भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिसमृतिः ॥ ६१

योगस्थैर्लोचनैर्युक्तः पादाग्रंचप्रपश्यति । लौकिकज्ञश्चशास्त्रोक्तं पश्येच्चैषोधरोत्तरम् ॥३५२॥ वेदैश्चऋषिभिर्गीतं दृष्टिमान्शास्त्रवेदवित् । व्रतिनंचकुलीनंच श्रुतिस्मृतिरतंसदा ॥३५३ ॥ तादृशंभोजयेच्छ्राद्धे पितॄणामक्षयंभवेत् । यावतो ग्रसतेग्रासान् पितॄणांदीप्ततेजसाम् ॥३५४॥ पितापितामहश्चैव तथैवप्रपितामहः । नरकस्थाविमुच्यंते ध्रुवंयांतित्रिविष्टपम् ॥ ३५५ ॥ तस्माद्विप्रंपरीक्षेत श्राद्धकालेप्रयत्नतः । ननिर्वपति यःश्राद्धंप्रमीतपितृकोद्विजः ॥३५६ ॥ इन्दोःक्षयेमासिमासि प्रायश्चित्तीभवेत्तुसः । सूर्येकन्यागतेकुर्या-च्छ्राद्धंयोनगृहाश्रमी ॥३५७ ॥


योग शास्त्र में कहे अनुसार जिस के नेत्र हों-और अपने चरणों के अग्रभाग को ही जो देखता है अर्थात् कहीं भी कुदृष्टि न करता हो लौकिक व्यवहार जानता हो और शास्त्र में कहे ऊंच नीच को जो देखता हो ॥३५२॥ और ज्ञानवान् हो-शास्त्र और वेद का ज्ञाता हो-व्रत करने वाला हो-कुलीन हो-वेद और स्मृतियों के पठन और पाठम में जो तत्पर हो ॥३५३॥ ऐसे ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। प्रदीप्त तेज वाले पितरों सम्बन्धी जितने ग्रासों को पूर्वोक्त ब्राह्मण खाता है उतने ही शीघ्र २ ॥ ३५४ ॥ पिता-पितामह-और प्रपितामह ये सब नरक में पड़े हुए भी मुक्त हो जाते हैं और निश्चय कर स्वर्ग को प्राप्त हो जाते हैं ॥३५५॥ तिस से श्राद्ध के समय बड़े यत्न से ब्राह्मण की परीक्षा करै । जिस द्विज का पिता मरगया हो यदि वह ॥३५६॥ महीने २ में अमावस के दिन श्राद्ध नहीं करता तो प्रायश्चित्त के योग्य होता है । कन्या के सूर्य कन्यागत कहाते उसी का बिगड़ा शब्द ( कनागत ) होगया है उस काल में जो गृहस्थी श्राद्ध न करै ॥ ३५७ ॥