अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ भाषार्थंसहिता ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-द्विधिरेषपुरातनः ।
संसर्गंयदिगच्छेच्चे-दुदक्यावातथांत्यजैः ॥ २७२ ॥
प्रायश्चित्तीसविज्ञेयः पूर्वंस्नानंसमाचरेत् ।
एकरात्रंचरेन्मूत्रं पुरीषंतुदिनत्रयम् ॥ २७३ ॥
दिनत्रयंतथापानं मैथुनेपंचसप्तवा ।
स्मृत्यन्तरे
अंगीकारेणज्ञातीनां ब्राह्मणानुग्रहेणच ॥ २७४ ॥
पूयन्तेतत्रपापिष्ठा महापातकिनोऽपिये ।
भोजनेतुप्रसक्तानां प्राजापत्यंत्रिधीयते ॥ २७५ ॥
दंतकाष्ठेत्वहोरात्र-मेषशौचविधिःस्मृतः।
रजस्वलायदास्पृष्टा श्वानचांडालवायसैः ॥ २७६ ॥
निराहाराभवेत्तावत् स्नात्वाकालेनशुद्ध्यति ।
तीन दिन में शुद्धि होती है,यह पुरानी विधिहै-रजस्वला और अन्त्यज स्त्री इनके संग जो मेल होजाय ॥२७२॥ तो वह इस प्रायश्चित्त के योग्य है कि पहिले स्नान करै फिर एक दिन गोमूत्र और तीन दिन गोबर को भक्षण करै ॥ २७३ ॥ रजस्वला तथा अंत्यजा स्त्री इनके जलपान और मैथुन करने में पांच अथवा सात दिन पूर्वोक्त प्रायश्चित्त करे-यह अन्यस्मृ-तियों में लिखा है कि कुटुम्बी पुरुषों के स्वीकार करने और ब्राह्मणों के अनुग्रह से ॥ २७४ ॥ जो महापातकी भी पापी हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं और निषिद्ध नीच लोगों के भोजन में जो आसक्त हैं वे प्राजापत्यव्रत करें ॥२७५॥ नीच मनुष्यकी दी दातौन करने में जो प्रसक्त हैं वे एक दिनरात प्रायश्चित्त करें यह शौच की विधि कही=जिस रजस्वला स्त्री को कुत्ता चांडाल काक ये स्पर्श करलें ॥२७६॥ वह रजकी शुद्धितक निराहार रहे और शुद्ध होनेके समय (चौथेदिन) स्नान करके शुद्ध हो जाती है-यदि रजस्वला स्त्री को ऊंट-