भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पाराशरसंहिता ॥

पुनःप्रत्यागतोवेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥ ६९ ॥
सपुत्रःसहभृत्यश्च कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।
गाश्चैकशतंदद्याच्चातुर्विद्येषुदक्षिणाम् ॥ ७० ॥
ब्राह्मणानांप्रसादेन ब्रह्महातुविमुच्यते ।
विन्ध्यादुत्तरतोयस्य संवासःपरिकीर्त्तितः ॥ ७१ ॥
पराशरमतंतस्य सेतुबन्धस्यदर्शनात् ।
सवनस्थांस्त्रियंहत्वा ब्रह्महत्याव्रतंचरेत् ॥ ७२ ॥
सुरापश्चद्विजःकुर्यान्नदींगत्वासमुद्रगाम् ।
चान्द्रायणेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ ७३ ॥
अनडुत्सहितांगांच दद्याद्विप्रेषुदक्षिणाम् ॥ ७४ ॥
सुरापानंसकृत्कृत्वा अग्निवर्णांसुरांपिवेत् ।
सपावयेदिहात्मानमिहलोकेपरत्रच ॥ ७५ ॥
अपहृत्यसुवर्णंतु ब्राह्मणस्यततःस्वयम् ।
गच्छेन्मुशलमादाय राजानंस्ववधायतु ॥ ७६ ॥


तो अश्वमेध यज्ञ करै। फिर तीर्थ यात्री लौटकर घर में बसने के लिये आवे ॥ ६९ ॥ तब पुत्र और भृत्यों सहित ब्राह्मणों को जिमावे और चारो वेदों को पढ़ने जानने वाले ब्राह्मणों को सौ १०० गौ दक्षिणा में देवे ॥ ७० ॥ तब ब्राह्मणों को प्रसन्न सन्तुष्ट करने से ब्रह्महत्या से छूटजाता है। विन्ध्याचल पर्वत से उत्तर जो वसता है ॥७१॥ उस के लिये पाराशर ऋषि ने सेतुबन्ध का दर्शन कहा है। जिस के शीघ्र सन्तान होने वाला हो ऐसी स्त्री को मार डाले तो ब्रह्महत्या का व्रत करे ॥ ७२ ॥ मदिरा पीने वाला ब्राह्मण समुद्र तक जाने वाली नदी पर जाके चान्द्रायण व्रत करे फिर व्रत के पूरे होने पर ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ७३ ॥ एक बैल सहित एक गौ ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ ७४ ॥ अथवा जो शुद्ध ब्राह्मण एक बार भी मदिरा को पीवे वह अग्नि वर्ण (अत्यन्त उष्ण) मदिरा पीकर प्राण त्याग करे तो इस लोक और परलोक में अपने को पवित्र कर लेता है ॥७५॥ ब्राह्मण के सुवर्ण को चुराकर आप ही मूसल को हाथ में लेके अपने मारने के लिये राजा के समीप जाय ॥७६॥