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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

अत्रिस्मृतिः ॥ ५२

शठंचब्राह्मणंहत्वा शूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८९ ॥ निर्गुणं चगुणीहत्वा पराकंव्रतमाचरेत् । उपपातकसंयुक्तो मानवोम्रियतेयदि ॥ २९० ॥ तस्यसंस्कारकर्ताच प्राजापत्यद्वयंचरेत् । प्रभुञ्जानोतिसस्नेहं कदाचित्स्पृश्यतेद्विजः ॥ २९१ ॥ त्रिरात्रमाचरेन्नक्तं निःस्नेहमथवाचरेत् । विडालवायसोच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्यच ॥२९२॥ केशकीटावपन्नंच पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चसम् । उष्ट्रयानंसमारुह्य खरयानंचकामतः ॥ २९३ ॥ स्नात्वाविप्रोजितप्राणः प्राणायामेनशुद्ध्यति सव्याहृतींसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ॥ २९४ ॥ त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ।


होता है । शठ ब्राह्मण को मार कर शूद्र की हत्या का व्रत करै ॥ १८९ ॥ विद्वान् ब्राह्मण मूर्ख को मार डाले तो पराक व्रत करे यदि जिस को उपपातक लगा हो वह मनुष्य मरजाय तो ॥ २९० ॥ उस का मृतक कर्म करने वाला दो प्राजापत्यव्रत करै । अत्यंत स्नेह सहित पदार्थ को भक्षण करते हुए ब्राह्मण को कदाचित् कोई छूले तो ॥ २९१ ॥ तीन दिन तक नक्त व्रत करै अथवा घृत के बिना सूखा भोजन करै । विलाव काक-कुत्ता-नीला इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके ॥२९२॥ और जिस में बाल या कीड़े, पड़े हों उसे खाकर ब्राह्मी ओषधिको पीवे । अपनी इच्छा से ऊंट=गधा इन के यान (सवारी) पर बैठे तो ॥२९३॥ ब्राह्मण स्नान और सूक्ष्म भोजन करके प्राणायाम से शुद्ध होता है । भूआदि सातव्याहृती और (ओम् आपोज्योती०) यह गायत्री शिर इससहित गायत्री को॥२९४॥तीन वार श्वासरोककर जो पढ़े उसे प्राणायाम कह-

५२ भाषार्थसहिता ॥

शकृद्द्विगुणगोमूत्रं सर्पिर्दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ २९५ ॥ क्षीरमष्टगुणं देयं पंचगव्यंतथादधि । पंचगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्राह्मणस्तुसुरांपिवेत् ॥ २९६ ॥ उभौतौतुल्यदोषौचवसतोनरकेचिरम् । अजागावोमहिष्यश्च अमेध्यंभक्षयन्तियाः ॥ २९७ ॥ दुग्धंहव्येचकव्येच गोमयंनविलेपनेत् । ऊनस्तनीमधीकांवा याचस्वस्तनपायिनी ॥ २९८ ॥ तासांदुग्धंनहोतव्यं हुतंचैवाहुतं भवेत् । ब्राह्मौदनेचसोमेच सीमन्तोन्नयनेतथा ॥ २९९ ॥ जातश्राद्धेनवश्राद्धे भुक्त्वाषान्द्रायणंचरेत् । राजान्नंहरतेतेजः शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ ३०० ॥ स्वसुतान्नंचयोभुङ्क्ते सभुङ्क्तेपृथिवीमलम् । स्वसुताअप्रजाताच नाश्नीयात्तद्गृहेपिता ॥ ३०१ ॥

ते हैं। गोबर से दूना गोमूत्र चौगुना घी-॥२९५॥ आठ गुना दूध और आठ गुना दही डाले यह पंचगव्य कहाता है। यदि शूद्र उक्त पंचगव्य को पीवे और ब्राह्मण मदिरा को पीवे ॥ २९६ ॥ तो वे दोनों तुल्य दोष के भागी हैं और चिरकाल तक नरक में वसते हैं। जो बकरी गौ और भैंस विष्ठादि अशुद्ध वस्तु को खाती हों ॥२९७॥ तो हव्य और कव्य में उन का दूध न ले और उन के गोबर से लीपे भी नहीं। जिस के थन छोटे हों अथवा ४ से अधिक हों- जो रोगिन हो और जो अपने थन को स्वयं पीती हो ॥२९८॥ ऐसी गौ आदि के दुग्ध से होम न करे क्योंकि वह किया हुआ होम बिन किए के समान हो जाता है। ब्राह्मौदन (अग्न्याधानादि के समय चावल बनते हैं) सोम यज्ञ - सीमंत, इन में ॥२९९॥ और जातकर्म के श्राद्ध और नवक श्राद्ध में भोजन करके चांद्रायण व्रत करे। राजा का अन्न तेज को और शूद्र का ब्रह्म तेज को हरता है ॥३००॥ अपनी लड़की के अन्न को जो खाता है वह जानो पृथिवी के मल को खाता है और जिस लड़की के संतान न हुई हो उसके घर में भी पिता न खाये ॥३०१॥

अत्रिस्मृतिः ॥ ५३

भुङ्क्तेत्वस्यामाययान्नं पूयसंनरकंब्रजेत् । अधीत्यचतुरोवेदान्सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ॥ ३०२ ॥ नरेन्द्रभवनेभुक्त्वा विष्ठायांजायतेकृमिः । नवश्राद्धेत्रिपक्षेच षण्मासेमासिकेऽब्दिक ॥३०३॥ पतन्तिपितरस्तस्य योभुङ्क्तेनापदिद्विजः । चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा ॥३०४॥ त्रिपक्षेचातिकृच्छ्रँ स्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच । आब्दिक पादकृच्छ्रं स्या-देकाहःपुनराब्दिक ॥३०५॥ ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषुपर्व्वसु । द्वादशाहेत्रिपक्षेऽब्दे यस्तुपक्षेद्विजोत्तमः ॥३०६॥ पतन्तिपितरस्तस्य ब्रह्मलोकेगताअपि । पक्षेवायदिवामासे यस्यनाश्नन्तिवैद्विजाः ॥३०७॥


और जो प्रजा हीन लड़की के अन्न को छल से खाता है वह पूयस नामक नरक में जाता है-चार वेदों को पढ़कर सब शास्त्रों के तत्त्व को जानने बाला पुरुष ३०२॥ राजा के घर में भोजन करके विष्टा में कीड़ा होता है। नवक श्राद्ध [मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन के श्राद्ध को नव वा नवक श्राद्ध कहते हैं] त्रिपक्ष का, छमाही का मासिक और वार्षिक इन श्राद्धों में ॥३०३॥ आपत्ति के बिना जो ब्राह्मण भोजन करता है उस के पितर नरक में पड़ते हैं। नवक श्राद्ध में चांद्रा-यण, मासिकश्राद्ध में पराक, ॥३०४॥ त्रिपक्ष (१॥ मास) के श्राद्ध में अति कृच्छ्र छेमाही के श्राद्ध में कृच्छ्र पहिले वार्षिक वर्षों में पाद कृच्छ्र, और दूसरे वार्षिक में एक दिन उपवास करै ॥३०५॥ बिना ब्रह्मचर्य से किए मासिक श्राद्ध में पर्व्व (पूर्णामासी आदि) में मृतक के द्वादशाह में—त्रिपक्ष में—और वार्षिक श्राद्ध में जो ब्राह्मण भोजन करता है ॥ ३०६ ॥ ब्रह्मलोक में गये भी उस के पितर नरक में जाते हैं। जिस गृहस्थी के घर में पक्ष अथवा महीने में ब्राह्मण भो-जन न करते हों॥ ३०७ ॥

एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥

५४ भाषार्थसहिता ॥

भुक्त्वादुरात्मनस्तस्य द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् । एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥ उपोष्यविधिवद्विप्रः कूष्मांडीर्जुहुयाद्घृतम् यन्नवेदध्वनिस्नातं नचगोभिरलंकृतम् ॥३०९॥ यन्नबालैःपरिवृतं श्मशानमिवतद्गृहम् । हास्येपिबहवोयत्र विनाधर्मंवदन्तिहि ॥३१०॥ विनापिधर्मशास्त्रेण सधर्मोपावनःस्मृतः । हीनवर्णेचयःकुर्यात् अज्ञानादभिवादनम् ॥ ३११ ॥ तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति । समुत्पन्नेयदास्नाने भुङ्क्ते वापिपिबेद्यदि ॥३१२॥ गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपेत्स्नात्वासमाहितः । अंगुल्यादन्तकाष्टंच प्रत्यक्षंलवणंतथा ॥ ३१३ ॥


उस दुष्टचित्त वाले के अन्न को खाकर द्विज चांद्रायण व्रत करे । सूतक के ग्यारह वें दिन भोजन करके एक रात दिन और अस्थि संचयन के दिन भोजन करेतो तीन दिन तक ॥३०८॥ विधि से उपवास करके बैठे और घी से हवन करे । जो घर वेद के उच्चारण से पवित्र नहीं-और जो गौओं से शोभायमान नहीं है ॥ ३०९ ॥ और जो बालकों से भराहुआ नहीं है वह घर मरघट भूमि के तुल्य है । हंसी में भी जहां बहुत मनुष्य अधर्म से भिन्न जो कुछ कर्त्तव्य कहते हों ३१० ॥ और चाहे वह उन बहुत मनुष्यों का कथन धर्म शास्त्र के विरुद्ध भी होती वह उनका कथन परम धर्म कहा है- जो अपने से नीचे वर्ण को अज्ञान से अभिवादन करता है ॥ ३११ ॥ वह मनुष्य स्नान कर के घी को चाटे तो शुद्ध होता है-जो स्नान के योग्य मनुष्य विना स्नान किये भोजन करले अथवा जलपान करले तो ॥३१२॥ स्नान करके सावधानता से आठ हजार गायत्री जपै । अंगुली सहित दातौन प्रत्यक्ष (केवल) लवण का भक्षण ॥ ३१३ ॥

अत्रिसमृतिः ॥ ५३

मृत्तिकाभक्षणंचैव तुल्यंगोमांसभक्षणम् । दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ॥३१४॥ कर्पासदन्तकाष्ठंच विष्णोरपिश्रियंहरेत् । शूर्पवातो नखाग्रांबु स्नानवस्त्रांघटोदकम् ॥ ३१५ ॥ मार्जनीर जकेशांबु देवतायतनोग्द्ववम् । येनावर्लुंठितंतेषु गङ्गांभःप्लुतएवसः ॥ ३१६ ॥ मार्जनीरेणुकेशांबु हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् । मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकेऊपरस्थले ॥ ३१७ ॥ अंतर्जलेश्मशानांते वृक्षमूलेसुरालये । वृषमैश्चतयोत्खाते श्रेयस्कामैःसदाबुधैः ॥ ३१८ ॥ शुचौदेशेसुसंग्राह्या शर्कराश्मविवर्जिता ।


और मिट्टी का भक्षण करने के समान दूषित है दिन में कैथ की छाया रात में दधि का भक्षण शमी (छोंकर) की छाया ॥३१४॥ और कपास की दातौन ये विष्णु की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् ये विशेष कर चिकित्सा शास्त्रके अनुसार भी अधिक हानिकारक हैं। - सूप की पवन-नखों के अग्रभाग का जल-स्नान का वस्त्र-और घटका जल ॥३१५॥ और मार्जनी (झाडू) की धूल-और केशों का जल यदि ये पूर्वोक्त छःओं देवता के स्थान के हों और इनमें जो लोटे तोवह पुरुषमानो गंगाजीकेजल में लोटा ॥३१६॥ मार्जनी की धूल और केशों का जल ये दोनों दिन भरमें किये पुण्य को नष्टकरते हैं-सात जगह की मिट्टी ग्रहण न करे बमी की भूमों के स्थान की ॥३१७॥ जल के भीतर की-श्मशान की-वृक्ष की जड़ की-देवता के स्थान की-और जो बैलों ने खोदी हो इन सातों को कल्याण चाहने वाला ब्राह्मण शुभ काम के लिये ग्रहण न करे ॥३१८॥ कङ्कर और पत्थर जिस में न हों ऐसी शुद्ध स्थान की मिट्टी ग्रहण करे। शौच फिरते, मैथुन, होम, लघुशङ्का, औ दन्त-

५६ | भाषार्थसहिता-

पुरीषेमैथुनेहोमे प्रस्त्रावेदंतधावने ॥ ३१९ ॥
स्नानभोजनजाप्येषु सदामौनंसमाचरेत् ।
यस्तुसंवत्सरपूर्णं भुङ्क्ते मौनेनसर्वदा ॥ ३२० ॥
युगकोटिसहस्रेषु स्वर्गलोकेमहीयते ।
स्नानंदानंजपं होमं भोजनंदेवतार्चनम् ॥ ३२१ ॥
व्यूढपादोनकुर्वीत स्वाध्यायःपितृतर्पणम् ।
सर्वस्वमपियोदद्यात् पातयित्वाद्बिजोत्तमम् ॥ ३२२ ॥
नाशयित्वातुतत्सर्वं भ्रूणहत्याफलंभवेत् ।
ग्रहणोद्वाहसक्रांतौ स्त्रीणांचप्रसवेतथा ॥ ३२३ ॥
दानंनैमित्तिकंज्ञेयं रात्रावपिप्रशस्यते ।
क्षौमंजंवाथकार्पासं पट्टसूत्रमथापिवा ॥ ३२४ ॥
यज्ञोपवीतंदद्या-द्वस्त्रदानफलंलभेत् ।
कांस्यस्यभोजनंदद्याद् घृतपूर्णंसुशोभनम् ॥ ३२५ ॥


धावन करते समय तथा ॥३१९॥ स्नान, भोजन, और जप करते समय में मौन धारण करे । जो मनुष्य एक वर्ष भर सदा मौन होकर भोजन करता है ॥३२०॥ वह एक हजार किरोड़ युग तक स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । स्नान दान, जप, होम, भोजन, और देवता का पूजन ॥३२१॥ वेद का पढ़ना और पितरों का तर्पण इन आठ कामों को पांव पसार कर न करे । जो मनुष्य गिराकर अर्थात् ब्राह्मण मार कर अपने सर्व धनादि को भी दान देता है ॥३२२॥ तो भी वह उस सब को नष्ट कराकर भ्रूण (गर्भ) हत्या के फल को प्राप्त होता है । ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, और स्त्रियों का प्रसव—इन मौकों पर दिया दान नैमित्तिक जानो वह दान रात्रि में भी ॥३२३॥ करना योग्य कहा है—रेशम—सूत—पाठ का सूत्र इन के ॥ ३२४ ॥ यज्ञोपवीत को जो देता है वह वस्त्र दान के फलको प्राप्तहोता है—जो घी से भरे कांसे के पात्र को देता है ॥३२५॥

अत्रिस्मृतिः ॥ ५१

तथाभक्त्याविधानेन अग्निष्टोमफलंलभेत् । श्राद्धकालेतुयोदद्यात् शोभनेचउपानहौ ॥ ३२६ ॥ सगच्छत्यन्नमार्गेपि अश्वदानफलंलभेत् । तैलपात्रंतुयोदद्यात्संपूर्णं सुसमाहितः ॥ ३२७ ॥ सगच्छतिध्रुवंस्वर्गे नरोनास्त्यत्रसंशयः । दुर्भिक्षेअन्नदाताच सुभिक्षेचहिरण्यदः ॥ ३२८ ॥ पानप्रदस्त्वरण्येतु स्वर्गलोकेमहीयते । यावदर्धप्रसूतागौस्तावत्सापृथिवीस्मृता ॥३२९॥ पृथिवीतेनदत्तास्या-दीदृशींगांददाति यः । तेनाग्नयोहुताःसम्यक् पितरस्तेनतर्पिताः ॥३३०॥ देवाश्चपूजिताःसर्वे योददातिगवान्हिकम् । जन्मप्रभृतियत्पापं-मातृकंपैतृकंतथा ॥ ३३१ ॥ तत्सर्ननश्यतिक्षिप्रं वस्त्रदानान्नसंशयः ।


भक्ति और विधि से देने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है। जो श्राद्ध के समय सुन्दर उपानह दान में देता है ॥३२६॥ वह जिस में अन्न मिले ऐसे मार्ग में गमन करता हुआ अश्व के दान के फल को प्राप्त होता है—जो सावधान होकर भरा हुआ तैल का पात्र देता है । ३२७ ॥ वह मनुष्य निश्चय से स्वर्ग में जाता है इस में सन्देह नहीं है—दुर्भिक्ष में अन्नका दाता सुभिक्ष में सुवर्ण का देने वाला ॥ ३२८ ॥ और वन जंगल में प्याऊ द्वारा जल का दान करने वाला स्वर्ग लोक में पूजा को प्राप्त होता है । जब तक गौ अधव्यानी (आधा बच्चा भीतर और आधा बाहर) हो तब तक वह पृथिवी के तुल्य है ॥ ३२९ ॥ जिसने ऐसी गौ दी उसने मानो पृथिवी का दान किया। उसने जानो अग्निहोत्र किया और उसीने पितर तृप्त किये॥३३०॥ तथा उसीने संपूर्ण देवता पूजे कि जो गौ को प्रति दिन खाने को देता है। जन्म से लेकर जो पाप किया तथा माता या पिता का जो अपराध किया हो ॥३३१॥ वह संपूर्ण वस्त्र के देने से उसी समय नष्ट हो जाता है । शङ्खआदि सहित का

५८ भाषार्थसहिता ॥

कृष्णाजिनंतुयोदद्या-त्सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३३२ ॥
उद्धरेन्नरकस्थाना-त्कुलान्येकोत्तरंशतम् ।
आदित्योवरुणोविष्णुर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ॥ ३३३ ॥
शूलपाणिस्तुभगवान् अभिनन्दतिभूमिदम् ।
वालुकानांकृताराशि-र्यावत्सप्तर्षिमण्डलम् ॥ ३३५ ॥
गतेवर्षशतेचैव पलमेकंविशीर्यति ।
क्षयंचदृश्यतेतस्य कन्यादानेनचैवहि ॥३३६॥
आतुरेप्राणदाताच त्रीणिदानफलानिच ।
सर्वेषामेवदानानां विद्यादानंततोधिकम् ॥ ३३७ ॥
पुत्रादिस्वजनेदद्या-द्विप्रायचनकैतवे ।
सकामःस्वर्गमाप्नोति निष्कामोमोक्षमाप्नुयात् ॥३३८॥
ब्राह्मणेवेदविदुषि सर्वशास्त्रविशारदे ।
मातृपितृपरेचैव ऋतुकालाभिगामिनि ॥ ३३९ ॥

ली मृगछाला को जो देता है ॥ ३३२ ॥ वह नरक में पड़े एक सौ एक कुलों का उद्धार करता है । सूर्य—वरुण—विष्णु—ब्रह्मा—चन्द्रमा—अग्नि ॥ ३३३ ॥ और भगवान् शिव जी भूमि के देने वाले की प्रशंसा करते हैं । सात ऋषियों के मंडल पर्यन्त किया जो बालू (रेत) का ढेर है॥३३५॥ वह भी वर्ष पीछे एक पल २ भी कमती होने से नष्ट हो जाता है परन्तु कन्या के दान में जो धर्म होता है वह नष्ट नहीं होता ॥३३६॥ आतुर (दुःखी) को प्राण का दान जो देता है उसको दान के तीन फल (धर्म अर्थ काम) होते हैं । सब दानों के बीच में सब से अधिक विद्या का दान है ॥३३७॥ पुत्र आदि स्वजन को-और सुपात्र ब्राह्मण को विद्या दे और कपटी को न दे-कुछ कामना रखने वाला-स्वर्ग को तथा किसी द्रव्य आदि की इच्छा न करने वाला मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३३८ ॥ जो ब्राह्मण वेद को जानता हो, शास्त्रों में जो चतुर हो माता पिता का भक्त हो—और जो ऋतु के समय में ही स्त्री से संग करता हो ॥ ३३९ ॥

अत्रिस्मृतिः ॥

शीलचारित्रसंपूर्णे प्रातःस्नानपरायणे ।
तस्यैवदीयतेदानं यदीच्छेच्छ्रेयआत्मनः ॥ ३४० ॥
संपूज्यविदुषोविप्रान् अन्येभ्योपिप्रदीयते ।
तत्कार्यंनैवकर्तव्यं नदृष्टंनश्रुतंमया ॥ ३४१ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि श्राद्धकर्मणियेद्विजाः ।
पितृणामक्षयंदानं दत्तंयेषांतुनिष्फलम् ॥ ३४२ ॥
नहीनांगोनरोगीच श्रुतिस्मृतिविवर्जितः ।
नित्यंचानृतवादीच वणिक्श्राद्धेनभोजयेत् ॥३४३॥
हिंसारतंचकपटमुपगुह्याश्रुतंचयः ।
किंकरंकपिलंक्राणं श्वित्रिणंरोगिणंतथा ॥ ३४४ ॥
दुश्चर्माणंशीर्णकेशं पाण्डुरोगंजटाधरम् ।
भारवाहितरौद्रंच द्विभार्यंवृषलीपतिम् ॥ ३४५ ॥


शील तथा उत्तम आचरण में लगा हो और प्रातःकाल स्नान में जो तत्पर हो ऐसे सुपात्र ब्राह्मण को अपना कल्याण चाहने वाला दाता दान दे ॥३४०॥ विद्वान् ब्राह्मण का प्रथम पूजन करके अन्य (मूर्ख) ब्राह्मणों को दान देवे । और उस कार्य को नहीं करना जिस को स्वयं न देखा और न सुना हो ॥३४१॥ इस से आगे यह कहते हैं कि श्राद्ध कर्म में कैसे ब्राह्मण हों कि पितरों के निमित्त जिन को दिया दान अक्षय फल दायक होता और जिन को दिया निष्फल होता है ॥ ३४२ ॥ लूना लंगड़ा आदि (रोगी) श्रुति स्मृति को न पढ़ा न जानता हो—जो नित्य झूठ बोलता हो जो व्यापारी हो इन ब्राह्मणों को श्राद्ध में न जिमावे ॥ ३४३ ॥ हिंसा में तत्पर—कपटी—और जो अपने वेद को छिपा कर किंकर बन जाय—पीला—काणा—श्वेतकुष्ठ वा अन्य रोग जिसे घेरे हो ॥ ३४४ ॥ जिस के देह की त्वचा बिगड़ी फटी हो—जिस के केश गिर पड़े हों—पाण्डुरोगी—जटाधारी—भार (बोझ) का ढोने वाला—भयानक—जिस के दो स्त्री हों—शूद्र स्त्री से जिस ने विवाह किया हो ॥ ३४५ ॥

६० भाषार्थसहिता-

भेदकारीभवेच्चैव बहुपीडाकरोपिवा । हीनातिरिक्तगात्रोवा तमप्यपनयेत्तथा ॥ ३४६ ॥

बहुभोक्तादीनमुखो मत्सरीक्रूरबुद्धिमान् । एतेषांनैवदातव्यः कदाचित्त्तुप्रतिग्रहः ॥ ३४७ ॥

अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपंक्तिदूषणैः । अदुष्यंतंयमःप्राह पंक्तिपावनएषसः ॥ ३४८ ॥

श्रुतिःस्मृतिश्चविप्राणां नयनेद्वेप्रकीर्तिते । काणःस्यादेकहीनोपि द्वाभ्यामन्धःप्रकीर्तितः ॥३४९॥

नश्रुतिर्नस्मृतिर्यस्य नशीलंनकुलंयतः । तस्यश्राद्धंनदातव्यं त्वन्धकस्यात्रिरब्रवीत् ॥३५०॥

तस्माद्वेदेनशास्त्रेण ब्राह्मणंब्राह्मणस्यतु । नचैकेनैववेदेन भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ ३५१ ॥


भेद का कर्त्ता (मन फटाने वाला) बहुतों को पीड़ा करने वाला जिस के अङ्ग हीन (कम) अथवा अधिक हों-इन को श्राद्ध में से दूरकर दे ॥ ३४६॥ बहुत खाने वाला-जिसके मुखपर दीनताझलकती हो-जो दूसरेके गुणोंमें दोषोंको देखता हो-कठोर जिस की बुद्धि हो-ऐसे को कदाचित भी दान नहीं देवे ॥ ३४७ ॥ जो ब्राह्मण वेद को पढ़ा हो तथा जानता हो और चाहे वह शरीर में जो दोष कहे हैं उन वाला भी हो-तो भी उस को यम ने शुद्ध कहा है क्योंकि वह पङ्क्ति को पवित्र करने वाला है ॥ ३४८ ॥ वेद और स्मृति ये दोनों ब्राह्मणों के नेत्र कहे हैं-इन के मध्य में एक को जो नहीं जानता वह काणा और जो दोनों को न जानता हो वह अंधा शास्त्र में कहा है ॥ ३४९ ॥ जो न वेद को और न स्मृति को जानता हो-न शील वान्‌हो-न कुलीन हो उस अंधे को श्राद्ध में निमन्त्रण नहीं देना यह अत्रि ऋषि ने कहा है ॥ ३५० ॥ जिस से ब्राह्मण का ब्राह्मणपन वेद और शास्त्र से ही है किन्तु केवल वेद से नहीं है यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥ ३५१ ॥

अत्रिसमृतिः ॥ ६१

योगस्थैर्लोचनैर्युक्तः पादाग्रंचप्रपश्यति । लौकिकज्ञश्चशास्त्रोक्तं पश्येच्चैषोधरोत्तरम् ॥३५२॥ वेदैश्चऋषिभिर्गीतं दृष्टिमान्शास्त्रवेदवित् । व्रतिनंचकुलीनंच श्रुतिस्मृतिरतंसदा ॥३५३ ॥ तादृशंभोजयेच्छ्राद्धे पितॄणामक्षयंभवेत् । यावतो ग्रसतेग्रासान् पितॄणांदीप्ततेजसाम् ॥३५४॥ पितापितामहश्चैव तथैवप्रपितामहः । नरकस्थाविमुच्यंते ध्रुवंयांतित्रिविष्टपम् ॥ ३५५ ॥ तस्माद्विप्रंपरीक्षेत श्राद्धकालेप्रयत्नतः । ननिर्वपति यःश्राद्धंप्रमीतपितृकोद्विजः ॥३५६ ॥ इन्दोःक्षयेमासिमासि प्रायश्चित्तीभवेत्तुसः । सूर्येकन्यागतेकुर्या-च्छ्राद्धंयोनगृहाश्रमी ॥३५७ ॥


योग शास्त्र में कहे अनुसार जिस के नेत्र हों-और अपने चरणों के अग्रभाग को ही जो देखता है अर्थात् कहीं भी कुदृष्टि न करता हो लौकिक व्यवहार जानता हो और शास्त्र में कहे ऊंच नीच को जो देखता हो ॥३५२॥ और ज्ञानवान् हो-शास्त्र और वेद का ज्ञाता हो-व्रत करने वाला हो-कुलीन हो-वेद और स्मृतियों के पठन और पाठम में जो तत्पर हो ॥३५३॥ ऐसे ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। प्रदीप्त तेज वाले पितरों सम्बन्धी जितने ग्रासों को पूर्वोक्त ब्राह्मण खाता है उतने ही शीघ्र २ ॥ ३५४ ॥ पिता-पितामह-और प्रपितामह ये सब नरक में पड़े हुए भी मुक्त हो जाते हैं और निश्चय कर स्वर्ग को प्राप्त हो जाते हैं ॥३५५॥ तिस से श्राद्ध के समय बड़े यत्न से ब्राह्मण की परीक्षा करै । जिस द्विज का पिता मरगया हो यदि वह ॥३५६॥ महीने २ में अमावस के दिन श्राद्ध नहीं करता तो प्रायश्चित्त के योग्य होता है । कन्या के सूर्य कन्यागत कहाते उसी का बिगड़ा शब्द ( कनागत ) होगया है उस काल में जो गृहस्थी श्राद्ध न करै ॥ ३५७ ॥

६२ | भाषार्थसहिता ॥

धनंपुत्रान्कुलंतस्य पितृनिश्वासपीडया ।
कन्यागतेसवितरि पितरोयान्तिसत्सुतान् ॥ ३५८ ॥
शून्याप्रेतपुरीसत्रां यावद्वृश्चिकदर्शनम् ।
ततोवृश्चिकसंप्राप्ते निराशाःपितरोगताः ॥३५९ ॥
पुनःस्वभवनंयान्ति शापंदत्वासुदारुणम् ।
पुत्रंवाभ्रातरंवापि दौहित्रंपौत्रकंतथा ॥ ३६० ॥
पितृकार्येप्रसक्ताये तेयान्तिपरमांगतिम् ।
यथानिर्मंथनादग्निः सर्वकाष्ठेषुतिष्ठति ॥ ३६१ ॥
तथासंदृश्यतेधर्मः श्राद्धदानान्नसंशयः ।
यःप्राप्नोतितदासर्वं कन्यागतेचगंगया ॥ ३६२ ॥
सर्वशास्त्रार्थगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सर्वयज्ञफलंविद्याच्छ्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६३ ॥
महापातकसंयुक्तो योयुक्तश्चोपपातकैः ॥


तो पितरों की लंबीश्वास द्वारा उस का धन पुत्र और कुल नष्ट होता है । कन्या राशि पर जब सूर्य आते हैं तब पितर अपने उत्तम पुत्रों के समीप आते हैं ॥ ३५८ ॥ जब तक वृश्चिक की संक्रांति नहीं लगती तब तक यमराज की पुरी शून्य रहती है फिर वृश्चिक संक्रांति के आते ही निराश होकर पितर लौट जाते हैं ॥ ३५९ ॥ फिर वे यहां भयानक शाप देकर अपने लोक को चले जाते हैं पुत्र-भाई-लड़की का लड़का-और पोता ॥ ३६० ॥ जो ये सब पितरों के श्राद्ध में तत्पर हों तो वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं-जैसे मथने से सब काठों में अग्नि की स्थिति दीखती है ॥३६१॥ वैसे ही श्राद्ध के देने से धर्म का विस्तार प्रत्यक्ष दीखता है' इस में संशय नहीं है। और जो कनागतों में गंगा पर श्राद्ध करता है उसे सब फल प्राप्त होता है ॥ ३६२ ॥ सब शास्त्रों के अर्थों को जानना-सब तीर्थों में स्नान-और सब यज्ञों का

अत्रिसमृतिः ॥ ६३

घनैर्मुक्तोयथाभानू राहुमुक्तश्चचन्द्रमाः ॥ ३६४ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापंविलङ्घयेत् । सर्वसौख्यमयं प्राप्तः श्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६५ ॥ सर्वेषामेवदानानां श्राद्धदानं विशिष्यते । मेरुतुल्यंकृतं पापं श्राद्धदानं विशोधनम् ॥ ३६६ ॥ श्राद्धंकृत्वातूमर्त्यो वै स्वर्गलोके महीयते । अमृतंब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नंपयःस्मृतम् ॥ ३६७ ॥ वैश्यस्यचान्नमेवाज्यं शूद्रान्नंरुधिरंभवेत् । एतत्सर्वंमयाख्यातं श्राद्धकालेसमुत्थिते ॥ ३६८ ॥ वैश्वदेवंचहोमेच देवताभ्यर्चने जपेत् । अमृतंतेनविप्रान्नं ऋग्यजुः सामसंस्कृतम् ॥ ३६९ ॥ व्यवहारानुपूर्व्येण धर्मेणाबलिभिर्जितम् ।

फल श्राद्ध के दान से जानो इस में संदेह नहीं है ॥ ३६३ ॥ जो महापातकी वा उपपातकी हो वह पुरुष भी श्राद्ध के दान से मेघों में से निकले सूर्य और राहु से छूटे चन्द्रमा के समान शुद्ध निर्दोष होता है ॥ ३६४ ॥ और वह सब पापों से छूटा हुआ सब पापों के पार हो जाता तथा श्राद्ध के देने से सब सुखों को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥ ३६५ ॥ सब दानों में श्राद्ध का दान अधिक फल देने वाला है मेरु पहाड़ के तुल्य जो पाप किया हो तो उस से भी शुद्ध करने वाला श्राद्ध का दान है ॥ ३६६ ॥ मनुष्य श्राद्ध कर के स्वर्गलोक में पूजा जाता है ब्राह्मण का अन्न श्राद्ध में अमृत रूप क्षत्रिय का अन्न दूध रूप ॥ ३६७ ॥ वैश्य का अन्न घृत रूप और शूद्र का अन्न रुधिर रूप होता है—यह जो सब हम ने कहा है इस को श्राद्ध के समय, बलि वैश्वदेव, होम, देवताओं का पूजन, इन कामों में जपै ॥ ३६८ ॥ ऋग्वेद-यजुर्वेद सामवेद-के मन्त्रों से ब्राह्मण का अन्न निर्मल होने से अमृत रूप है ॥ ३६९ ॥ व्यवहार के क्रम से और धर्म से बलवानों को जीत कर संचय किया है इस में क्षत्री

६४ भाषार्थसहिता ॥

क्षत्रियान्नंपयस्तेन घृतान्नंयज्ञपालने ॥३७०॥
देवोमुनिर्द्विजोराजा वैश्यःशूद्रोनिषादकः ।
पशुर्म्लेंच्छोऽपिचांडालो विप्रादशविधाःस्मृताः ॥३७१॥
संध्यांस्नानंजपंहोमंदेवतानित्यपूजनम् ॥
अतिथिंवैश्वदेवंच देवब्राह्मणउच्यते ॥३७२॥
शाकेपत्रेफलेमूले वनवासेसदारतः ।
निरतोऽहरहःश्राद्धे सविप्रोमुनिरुच्यते ॥ ३७३ ॥
वेदान्तंपठतेनित्यंसर्वसंगंपरित्यजेत् ।
सांख्ययोगविचारस्थः सविप्रोद्विजउच्यते ॥३७४ ॥
अस्त्राहताश्चधन्वानः संग्रामेसर्वसंमुखे ।
आरंभेनिर्जितायेन सविप्रःक्षत्रउच्यते ॥ ३७५ ॥
कृषिकर्मरतोयश्च गवां च प्रतिपालकः ।
वाणिज्यव्यवसायश्च सविप्रोवैश्यउच्यते ॥ ३७६ ॥


का अन्न दूध रूप है और यज्ञ की रक्षा करने से वैश्य का अन्नघृतरूप है ॥३७०॥
देव, मुनि, द्विज, राजा, वैश्य, शूद्र, निषाद, पशु, म्लेच्छ, चांडाल ये दश प्रकार के (जिन को आगे कहते हैं) ब्राह्मण कहे हैं ॥ ३७१ ॥ संध्या, स्नान, + जप, + होम, देवपूजा, अतिथि सत्कार और बलिवैश्वदेव इन का-मों को नित्य नियम से जो करे-उस ब्राह्मण को देव कहते हैं ॥ ३७२ ॥ जो शाक, पत्ते, फल, मूल इन को भक्षण करे सदा ही एकान्त रहने में प्रसन्न हो तथा प्रति दिन श्राद्ध करने में जो तत्पर हो उस ब्राह्मण को मुनि कहते हैं ॥३७३॥ जो वेदान्त को नित्य पढ़े और सब के संग को त्यागे सांख्य और योग शास्त्र के विचार में जो स्थिर हो उस ब्राह्मण को द्विज कहते हैं ॥३७४॥ जिसने सब के स-म्मुख संग्राम में धनुषधारियों को शस्त्रास्त्रों से मारा हो और जिसने आरंभ में ही सब को जीता हो उस ब्राह्मण को क्षत्री कहते हैं ॥३७५॥ जो खेती के काम में मग्न हो और गौओं के पालने में तत्पर हो-जो लेन देन करता हो उस ब्रा-ह्मण को वैश्य कहते हैं ॥ ३७६ ॥

अत्रिस्मृतिः ॥ ६५

लाक्षालवणसंमिश्रं कुसुंभक्षीरसर्पिषः ।
विक्रेतामधुमांसानां सविप्रःशूद्रउच्यते ॥ ३७७ ॥
चौरश्चतस्करश्चैव सूचकोदंशकस्तथा ।
मत्स्यमांसेसदालुब्धो विप्रोनिषादउच्यते ॥ ३७८ ॥
ब्रह्मतत्वंनजानाति ब्रह्मसूत्रेणगर्वितः ।
तेनैवसचपापेन विप्रःपशुरुदाहृतः ॥ ३७९ ॥
वापीकूपतड़ागाना-मारामस्यसरस्सुच ।
निश्शंकंरोधकश्चैव सविप्रोम्लेच्छउच्यते ॥ ३८० ॥
क्रियाहीनश्चमूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः ।
निर्दयःसर्वभूतेषु विप्रश्चांडालउच्यते ॥ ३८१ ॥
वेदैर्विहीनाश्चपठन्तिशास्त्रं
शास्त्रेणहीनाश्चपुराणपाठाः ।


लाख, लवण कुसूम दूध, घी मिठाई शहद मांस इन को जो बेंचे उस ब्राह्मण को शूद्र कहते हैं ॥ ३७७ ॥ जो चोरी, ठगई लूट निन्दा कठोर आक्षेप करने वाला तथा मछली के मांस का लोभी हो ऐसे ब्राह्मण को निषाद बधिक हिंसक कहते हैं ॥३७८॥ जो ब्रह्म (वेद) के तत्व को न जाने और यज्ञोपवीत का जिसे अभिमान हो उसी पाप से उस ब्राह्मण को पशु कहते हैं ॥३७९॥ बावडी, कूप, ताल बाग, छोटा तालाब इनको जो निश्शंक होकर रोके उस ब्राह्मण को म्लेच्छ कहते हैं ॥३८०॥ जो ब्राह्मण के सब कर्मों से हीन हो-मूर्ख हो-सर्वधर्मों से रहित हो किसी भीप्राणी पर जिस को दया न हो ऐसे ब्राह्मण को चांडाल कहते हैं ॥३८१॥ वेद जिन्हें नहीं आता वे दर्शन शास्त्रों को पढ़ते हैं और शास्त्र जिन्हें नहीं आते वे पुराणों को पढ़ते हैं-पुराण भी जिन्हें नहीं आते वे खेती करते हैं और जिनपै खेती भी नहीं हो सकती वे भागवत नाम चिमटा ले बाल रक्षा के

६६भाषार्थसंहिता ॥

पुराणहीनाःकृषिणोभवन्ति
भ्रष्टास्ततोभागवताभवन्ति ॥ ३८२ ॥
ज्योतिर्विदोऽथर्वाणः कीराःपौराणपाठकाः ।
श्राद्धेयज्ञेमहादाने वरणीयाःकदाचन ॥३८३॥
श्राद्धेचेत्पितरोघोरं दानंचैवतन्निष्फलम् ।
यज्ञेचफलहानिःस्यात् तस्मात्तान्परिवर्जयेत् ॥३८४॥
आविकाश्चित्रकारश्च वैद्योनक्षत्रपाठकः ।
चतुर्विप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८५॥
मागधोमाथुरश्चैव कापटःकीटकानजौ ।
पञ्चविप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८६॥
क्रयक्रीताचयाकन्या पत्नीसानविधीयते ।


(वैरागी) हो जाते हैं ॥ ३८२ ॥ ज्योतिषी, अथर्ववेदी, कीर (अहां तहां कंठ से जो तोते की तरह उपदेश करे) पुराण के पढ़ने वाले-इनको ब्राह्मणों के श्राद्ध यज्ञ और महान् दान में कदाचित् ही वरे अर्थात् औरों के अभाव में ही इन को अधिकार है ॥३८३॥ श्राद्ध में पूर्वोक्त ब्राह्मणों के जिमाने से पितर घोर नरक में जाते दान निष्फल होता और यज्ञ में फल की हानि होती है जिससे पूर्वोक्त ब्राह्मणों को वर्ज दे ॥३८४॥ भेड़ौं का पालने वाला, चित्र काढ़ने वाला, वैद्य और नक्षत्र पाठक (घर २ नक्षत्र तिथि जो बताता फिरे) ये चार ब्राह्मण बृहस्पति के समान बड़े विद्वान् भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं हैं ॥३८५॥ मगध देश का वासी, माथुर (चौबे), कपट देश का वासी, कीट और कान देश में जो पैदा हुए हों-ये पांच चाहे बृहस्पति के समान भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं ॥३८६॥ मोल ली हुई कन्या पत्नी (भार्या) नहीं

टि० (३८२) वेद पढ़ के धर्मानुकूल उत्तम जीविका से निर्वाह करने वाले ब्राह्मण सब से उत्तम, नैयायिकादि धर्म विषय में उन से नीचे हैं। तथा पुराण पढ़ देख कथा बांच २ जीविका करने वाले उन से भी नीचे हैं। उन से भी शंख शैली आदि करने वाले और वास्तव में साधु न होने पर भी जटाधारी तापसी आदि का वेष बनाकर पुजाने वाले सब से नीच अधर्मी हैं। जीविका परक यहां ऊंच नीच का विचार दिखाया जानो।

अत्रिसमृतिः ॥ ६९

तस्यांजाताःसुतास्तेषां पितृपिण्डंनविद्यते ॥३८७॥
अष्टशल्यागतंनीरं पाणिनापिबतेद्विजः ।
सुरापानेनतत्तुल्यं तुल्यंगोमांसभक्षणम् ॥३८८॥
ऊर्ध्वजङ्घेषुविप्रेषु प्रक्षाल्यचरणद्वयम् ।
तावच्चाण्डालरूपेण यावद्गंगांनमज्जति ॥३८९॥
दीपशय्यासनच्छाया-कार्पासं दन्तधावनम् ।
अजारेणुस्पृशंचैव शक्रस्यापिश्श्रियंहरेत् ॥३९०॥
गृहाद्दशगुणं कूपं कूपाद्दशगुणं तटम् ।
तटाद्दशगुणं नद्यां गंगासंख्यानविद्यते ॥ ३९१ ॥
स्रवद्यद्ब्राह्मणंतोयं रहस्यं क्षत्रियंतथा ।
वापीकूपेषुवैश्यं स्या-च्छूद्रंभाण्डोदकंतथा ॥ ३९२ ॥
तीर्थस्नानंमहादानं यच्चान्यत्तिलतर्पणम् ।


होती और उस से पैदा हुए पुत्रों को श्राद्ध करने पिंड देने का अधिकार नहीं है ॥३८७॥ अष्टशल्या (पुर) के जल को जो द्विज हाथ से पीता है वह जल मदिरा के पीने और गोमांस भक्षण के समान दूषित है इस से पुर वा चर्स आदि नामका चाम के पात्र में जल नहीं पीना चाहिये ॥ ३८८ ॥ जो खड़े हुए ब्राह्मण के दोनों चरण धोते हैं वे तब तक चांडालरूप रहते हैं जब तक गंगा स्नान न कर लें इस से बैठा कर ब्राह्मण के पग धोना उचित है ॥ ३८९ ॥ दीपक शय्या और आसन इन तीनों की छाया (जो ऊपर पड़े)—कपास के वृक्ष की दतौन बकरे की धूल का स्पर्श ये तीनों इन्द्र की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् दीपकादि की छायादि से मनुष्यों को बचना चाहिये ॥३९०॥ घरसे दश गुणा पुण्य कूपपर कूप से दश गुणा तट पर—तट से दश गुणा नदी में स्नान से होता है—और गंगास्नान के पुण्य की संख्या (गिनती) नहीं है ॥ ३९१ ॥ बहते हुये जल की ब्राह्मण संज्ञा है—एकान्त के जल की क्षत्री और बावली तथा कूप के जल की वैश्य संज्ञा है—भांड (बरतन) में धरे जल की शूद्र संज्ञा है ॥ ३९२ पिता के मरने के अनंतर एक वर्ष तक तीर्थ स्नान और

६८ भाषार्थसहिता ॥

अब्दमेकंनकुर्वीत महागुरुनिपातः ॥३९३॥
गंगागयात्वमावास्या वृद्धिश्राद्धेक्षयेऽहनि ।
मघाणिपडप्रदानंस्या-दन्यत्रपरिवर्जयेत् ॥ ३९४॥
घृतंवायदिवातैलं पयोवायदिवादधि ।
चत्वारोह्याज्यसंस्थाना हुतंनैवतुवर्जयेत् ॥ ३९५॥
श्रुत्वैतान्नृषयोधर्मान् भाषितानत्रिणास्वयम् ।
इदमूचुर्महात्मानं सर्वेतेधर्म्मनिष्ठिताः ॥ ३९६ ॥
यइदंधारयिष्यन्ति धर्मशास्त्रमतन्द्रिताः ।
इहलोकेयशःप्राप्य तेयास्यन्तित्रिविष्टपम् ॥ ३९७॥
विद्यार्थीलभतेविद्यां धनकामोधनानिच ।
आयुष्कामस्तथैवायुः श्रीकामोमहतीं श्रियम् ॥ ३९८ ॥
इति श्रीअत्रिमहर्षिनिर्मिता स्मृतिः समाप्ता ॥


महादान और तिलों से तर्पण न करे ॥ ३९३॥ गंगा-गया-अमावस-वृद्धि श्राद्ध (नांदी मुख) क्षयी श्राद्ध कनागत का और मघा नक्षत्र में पिण्डदान इन को तो पिता के मरण के अनंतर वर्ष के मध्य में भी करै और इन से अन्य कर्मों को त्याग दे ॥३९४ ॥ घी-तिलका तेल--दूध-दही-ये चारों घी के स्थानी हैं अर्थात् घी के अभाव में इन से ही होम करे होम का त्याग कदापि न करे ॥३९५॥अत्रि ऋषि ने स्वयं कहे इन धर्मों को सब ऋषि सुनकर धर्म में भली प्रकार स्थित हुये वे सब ऋषि, महात्मा अत्रि ऋषि के प्रति यह बोले कि ॥३९६॥ जो पुरुष आलस्य को त्याग कर इस धर्म शास्त्र को जानेगे वे इस लोक में यश को प्राप्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होंगे ॥ ३९७ ॥ इस शास्त्र के पढ़ने से विद्यार्थी विद्या को धनार्थी धन को--अवस्था की जिसे इच्छा हो वह अवस्था को, तथा लक्ष्मी की जिसे इच्छा हो वह लक्ष्मी को-प्राप्त होता है ॥ ३९८ ॥

इत्यत्रिमहर्षिस्मृतिभाषा समाप्ता ॥

श्रीगणेशायनमः

अथ विष्णुस्मृतिः

अर्थात् विष्णुप्रोक्तधर्मशास्त्रप्रारम्भः ॥

विष्णुमेकाग्रमासीनं श्रुतिस्मृतिविशारदम् ।
पप्रच्छुर्मुनयःसर्वे कलापग्रामवासिनः ॥१॥
कृतेयुगेह्यपक्षीणं लुप्तोधर्म्मस्सनातन्ः ।
तत्रवैशीर्यमाणेच धर्मानप्रतिमार्गितः ॥ २ ॥
त्रेतायुगेऽथसंप्राप्ते कर्तव्यञ्चास्यसंग्रहः ।
यथासंप्राप्यतेस्माभिस्तत्त्वन्नोवक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
वर्णाश्रमाणांयोधर्मो विशेषश्चैवयः कृतः ।
भेदन्तथैवचैषांयस्तन्नोब्रूहिद्विजोत्तम ॥ ४ ॥
ऋषीणांसमवेतानां त्वमेवपरमोमतः ।


भाषार्थः-श्रुति और स्मृतियों के जानने में चतुर एकाग्र बैठे हुए विष्णु नामक ऋषि से कलाप ग्राम के वासी सब मुनियों ने यह पूछा ॥१॥ कि कृतयुग बीतने पर सनातनधर्म लुप्त होगया और कृतयुग के बीतने पर किसी ने भी धर्म का शोधन नहीं किया ॥२॥ अब त्रेतायुग वर्त्तमान है इस में धर्म का संग्रह अवश्य करना चाहिये यह धर्म जिस रीतिसे हमको प्राप्त हो वह रीति आप हम से कहिये ॥३॥ वर्ण और आश्रमों का जो धर्म और इन धर्मों की विशेषता ऋषियों ने की है और परस्पर के धर्म का भेद—यह सब हे द्विजो' में श्रेष्ठ हम से कहो ॥ ४ ॥ यहां इकट्ठे हुए ऋषियों ने तुम ही श्रेष्ठ माने हो इससे हे सुव्रत संपूर्ण धर्म का वक्ता तुम से अन्य नहीं है ॥ ५ ॥

( १ ) ये विष्णु जो धर्मशास्त्र के वक्ता हैं साक्षात् भगवान् नहीं हैं किन्तु यद्यपि सब ऋषि विष्णु के ही नाम रूप भेद हैं तथापि अन्य ऋषियों के समान विष्णु नामक भी एक ऋषि थे जिन ने इस धर्मशास्त्र को वेद का गूढाशय लेकर संक्षेप से प्रकट किया है ऐसा अनुमान है ।

२ भाषार्थसहिता ॥

धर्मस्येहसमग्रस्य नान्येावक्तास्तिसुव्रत ॥ ५ ॥ श्रुत्वाधर्मं चरिष्यामो यथावत्परिभाषितम् । तस्माद्ब्रूहिद्विजश्रेष्ठ धर्मकामाह्यमेद्विजाः ॥६॥ इत्युक्तोमुनिभिस्तैस्तु विष्णुःप्रोवाचतांस्तदा । अनघाःश्रूयतांधर्मो वक्ष्यमाणोमयाक्रमात् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण क्षत्रियोवैश्यः शूद्रश्चैवतथापरे । एतेषांधर्मसारंयद ब्रुवतस्तन्निबोधत ॥ ८ ॥ ऋतौऋतौतुसंयोगाद्ब्राह्मणोजायतेस्वयम् । तस्माद्ब्राह्मणसंस्कारं गर्भादौतुप्रयोजयेत् ॥ ९ ॥ सीमन्तोन्नयनंकर्म नस्त्रीसंस्कारइष्यते । गर्भस्यैवस्तुसंस्कारो गर्भगर्भेप्रयोजयेत् ॥ १० ॥


भा०:-धर्म को सुनकर आपके कहने के अनुसार आचरण करेंगे इससे हे द्विजों में उत्तम तुम धर्म का वर्णन करो और ये द्विज धर्म की अभिलाषा वाले हैं ॥६॥ इस प्रकार जब उन मुनियों ने कहा उस समय उन से विष्णु ऋषि बोले कि हे शुद्ध निष्पाप मुनियो ! जिस धर्म को हम क्रम से कहेंगे उस को तुम सुनो ॥७॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और किन्हीं के मत से (शूद्र) के लिये भी धर्म का सारांश हम कहेंगे उसे तुम लोग सुनो । अर्थात् किन्हीं ऋषि आचार्यों का मत है कि शूद्र के लिये कोई भी धर्मोपदेश नहीं है । अन्यों के मत से स्मार्त्त धर्म में शूद्र को अधिकार है ॥८॥ ऋतु (रजो दर्शन से १६ दिन के भीतर) में स्त्री और पुरुष के संयोग से आप ब्राह्मण पैदा होता है इस से ब्राह्मण का संस्कार गर्भ से लेकर करे ॥९॥ सीमन्त (अतभागा) कर्म स्त्री का संस्कार नहीं है किन्तु गर्भ का है इस से प्रतिगर्भ में सीमन्त करे ॥ १० ॥

(१०) गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन ये तीनों संस्कार किन्हीं ऋषियों के मत में गर्भवती स्त्री के होते हैं और मनुष्य की पैदाइश के खेत रूप स्त्री के शुद्ध होने से सन्तान भी शुद्ध होते हैं। इस कारण गर्भाधानादि तीनों संस्कार प्रथम गर्भ में एक ही बार करे प्रतिगर्भ में नहीं। परन्तु विष्णु ऋषि का मत है कि सीमन्त संस्कार गर्भिणी का नहीं किन्तु गर्भ का ही संस्कार है इस से प्रत्येक गर्भ में कर्त्तव्य है ।