भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिस्मृतिः ॥

शीलचारित्रसंपूर्णे प्रातःस्नानपरायणे ।
तस्यैवदीयतेदानं यदीच्छेच्छ्रेयआत्मनः ॥ ३४० ॥
संपूज्यविदुषोविप्रान् अन्येभ्योपिप्रदीयते ।
तत्कार्यंनैवकर्तव्यं नदृष्टंनश्रुतंमया ॥ ३४१ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि श्राद्धकर्मणियेद्विजाः ।
पितृणामक्षयंदानं दत्तंयेषांतुनिष्फलम् ॥ ३४२ ॥
नहीनांगोनरोगीच श्रुतिस्मृतिविवर्जितः ।
नित्यंचानृतवादीच वणिक्श्राद्धेनभोजयेत् ॥३४३॥
हिंसारतंचकपटमुपगुह्याश्रुतंचयः ।
किंकरंकपिलंक्राणं श्वित्रिणंरोगिणंतथा ॥ ३४४ ॥
दुश्चर्माणंशीर्णकेशं पाण्डुरोगंजटाधरम् ।
भारवाहितरौद्रंच द्विभार्यंवृषलीपतिम् ॥ ३४५ ॥


शील तथा उत्तम आचरण में लगा हो और प्रातःकाल स्नान में जो तत्पर हो ऐसे सुपात्र ब्राह्मण को अपना कल्याण चाहने वाला दाता दान दे ॥३४०॥ विद्वान् ब्राह्मण का प्रथम पूजन करके अन्य (मूर्ख) ब्राह्मणों को दान देवे । और उस कार्य को नहीं करना जिस को स्वयं न देखा और न सुना हो ॥३४१॥ इस से आगे यह कहते हैं कि श्राद्ध कर्म में कैसे ब्राह्मण हों कि पितरों के निमित्त जिन को दिया दान अक्षय फल दायक होता और जिन को दिया निष्फल होता है ॥ ३४२ ॥ लूना लंगड़ा आदि (रोगी) श्रुति स्मृति को न पढ़ा न जानता हो—जो नित्य झूठ बोलता हो जो व्यापारी हो इन ब्राह्मणों को श्राद्ध में न जिमावे ॥ ३४३ ॥ हिंसा में तत्पर—कपटी—और जो अपने वेद को छिपा कर किंकर बन जाय—पीला—काणा—श्वेतकुष्ठ वा अन्य रोग जिसे घेरे हो ॥ ३४४ ॥ जिस के देह की त्वचा बिगड़ी फटी हो—जिस के केश गिर पड़े हों—पाण्डुरोगी—जटाधारी—भार (बोझ) का ढोने वाला—भयानक—जिस के दो स्त्री हों—शूद्र स्त्री से जिस ने विवाह किया हो ॥ ३४५ ॥