भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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॥ श्रीगणेशायनमः ॥

अथ व्यासस्मृतिप्रारम्भः

वाराणस्यांसुखासीनं वेदव्यासंतपोनिधिम् ।
पप्रच्छुर्मुनयोऽभ्येत्य धर्मान्वर्णव्यवस्थितान् ॥ १ ॥
सपृष्टःस्मृतिमान्स्मृत्वा स्मृतिंवेदार्थगर्भिताम् ।
उवाचाथप्रसन्नात्मा मुनयःश्रूयतामिति ॥ २ ॥
यत्रयत्रस्वभावेन कृष्णसारोमृगःसदा ।
चरतेतत्रवेदोक्तो धर्मोभवितुमर्हति ॥ ३ ॥
श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोघायत्रदृश्यते ।
तत्रश्रौतं प्रमाणन्तु तयोर्द्वैधेस्मृतिर्वरा ॥ ४ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्त्रयोवर्णाद्विजातयः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त धर्मयोग्यास्तुनेतरे ॥ ५ ॥
शूद्रोवर्णश्चतुर्थोपि वर्णत्वाद्धर्ममर्हति ।


काशी में सुख पूर्वक बैठे हुए तपस्वी वेदव्यास जी के समीप जा कर मुनियों ने वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी धर्म पूछे ॥ १ ॥ मुनियों से पूछे हुए बुद्धिमान् वेदव्यास जी वेदार्थगर्भित धर्मशास्त्र का स्मरण कर और प्रसन्न होके तुम सुनो ऐसा बोले ॥ २ ॥ जिस २ देश में स्वभाव से ही कृष्ण मृग सदैव विचरता है उस देश में वेदोक्त धर्म का प्रचार वा अनुष्ठान ठीक २ हो सकता है ॥ ३ ॥ जिस विषय में श्रुति स्मृति-और पुराण का परस्पर विरोध दीख पड़े वहां वेदोक्त का प्रमाण मानो तथा स्मृति और पुराण के विरोध में स्मृति उत्तम है अर्थात् स्मृति का कहा कर्म करना चाहिये ॥ ४ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ये तीन वर्ण द्विजाति कहाते हैं और विशेष कर ये ही तीनों वेद स्मृति, और पुराणों में कहे धर्म के अधिकारी हैं अन्य नहीं ॥ ५ ॥ चौथा शूद्र भी वर्ण होने से वेद मन्त्र, स्वधा, स्वाहा, वषट्कार आदि को छोड़ के शेष स्मृति-