अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० भाषार्थसहिता-
भेदकारीभवेच्चैव बहुपीडाकरोपिवा । हीनातिरिक्तगात्रोवा तमप्यपनयेत्तथा ॥ ३४६ ॥
बहुभोक्तादीनमुखो मत्सरीक्रूरबुद्धिमान् । एतेषांनैवदातव्यः कदाचित्त्तुप्रतिग्रहः ॥ ३४७ ॥
अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपंक्तिदूषणैः । अदुष्यंतंयमःप्राह पंक्तिपावनएषसः ॥ ३४८ ॥
श्रुतिःस्मृतिश्चविप्राणां नयनेद्वेप्रकीर्तिते । काणःस्यादेकहीनोपि द्वाभ्यामन्धःप्रकीर्तितः ॥३४९॥
नश्रुतिर्नस्मृतिर्यस्य नशीलंनकुलंयतः । तस्यश्राद्धंनदातव्यं त्वन्धकस्यात्रिरब्रवीत् ॥३५०॥
तस्माद्वेदेनशास्त्रेण ब्राह्मणंब्राह्मणस्यतु । नचैकेनैववेदेन भगवानत्रिरब्रवीत् ॥ ३५१ ॥
भेद का कर्त्ता (मन फटाने वाला) बहुतों को पीड़ा करने वाला जिस के अङ्ग हीन (कम) अथवा अधिक हों-इन को श्राद्ध में से दूरकर दे ॥ ३४६॥ बहुत खाने वाला-जिसके मुखपर दीनताझलकती हो-जो दूसरेके गुणोंमें दोषोंको देखता हो-कठोर जिस की बुद्धि हो-ऐसे को कदाचित भी दान नहीं देवे ॥ ३४७ ॥ जो ब्राह्मण वेद को पढ़ा हो तथा जानता हो और चाहे वह शरीर में जो दोष कहे हैं उन वाला भी हो-तो भी उस को यम ने शुद्ध कहा है क्योंकि वह पङ्क्ति को पवित्र करने वाला है ॥ ३४८ ॥ वेद और स्मृति ये दोनों ब्राह्मणों के नेत्र कहे हैं-इन के मध्य में एक को जो नहीं जानता वह काणा और जो दोनों को न जानता हो वह अंधा शास्त्र में कहा है ॥ ३४९ ॥ जो न वेद को और न स्मृति को जानता हो-न शील वान्हो-न कुलीन हो उस अंधे को श्राद्ध में निमन्त्रण नहीं देना यह अत्रि ऋषि ने कहा है ॥ ३५० ॥ जिस से ब्राह्मण का ब्राह्मणपन वेद और शास्त्र से ही है किन्तु केवल वेद से नहीं है यह भगवान् अत्रि ने कहा है ॥ ३५१ ॥