अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 508, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ शंखस्मृतिः ॥
यस्तुभुङ्क्तेपराशौचे वर्णीसोप्यशुचिर्भवेत् ।
आशौचशुद्धौशुद्धिश्च तस्याप्युक्तामनीषिभिः ॥ २३ ॥
पराशौचेनरोभुक्त्वा कृमियोनौप्रजायते ।
भुक्त्वाऽन्नंम्रियतेयस्य तस्ययोनौप्रजायते ॥ २४ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायःपितृकर्मच ।
प्रेतपिण्डक्रियावर्जमाशौचेविनिवर्तते ॥ २५ ॥
इति शांखे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
मृन्मयंभाजनंसर्वं पुनःपाकेनशुद्ध्यति ।
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा ष्ठीवनैःपूयशोणितैः ॥ १ ॥
संस्पृष्टंनैवशुद्ध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ।
एतैरेवतथास्पृष्टं ताम्रसौवर्णराजतम् ॥ २ ॥
शुद्ध्यत्यावर्तितंपश्चादन्यथाकेवलाम्भसा ।
जो ब्रह्मचारी पराये घर मृतक में खाता है, वह भी अशुद्ध होता है और मृतक की शुद्धि होने पर उस की भी बुद्धिमानों ने शुद्धि कही है ॥२३॥ पराये अशौच में खाकर मनुष्य कीड़ों की योनि में जन्म लेता है और जिस के अन्न को खाकर पेट में रक्खे हुए मरता है उसी की जाति में पैदा होता है ॥२४॥ दान देना, दान लेना, होम, वेदपाठ, पितरों का कर्म, ये सब, प्रेत के लिये पिण्ड दान के कर्म को छोड़ कर मृतक में निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् सूतक के समय दानादि कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २५ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥
मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से शुद्ध हो जाता है, परन्तु मदिरा, मूत्र, विष्ठा, थूक, राध (पीव) और रुधिर, ॥१॥ ये मद्यादि जिस में रक्खे गये हों, ऐसा मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से भी शुद्ध नहीं होता और इन मद्यादि का ही स्पर्श जिस में हुआ हो, ऐसा तांबे, सोने और चांदी का पात्र ॥ २ ॥ फिर अचाने से शुद्ध होता और अन्य किसी प्रकार से अशुद्ध हो, तो केवल जल से धोकर शुद्ध होता है। खटाई के जल से धोने पर तांबा, सीसा और लास के