भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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९२ पराशरस्मृतिः ॥

सहस्रंतुजपेद्देव्याः प्राणायामैस्त्रिभिःसह ॥ ६२ ॥ चातुर्वेद्योपपन्नस्तु विधिवद्ब्रह्मघातके । समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तंसमादिशेत् ॥ ६३ ॥ सेतुबन्धपथेभिक्षां चातुर्वर्ण्यात्समाचरेत् । वर्जयित्वाविकर्मस्थान् छत्रोपानद्विवर्जितः ॥ ६४ ॥ अहंदुष्कृतकर्मावै महापातककारकः । गृहद्वारेषुतिष्ठामि भिक्षार्थीब्रह्मघातकः ॥ ६५ ॥ गोकुलेषुवसेच्चैव ग्रामेषुनगरेषुच । तपोवनेषुतीर्थेषु नदीप्रस्रवणेषुच ॥ ६६ ॥ एतेषुख्यापयन्नैनः पुण्यंगत्वातुसागरम् । दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥ ६७ ॥ रामचन्द्रसमादिष्टं नलसंचयसंचितम् । सेतुंदृष्ट्वासमुद्रस्य ब्रह्महत्यांव्यपोहति । सेतुंदृष्ट्वाविशुद्धात्मा त्ववगाहेतसागरम् ॥ ६८ ॥ यजेतवाश्वमेधेन राजातुपृथिवीपतिः ।


भूमि पर गिरावे तौ वह तीन प्राणायाम के साथ एक हजार गायत्री का जप करे ॥ ६२ ॥ विधिपूर्वक जिसने चारों वेद पढ़े जाने हों वह यदि ब्रह्महत्या करे तो सेतुबंध रामेश्वर पर जाना प्रायश्चित्त बतावे ॥ ६३ ॥ और वह प्रायश्चित्ती जूता और छाता का धारण न करके सेतुबन्ध के मार्ग में हिंसा चोरी व्यभिचारादि दुष्कर्मियों को छोड़ के शेष चारों वर्णों से भिक्षा मांगता खाता जावे ॥ ६४ ॥ वह भिक्षा मांगते समय ऐसे कहा करे कि "मैं खोंटा कर्म करने वाला और महापातक कर्त्ता हूं। मुझे ब्रह्महत्या लगी है भिक्षा के लिये आपके द्वारे पर खड़ा हूं" ॥६५॥ ग्राम, वा नगरों की गोशाला धर्मशालादि में रात को बसे। तपो बनों में, तीर्थों में, नदी के सोताओं पर ॥६६॥ इन सब स्थानों में अपने पाप को प्रकट करता हुआ दश योजन चौड़े और सौ योजन लंबे पवित्र समुद्र पर जावे ॥ ६७ ॥ महाराजा भगवान् रामचन्द्र जी की आज्ञा से नलवानरके बनाये हुए समुद्र के सेतु को देखकर ब्रह्महत्या को दूरकरता है। सेतु के दर्शन करके विशुद्ध मन हुआ सागर में स्नान करे ॥६८॥ और पृथ्वी का पति राजा ब्रह्महत्या करे

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