भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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५८ भाषार्थसहिता ॥

कृष्णाजिनंतुयोदद्या-त्सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३३२ ॥
उद्धरेन्नरकस्थाना-त्कुलान्येकोत्तरंशतम् ।
आदित्योवरुणोविष्णुर्ब्रह्मासोमोहुताशनः ॥ ३३३ ॥
शूलपाणिस्तुभगवान् अभिनन्दतिभूमिदम् ।
वालुकानांकृताराशि-र्यावत्सप्तर्षिमण्डलम् ॥ ३३५ ॥
गतेवर्षशतेचैव पलमेकंविशीर्यति ।
क्षयंचदृश्यतेतस्य कन्यादानेनचैवहि ॥३३६॥
आतुरेप्राणदाताच त्रीणिदानफलानिच ।
सर्वेषामेवदानानां विद्यादानंततोधिकम् ॥ ३३७ ॥
पुत्रादिस्वजनेदद्या-द्विप्रायचनकैतवे ।
सकामःस्वर्गमाप्नोति निष्कामोमोक्षमाप्नुयात् ॥३३८॥
ब्राह्मणेवेदविदुषि सर्वशास्त्रविशारदे ।
मातृपितृपरेचैव ऋतुकालाभिगामिनि ॥ ३३९ ॥

ली मृगछाला को जो देता है ॥ ३३२ ॥ वह नरक में पड़े एक सौ एक कुलों का उद्धार करता है । सूर्य—वरुण—विष्णु—ब्रह्मा—चन्द्रमा—अग्नि ॥ ३३३ ॥ और भगवान् शिव जी भूमि के देने वाले की प्रशंसा करते हैं । सात ऋषियों के मंडल पर्यन्त किया जो बालू (रेत) का ढेर है॥३३५॥ वह भी वर्ष पीछे एक पल २ भी कमती होने से नष्ट हो जाता है परन्तु कन्या के दान में जो धर्म होता है वह नष्ट नहीं होता ॥३३६॥ आतुर (दुःखी) को प्राण का दान जो देता है उसको दान के तीन फल (धर्म अर्थ काम) होते हैं । सब दानों के बीच में सब से अधिक विद्या का दान है ॥३३७॥ पुत्र आदि स्वजन को-और सुपात्र ब्राह्मण को विद्या दे और कपटी को न दे-कुछ कामना रखने वाला-स्वर्ग को तथा किसी द्रव्य आदि की इच्छा न करने वाला मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३३८ ॥ जो ब्राह्मण वेद को जानता हो, शास्त्रों में जो चतुर हो माता पिता का भक्त हो—और जो ऋतु के समय में ही स्त्री से संग करता हो ॥ ३३९ ॥