भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

अत्रिसमृतिः ॥ ४२

रजस्वलायदास्पृष्टा उष्ट्रजंबुकशंबरैः ॥ २७७ ॥
पञ्चरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्यो न्यंब्राह्मणयाब्राह्मणीचया २७८
एकरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याक्षत्रियाचया ॥२७६॥
त्रिरात्रेणविशुद्धिःस्याद् व्यासस्यवचनंयथा ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याशूद्रसंभवा ॥ २८० ॥
षट्रात्रेणविशुद्धिःस्याद् ब्राह्मणीकामकारतः ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यंब्राह्मण्यावैश्यसंभवा ॥ २८१ ॥
चतूरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
अकामतश्चरेदूर्ध्वं ब्राह्मणीसर्वतःस्पृशेत् ॥ २८२॥
चतुर्णामपिवर्णानां शुद्धिरैषाप्रकीर्तिता ।
उच्छिष्टेनतुसंस्पृष्टो ब्राह्मणो ब्राह्मणेनयः ॥ २८२ ॥


गौण्ड-शंबर (बड़शिंगा) कालै ॥२७७॥ तो पांच दिन तक निराहार रहे और फिर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने ब्राह्मणी रजस्वला का स्पर्श कर लिया हो ॥२७८॥ तो एक दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने क्षत्रिया रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥ २७९॥ तो व्यास के वचन के अनुसार क्षत्रिया तीन दिन में शुद्ध होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला शूद्राणी रजस्वला का स्पर्श करले॥२८०॥ तो शूद्र स्त्री छः दिन में शुद्ध होती है और पूर्वोक्त रजस्वला ब्राह्मणी अपनी इच्छा के अनुसार कुछ व्रत आदि कर के शुद्ध हो जाती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने वैश्य जातिकी रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥२८१॥ तो वैश्य स्त्री चार दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्ध होती है औरों की ॥ इच्छा के अनुसार ब्राह्मणी प्रायश्चित्त करे और फिर सब का स्पर्श करे ॥२८२॥ चारों वर्णों की यह शुद्धि कही है-यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण ने उच्छिष्ट ब्राह्मण का स्पर्शकर लिया हो तो ॥ २८२ ॥


9