अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअग्निस्मृतिः ॥ ४५
वृथापाकस्यभुञ्जानः प्रायश्चित्तंचरेद्द्विजः ।
प्राणानप्सुत्रिरायम्य घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥२५३॥
वैदिकेलौकिकेवापि हुतोच्छिष्टेजलेक्षितौ ।
वैश्वदेवंप्रकुर्वीत पंचसूनापनुत्तये ॥ २५४ ॥
कनीयान्गुणवांश्चैव ज्येष्ठश्चेन्निर्गुणोभवेत् ।
पूर्वं पाणिंगृहीत्वाच गृह्याग्निंधारयेद्बुधः ॥२५५॥
ज्येष्ठश्चेद्यदिनिर्दोषो गृह्णात्यग्नियवीयसः ।
नित्यंनित्यंभवेत्तस्य ब्रह्महत्यानसंशयः ॥२५६॥
महापातकि संस्पृष्टः स्नानमेवविधीयते ।
संस्पृष्टस्ययदाभुंक्ते स्नानमेवविधीयते ॥२५७॥
पतितैःसहसंसर्गं-मासादुर्द्धंमासमेवच ।
गोमूत्रयावकाहारोमासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ २५८ ॥
वृथापाक के अन्न को जो द्विजखाले वह इस प्रायश्चित्त को करे कि जलके मध्य में तीन बार प्राणायाम करके घृत को खाकर शुद्ध होता है ॥२५३॥
विधिपूर्वक स्थापित किये वा चूल्हे आदि के वा जिस में होम हो चुका हो ऐसे अग्नि में वा जल में अथवा भूमि पर बलि वैश्वदेव को पांच हत्या के दूर करने के निमित्त अवश्य करे ॥२५४॥
यदि जेठा भाई मुर्ख हो और छोटा विद्वान् हो तो ज्ञानी छोटा भाई जेठे से पहिले विवाह करके गृह्य अग्नि को धारणा करे ॥२५५॥
यदि जेठा भाई निर्दोष हो और छोटा भाई अग्निहोत्र को ग्रहण कर ले तो प्रतिदिन उसे ब्रह्महत्या लगती है इस में संशय नहीं है ॥२५६॥
महापातकी ने जिस को छू लिया हो वह, और महापातकी से स्पर्श किये हुए के भोजन को जिस ने किया हो वह इन दोनों की स्नान मात्र से शुद्धि होती है ॥२५७॥
पतित के साथ जिसने पन्द्रह दिन अथवा एक मास तक मेल मिलाप किया हो वह पन्द्रह दिन तक गोमूत्र और जौ को खाकर शुद्ध होता है ॥ २५८ ॥