अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें९५ पराशरस्मृतिः ॥
हतःशुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौमुक्तएवच ।
कामतस्तु कृतंयत्स्यान्नान्यथावधमर्हति ॥ ७७ ॥
आसनाच्छयनाद्यानात्संभाषात्सहभोजनात् ।
संक्रामन्तीहपापानि तैलविन्दुरिवाम्भसि ॥ ७८ ॥
चान्द्रायणंयावकंच तुलापुरुषएवच ।
गवांचैवानुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ७९ ॥
एतत्पाराशरंशास्त्रं श्लोकोनांशतपञ्चकम् ।
द्विनवत्यासमायुक्तं धर्मशास्त्रस्यसंग्रहः ॥ ८० ॥
यथाध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदंतथा ।
अध्येतव्यंप्रयत्नेन नियतंस्वर्गकामिना ॥ ८१ ॥
इति श्रीपाराशरीये धर्म्मशास्त्रे सकलप्रायश्चित्त
निर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः समाप्तः
समाप्ता च पाराशरसंहिता ॥
तब यदि राजा मरवा डाले वा उचित समझ के छोड़ देवे तो भी दोनों हालत में पाप से छूट जाता है ॥ यदि जान कर चोरी की हो तो मारने के योग्य है अन्यथा वध करने योग्य नहीं है ॥ ७७ ॥ एक जगह बैठने, लेटने, एक सवारी में बैठ कर चलने, पास २ बैठ कर वार्तालाप करने और साथ २ बैठ कर भोजन करने से पापियों के पाप अरुद्ध लोगों को लगते हैं कि जैसे जल में तेल का बिन्दु फैलजाता है ॥ ७८ ॥
चान्द्रायण, यावक (जौ को ही खाना,) और तुला पुरुष =तुलादान करना, गौओं के पीछे गमन करना, अर्थात् तन मन धन से गोरक्षा में तत्पर होना ये काम सब पापों को नाश करने वाले हैं ॥ ७९ ॥ यह पाराशर ऋषि का कहा धर्मशास्त्र जिसमें पांच सौ वानवे ५९२ श्लोक हैं । सो यह धर्मशास्त्र का संक्षेप से संग्रह किया है ॥ ८० ॥ जैसे वेद के अध्ययन सम्बन्धी कर्म पुण्योत्पादक हैं वैसा ही यह धर्मशास्त्र है इसलिये स्वर्ग की इच्छा रखने वाले पुरुष को यह धर्मशास्त्र यत्न से पढ़ना चाहिये ॥ ८१ ॥
यह पाराशरीय धर्मशास्त्र के पं० भीमसेन शर्मकृत भाषानुवाद में समस्त प्रायश्चित्त निर्णय नामक बारहवां १२ अध्याय पूरा हुआ ॥
और यह ११ वीं पाराशरस्मृति समाप्त हुई ॥