अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥ ५
४-इन धर्मशास्त्रों में अनेक विचार आप को ऐसे मिलेंगे कि जिन को न जानने के कारण ही आप उन कामों को विरुद्ध करते होंगे । और जब जान लोगे तो ठीक २ करने लगोगे । तब उस से आप का कुछ कल्याण भी अवश्य होगा । जैसे शिर बांध के भोजन न करना, शिर खोल के मल मूत्र त्याग न करना, पूर्व को पग करके कदापि न सोना, इत्यादि कामों के करने में जो कुछ समय वा श्रम आप करते हैं वही आगे भी लगेगा पर यदि शास्त्र की आज्ञानुकूल उन २ कामों को करोगे तो सहज में ही कुछ धर्म कर लोगे ।
५-यद्यपि सभी धर्मशास्त्र अनेक प्रकार से मनुष्य को कल्याण का मार्ग दिखाने वाले होने से अत्युम हैं तथापि कात्यायन, व्यास, पराशर, शंख, दक्ष, गौतम और वसिष्ठादि कई स्मृतियां उन में और भी अत्यन्त उपकारी हैं । कात्यायन में कर्मकाण्ड, व्यास में पातिव्रताधर्म, दानधर्मादि, पराशर में ब्रह्मकूर्च व्रतादि, शंख में वर्णाश्रम धर्मादि, दक्ष में दिनचर्या वा रात्रिचर्या-योगाभ्यासादि, गौतम में ४८ अड़तालीस संस्कारादि, वसिष्ठ में संन्यासादि, विषय अधिक प्रशंसनीय हैं ।
६-इन स्मृतियों में, शिक्षा, विद्या, सामान्यनीति, राजनीति, स्त्रीशिक्षा, योग, ज्ञान, उपासना, देवपूजा और धर्मादि का विचार ऐसा भी है जो सभी के लिये उपयोगी होगा ।
७-विशेष कर स्मृतियों के संक्षिप्त विषय-१-प्रायश्चित्त, २-वर्णधर्म, ३-आश्रम धर्म, ४-सूतक शुद्धि, ५-द्रव्यशुद्धि, ६-गर्भाधानादि संस्कार, ७-सन्ध्या, ८-श्राद्ध-तर्पण, ९-पञ्चमहायज्ञ, १०-पातिव्रतधर्म, ११-भक्ष्याभक्ष्य, १२-आपद्धर्म, १३-वेद का अभ्यास तथा महत्त्व, १४-आचार, इत्यादि संक्षेप से धर्मशास्त्रों का विषय जानो ॥
८-हमारी राय जाति निर्णय के विषय में यह है कि जो कायस्थ, रथकार, स्वर्णकार, आदि जाति हैं वे लोग धर्मशास्त्रों में लिखे निर्विवाद उत्तमाचरणों के द्वारा श्रेष्ठ बनने का उद्योग करें तो उन के लिये भविष्यत् में कल्याण की संभावना है ।
९-दक्षस्मृति में नौ २ की संख्या वाले नौनवें इकासी उपदेश देखने योग्य सब के लिये विशेष उपकारी हैं ।
१०-इन स्मृतियों के जो २ पारिभाषिक शब्द (ब्रह्मकूर्च, कृच्छ्र, समकृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, कृच्छ्रातिकृच्छ्र, कृच्छ्रसान्तपन, प्राजापत्य, पराककृच्छ्र, चान्द्रा-