अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ४५
नाभेरूर्ध्वंनरःस्पृष्टः सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ १८ ॥
कृत्वामूत्रंपुरीषंवा स्नात्वाभोक्तुमनास्तथा ।
भुक्त्वाक्षुत्वात्तथासुप्त्वा पीत्वाचाम्भोऽवगाह्यच ॥१९॥
रथ्यामाक्रम्यवाऽऽचामेद्वासोविपरिधायच ।
कृत्वामूत्रंपुरीषंच लेपगन्धापहंद्विजः ॥ २० ॥
उद्धृतेनाम्भसाशौचं मृदाचैवसमाचरेत् ।
मेहनेमृत्तिकाःसप्त लिङ्गेद्वेपरिकीर्तिते ॥ २१ ॥
एकस्मिन्विंशतिर्हस्तेद्वयोर्ज्ञेयाप्ततुर्दश ।
तिस्रस्तुमृत्तिकाज्ञेयाः कृत्वानखविशोधनम् ॥ २२ ॥
तिस्रस्तुपादयोर्ज्ञेयाः शौचकामस्यसर्वदा ।
शौचमेतद्गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ २३ ॥
त्रिगुणंतुवनस्थानां यतीनांतुचतुर्गुणम् ।
मृत्तिकाचविनिर्दिष्टा त्रिपर्वपूरयेत्तया ॥ २४ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
शरीर में गांव की गली का जल या थूक लगजाय तो उसी समय स्नान करने से शुद्ध होता है ॥१८॥ लघु शंका, मल का त्याग, भोजन करना, नाक छिनकना, सोना, जल पीना, और जल में अवगाहन (स्नान आदि) इन कामों को करके भोजन से पहिले ॥१९॥ गली में चल कर और वस्त्रों को धारण करके आचमन करे मल मूत्र का त्याग करके द्विज जिससे दुर्गन्ध दूर हो ॥ २० ॥ ऐसी शुद्धि कृपादि से निकाले जल और मिट्टी से करे, मल मूत्र त्यागने पश्चात् गुदेन्द्रिय में सात बार, लिंगेन्द्रिय में दो बार मट्टी लगानी कही है ॥ २१ ॥ एक बांय हाथ में बीस बार और फिर दोनों में चौदह बार फिर नखों की शुद्धि करके तीन बार मट्टी लगानी जानो ॥ २२ ॥ शुद्धि की इच्छा वाले पुरुष को तीन बार पगों में मट्टी लगानी कही है। यह शुद्धि गृहस्थों के लिये कही है इससे दूनी ब्रह्मचारियों को ॥२३॥ तिगुनी वानप्रस्थों को और चौगुनी संन्यासियों के लिये जानो और प्रत्येक बार में इतनी मट्टी लेवे जिससे हाथ के तीन अंगुल भर जावें ॥ २४ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥