भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिस्मृतिः ॥ ३१

पर्युषितेत्वहोरात्र-मतिरिक्तेदिनत्रयम् । शिरःकंठोरुपादांश्च सुरयायस्तुलिप्यते ॥२०६॥ दशषट्त्रितयैकाहं चरेदेवमनुक्रमात् । अत्राप्युदाहरन्ति ॥ प्रमादान्मद्यपसुरां सकृत्पीत्वाद्बिजोत्तमः ॥ २०७ ॥ गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति । मद्यपस्यनिषादस्य यस्तुभुङ्क्तेद्विजोत्तमः ॥ २०८ ॥ गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति । मद्यपस्यनिषादस्य यस्तुभुंक्तेद्विजोत्तमः ॥ २०६ ॥ नदेवाभुञ्जतेतत्र नपिबन्तिहविर्जलम् । चितिभ्रष्टातुयानारी ऋतुभ्रष्टाचव्याधितः ॥२१०॥ प्राजापत्येनशुद्ध्येत ब्राह्मणानांतुभोजनात् ।


उक्त कूप का जल पीकर वामी होगया पच गया होय तो एक रातदिन उपवास करे और अधिक समय बीत गया हो तो तीन उपवास करे। शिर कण्ठ जांघ पैर इन को जो मदिरा से लीपले तो ॥ २०६॥ वह क्रम से दश-छः-तीन एक-दिन के व्रत को करे इस विषय में और ऋषि भी कहते हैं-कि प्रमाद से मदिरा पीनेवाले की मदिरा को ब्राह्मण एक वार भी पी लेतो ॥२०७॥ गोमूत्र और जौको खाता हुआ दश दिन में शुद्ध होता है और जो ब्राह्मण मदिरा पीने वाले और निषाद (बधिक बहेलिया) के यहां भोजन करता है ॥ २०८ ॥ वह भी गोमूत्र और जौ को खाता हुआ दश दिन में शुद्ध होता है जो ब्राह्मण मदिरा पीने वाले और निषाद का भोजन खाता है । २०९॥ उस के यहां देवता हवि (साकल्य) को नहीं खाते और न जल पीते हैं। जो स्त्री चिति (ज्ञान) से भ्रष्ट (बावली) हो और व्याधि के द्वारा मासिक धर्म भ्रष्ट होगई हो ॥२१०॥ वह प्राजापत्यव्रत और ब्राह्मणों के जिमाने से शुद्ध होती है-जो ब्राह्मण सं-