भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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३८भाषार्थसहिता-

येचप्रव्रजिताविप्राः प्रव्रज्याग्निजलावहाः ॥२११॥
अनाशकान्निवर्तन्ते चिकीर्षन्तिगृहस्थितिम् ।
धारयेत्रीणिकृच्छ्राणि चान्द्रायणमथापिवा ॥२१२ ॥
जातकर्मादिकंमोक्तं पुनःसंस्कारमर्हति ।
नाशौचंनोदकंनाश्रु नापवादानुकम्पने ॥ २१३ ॥
ब्रह्मदण्डहतानांतु नकार्यं कटधारणम् ।
स्नेहंकृत्वाभयाद्विभ्यो यस्त्वेतानिसमाचरेत् ॥२१४॥
गोमूत्रयावकाहारः कृच्छ्रमेकंविकशोधनम् ।
वृद्धःशौचस्मृतेर्लुप्तः प्रत्याख्यातभिषक्क्रियः ॥२१५॥
आत्मानंघातयेद्यस्तु शृङ्ग्यग्न्यनशनाम्बुभिः ।
तस्यत्रिरात्रमाशौचं द्वितीयेत्वस्थिसंचयः ॥ २१६ ॥


न्यास की अग्नि और जल में बहते हुए अर्थात् सन्यासियों के धर्म में आरूढ़ हुए संन्यासी होगए हैं ॥ २११ ॥ फिर अशक्ति (असामर्थ्य) से संन्यासी के धर्म से निवृत्त होते हैं और घर में रहना चाहते हों तो वे तीन कृच्छ्र अथवा एक चांद्रायण व्रत का अनुष्ठान करें ॥२१२॥ और जात कर्मादि उपनयनतकसंस्कार उनसंन्यास से लौटने वालों के फिर करने होते हैं-शौच, और जल का दान-शीघ्र श्राद्धादि निंदा-दया ॥ २१३ ॥ और मृतक की पिंजरी का उठा-ना ये काम उन के मरने पर न करै जिन को ब्राह्मणों ने शाप दिया हो, औरजो प्रीति के कारण वा किसीभयादिकारण से पूर्वोक्तशौच आदि को करता है॥२१४॥ तो गोमूत्र और जौ को खाते हुए उस की एक कृच्छ्र से शुद्धि होती है-जो पु-रुष वृद्ध हो और अशुद्ध हो और जिसे कुछ ज्ञान न हो, और वैद्यों की चि-कित्सा भी जिसने त्याग दी हो ॥२१५॥ और वह सींग वाले पशु(बैल आदि) अग्नि, भोजन का त्याग-और जल में डूबना इन से अपने आत्मा का घात करै तो उस मनुष्य का आशौच (सूतक) तीन दिन का होता है और दू-सरे दिन अस्थि संचय होता है ॥ २१६ ॥