अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ भाषार्थसहिता ॥
देवयात्राविवाहेषु यज्ञप्रकरणेषु च । उत्सवेषुचसर्वेषु स्पृष्टास्पृष्टंनविद्यते ॥२४७॥ आलनालंतथाक्षीरं कन्दुकन्दधिसक्तवः । स्नेहपक्वं च तक्रंच शूद्रस्यापिनदुष्यति ॥२४८॥ आर्द्रमांसंघृतंतैलं स्नेहाश्चफलसम्भवाः । अन्त्यभांडस्थितास्त्वेते निष्क्रान्ताःशुद्धिमाप्नुयुः॥२४९॥ अज्ञानात्पिबतेतोयं ब्राह्मणःशूद्रजातिषु । अहोरात्रोषितःस्नात्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥२५०॥ आहिताग्निस्तुयोविप्रो महापातकवान्भवेत् । अप्सु प्रक्षिप्यपात्राणि पश्चादग्निंविनिर्दिशेत् ॥२५१॥ योगृहीत्वाविवाहाग्निं गृहस्थइतिमन्यते । अन्नंतस्यनभोक्तव्यं वृथापाकोहिसःस्मृतः ॥२५२॥
तीर्थादि पर देवताओं की यात्रा-विवाह-यज्ञ का प्रकरण और संपूर्ण उत्सवों में स्पर्श करने के योग्य और अयोग्य का दोष नहीं होता है ॥२४७॥ आल का नाल ( चने आदि की खटाई ) दूध-कन्दुक (भाड़) दही सत्तू-स्नेह ( घी तेल ) से पका हुआ पदार्थ-और मठा ये वस्तु शूद्र के भी दूषित नहीं हैं किन्तु खा लेने योग्य होते हैं ॥ २४८ ॥ गीला मांस-घृत-तेल-फल से उत्पन्न हुए तैलादि अन्त्यज के पात्र में रक्खे भी हों पर निकाल लेने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥२४९॥ जो ब्राह्मण शूद्र जातियों का जल अज्ञान से पीले तो दिन रात का उपवास और पंचगव्य पीकर शुद्ध होता है ॥ २५० ॥ जो अग्निहोत्री ब्राह्मण महापातकी हो जाय तो होम के पात्रों को जल में फेंककर फिर विधिपूर्वक अग्नि को स्थापित करे ॥२५१॥ जो विवाह की अग्नि को ग्रहण करके अर्थात् स्मार्त्त अग्निहोत्र को लेकर अपने को गृहस्थी मानता है अर्थात् उस अग्नि में पक्षयाग तथा पंचमहायज्ञादि नित्य २ नहीं करता इस से उस का अन्न नहीं खाना जिस से ऋषियों ने उसे वृथापाक कहा है ॥२५२॥