अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥ ५२
शठंचब्राह्मणंहत्वा शूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८९ ॥ निर्गुणं चगुणीहत्वा पराकंव्रतमाचरेत् । उपपातकसंयुक्तो मानवोम्रियतेयदि ॥ २९० ॥ तस्यसंस्कारकर्ताच प्राजापत्यद्वयंचरेत् । प्रभुञ्जानोतिसस्नेहं कदाचित्स्पृश्यतेद्विजः ॥ २९१ ॥ त्रिरात्रमाचरेन्नक्तं निःस्नेहमथवाचरेत् । विडालवायसोच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्यच ॥२९२॥ केशकीटावपन्नंच पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चसम् । उष्ट्रयानंसमारुह्य खरयानंचकामतः ॥ २९३ ॥ स्नात्वाविप्रोजितप्राणः प्राणायामेनशुद्ध्यति सव्याहृतींसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ॥ २९४ ॥ त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ।
होता है । शठ ब्राह्मण को मार कर शूद्र की हत्या का व्रत करै ॥ १८९ ॥ विद्वान् ब्राह्मण मूर्ख को मार डाले तो पराक व्रत करे यदि जिस को उपपातक लगा हो वह मनुष्य मरजाय तो ॥ २९० ॥ उस का मृतक कर्म करने वाला दो प्राजापत्यव्रत करै । अत्यंत स्नेह सहित पदार्थ को भक्षण करते हुए ब्राह्मण को कदाचित् कोई छूले तो ॥ २९१ ॥ तीन दिन तक नक्त व्रत करै अथवा घृत के बिना सूखा भोजन करै । विलाव काक-कुत्ता-नीला इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके ॥२९२॥ और जिस में बाल या कीड़े, पड़े हों उसे खाकर ब्राह्मी ओषधिको पीवे । अपनी इच्छा से ऊंट=गधा इन के यान (सवारी) पर बैठे तो ॥२९३॥ ब्राह्मण स्नान और सूक्ष्म भोजन करके प्राणायाम से शुद्ध होता है । भूआदि सातव्याहृती और (ओम् आपोज्योती०) यह गायत्री शिर इससहित गायत्री को॥२९४॥तीन वार श्वासरोककर जो पढ़े उसे प्राणायाम कह-