अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 7, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६ अष्टादशस्मृति प्रस्तावः ॥
यण ) इत्यादि के लक्षण वा अर्थ गोतमस्मृति के २७ । २८ अध्यायादि में वा अन्यस्मृतियों में जहां २ कहे हैं वहीं से पाठक महाशय जानकर सर्वत्र वही लक्षण जान लेवें । इसीसे जहां २ कृच्छ्रादि शब्द आये हैं वहां २ सर्वत्र उनके लक्षण हमने नहीं दिखाये हैं । ब्रह्मकूर्च व्रत की प्रशंसा धर्मशास्त्रों में बहुत बढके की गयी है । इस ब्रह्मकूर्च का लक्षण व्याख्यान वा विधान पराशर स्मृति के ११ वें अध्याय में देखिये ।
११-कृच्छ्रादि सभी व्रतों के लिये सामान्य विचार ये हैं कि-ब्राह्मणादि द्विज शिखा को छोड़ के अन्य सब मूंछों सहित बाल मुड़ा के अपने २ वर्ण के दण्ड, कमण्डलु, मेखला, श्वेत लाल पीले वस्त्र तथा मृग चर्मादि ब्रह्मचर्य के चिह्न धारण कर के बाग, देवस्थान, वा जलाशय के तट पर शुद्ध एकान्त स्थान में रहें, संसारी काम अथवा बात चीत कुछ न करें, शूद्रादिनीचों से कुछ भी न बोलें, प्रयोजन मात्र द्विजों से बोलें, प्रायः मौन रहें, तीन बार स्नान करें वा छः बार स्नान करें अपने २ गुरु मन्त्र सावित्री का जप करें, व्याहृतियों से होम करें इत्यादि नियम भी पाठकों को इन्हीं धर्म शास्त्रों के देखने से ज्ञात होंगे ।
१२-अब अन्तिम निवेदन यह है कि इन १८ स्मृतियों के छपाने वा अर्थ करने में यथासम्भव हम ने सावधानी से शुद्ध करने का उद्योग किया है। तथापि कई कारणों से जो २ त्रुटि हमारे पाठकों को ज्ञात हों उन को पण्डितों की राय से सम्हाल लें और हमारे गुण वा परिश्रम को सादर स्वीकार करते हुए तथा दोषों पर ध्यान न देते हुए उनसे उपेक्षा वृत्ति करें । क्योंकि मनुष्यको गुण ग्राही होने में जो लाभ तथा सुख होता है वह दोष दर्शी को कदापि नहीं होता । परन्तु जो२ अशुद्धि तथा अर्थ करने में कहीं२ भूल जान पड़े उनको विचार पूर्वक शुद्ध करने का उद्योग अवश्य करें
ह० भीमसेन शर्मा
सम्पादक ब्राह्मण सर्वस्व इटावा