और पर नाम अन्य के पकाये में खाने की रुचि न रक्खे। गृहस्थोंके धर्म में तत्पर जो ब्राह्मण हो और दान धर्मसे वर्जित हो (दान कुछ न देता हो अर्थात् पञ्चमहायज्ञों द्वारा देवनादि को भी कुछ न देता हो) धर्म तत्त्व के ज्ञाता ऋषियों ने उसे "अपच" कहा है ॥५१॥ युग २ में जो भिन्न २ धर्म हैं उन २ धर्मों में तत्पर जो ब्राह्मण उन ब्राह्मणों की निन्दा नहीं करनी चाहिये क्योंकि वे ब्राह्मण युग के अनुरूप हैं सत्ययुगी, त्रेतायुगी, द्वापरयुगी, और कलियुगी ब्राह्मण भिन्न २ होंगे । कलि में अन्य युगों कैसे ब्राह्मण भी हो ही नहीं सकते ॥५२॥ बड़े विद्वान् धर्मनिष्ठ ब्राह्मण को हुंकार और किसी मान्य पुरुष से त्वंकार ( हुंः या तूं ) जिस समय कहे उस समय
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