अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥ ४९
द्विजःस्पृष्ट्वानभुञ्जीत भुञ्जानोयदिसंस्पृशेत् ॥२६५॥
अतःपरंतुभुञ्जीत त्यक्त्वाऽन्नंस्नानमाचरेत् ।
ब्राह्मणैःसमनुज्ञातस्त्रिरात्रमुपवासयेत् ॥२६६॥
सघृतंयावकं प्राश्य व्रतशेषंसमापयेत् ।
भुञ्जानः संस्पृशेद्यस्तु वायसंकुकुटंतथा ॥ २६७ ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-दथोच्छिष्टस्त्वहेनतु ।
आरूढोनैष्ठिकेधर्मे यस्तुप्रच्यवतेपुनः ॥ २६८ ॥
चान्द्रायणंचरेन्मास-मितिशातातपोऽब्रवीत् ।
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यंविधीयते ॥ २६९ ॥
गवांगमनेमनुप्रोक्तं व्रतं चान्द्रायणंचरेत् ।
अमानुषीषुगोवर्जं मुदक्यायामयोनिषु ॥ २७०॥
रेतःसिक्त्वाजलेचैव कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ।
उदक्यांसूतिकांवापि अंत्यजांस्पृशतेयदि ॥२७१॥
का छून का स्पर्श करे तो भोजन न करे-अर्थात् उपवास करे ॥ २६५ ॥ स्पर्श
करने के पश्चात् भोजन न करे किन्तु उस अन्न को त्याग कर स्नान करे और
ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर तीन उपवास करे ॥२६६॥ और घीमें मिले जौ को
खाकर बाकी व्रत को पूरा करे-यदि भोजन करता हुआ काक और मुरगे को
छूले ॥२६७॥ तो तीन दिन में शुद्धि होती है यदि उच्छिष्ट हुआ पूर्वोक्तों का स्पर्श
करले तो एक दिन में शुद्ध होता है-जो नैष्ठिक धर्म जन्मभर ब्रह्मचारी रहता हु-
आ गुरु सेवाकी प्रतिज्ञा करके उसको त्यागता है ॥२६८॥ वह एक मासभर
चांद्रायण व्रत करै यह शातातप ऋषिने कहा है । पशु और वेश्या के संग गमन
करने से प्राजापत्य व्रत कहा है ॥२६९॥ गौवों के संग गमन (मैथुन) कर के मनु
के कहे हुए चांद्रायण व्रतको करे-गौसे भिन्न पशु की योनि और रजस्वला और
योनि से भिन्न (भूमि आदि) में ॥२७०॥ और जल में वीर्य को सींच कर सांतपन
कृच्छ्रकरै । चांडाली-सूतिका-और अंत्यज की स्त्री इनका यदि स्पर्शकरै तो ॥२७१॥