अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५७ | भाषार्थसहिता ॥
भोजनेमूत्रचारेश्च शंखस्यवचनंयथा ।
स्नानंब्राह्मणसंस्पर्शे जपहोमौतुक्षत्रिये ॥ २८३ ॥
वैश्येनक्तंचकुर्वीत शूद्रेचैवोपपोषणम् ।
चर्मकेर जकेवैश्ये धीवरेनटकेतथा ॥ २८४ ॥
एतान्स्पृष्ट्वाद्विजोमोहा·दाचमेत्प्रयतोपिसन् ।
एतैःस्पृष्टोद्विजोनित्य·मेकरात्रंपयःपिबेत् ॥ २८५ ॥
उच्छिष्टैस्तैस्त्रिरात्रंस्याद् घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
यस्तुछायांश्र्वपाकस्य ब्राह्मणस्त्वधिगच्छति ॥ २८६ ॥
तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
अभिशस्तोद्विजोऽरण्ये ब्रह्महत्याव्रतंचरेत् ॥ २८७ ॥
मासोपवासंकुर्वीत चान्द्रायणमथापिवा ।
वृथामिथ्योपयोगेन भ्रूणहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८८ ॥
अभक्षोद्वादशाहेन पराकेणैवशुद्ध्यति ।
भोजन के उच्छिष्ट में अथवा मूत्र के त्याग के उच्छिष्ट में शंखऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण के स्पर्श में स्नान और क्षत्रिय के स्पर्श में जप होम कहे हैं ॥ २८३ ॥ और वैश्य के स्पर्श में रात भर व्रत करे और शूद्र के स्पर्श में एक उपवास करे-और चमार धोबी-वैश्य (वैश्या का पुत्र) धींबर- और नट ॥२८४॥ इन का अज्ञान से ब्राह्मण स्पर्श करके सावधान होकर आचमन करे यदि ये ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो एक दिन दुग्धपान करे ॥२८५॥ और यदि पूर्वोक्त चमार आदि उच्छिष्ट हुए ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो ब्राह्मण तीन दिन का व्रत करके घृत को खाकर शुद्ध होता है-यदि ब्राह्मण श्वपाक की छाया में चले बैठे वा खड़ा रहे २८६ ॥ तो स्नान करे और घृत खाकर शुद्ध होता है । जो ब्राह्मण अभिशस्त (कलंकित) हो वह वन में जाकर ब्रह्म-हत्या का व्रत करै कि ॥२८७ ॥ एक मास तक उपवास करे अथवा चान्द्रायण करे । यदि वृथा हीं (झूठा) हिंसा का दोष लगा हो तो भ्रूणहत्या का व्रत करै कि ॥२८८॥ बारह दिन जलका ही भक्षण करके पराक व्रत से शुद्ध