अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ | भाषार्थसहिता ॥
धनंपुत्रान्कुलंतस्य पितृनिश्वासपीडया ।
कन्यागतेसवितरि पितरोयान्तिसत्सुतान् ॥ ३५८ ॥
शून्याप्रेतपुरीसत्रां यावद्वृश्चिकदर्शनम् ।
ततोवृश्चिकसंप्राप्ते निराशाःपितरोगताः ॥३५९ ॥
पुनःस्वभवनंयान्ति शापंदत्वासुदारुणम् ।
पुत्रंवाभ्रातरंवापि दौहित्रंपौत्रकंतथा ॥ ३६० ॥
पितृकार्येप्रसक्ताये तेयान्तिपरमांगतिम् ।
यथानिर्मंथनादग्निः सर्वकाष्ठेषुतिष्ठति ॥ ३६१ ॥
तथासंदृश्यतेधर्मः श्राद्धदानान्नसंशयः ।
यःप्राप्नोतितदासर्वं कन्यागतेचगंगया ॥ ३६२ ॥
सर्वशास्त्रार्थगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सर्वयज्ञफलंविद्याच्छ्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६३ ॥
महापातकसंयुक्तो योयुक्तश्चोपपातकैः ॥
तो पितरों की लंबीश्वास द्वारा उस का धन पुत्र और कुल नष्ट होता है । कन्या राशि पर जब सूर्य आते हैं तब पितर अपने उत्तम पुत्रों के समीप आते हैं ॥ ३५८ ॥ जब तक वृश्चिक की संक्रांति नहीं लगती तब तक यमराज की पुरी शून्य रहती है फिर वृश्चिक संक्रांति के आते ही निराश होकर पितर लौट जाते हैं ॥ ३५९ ॥ फिर वे यहां भयानक शाप देकर अपने लोक को चले जाते हैं पुत्र-भाई-लड़की का लड़का-और पोता ॥ ३६० ॥ जो ये सब पितरों के श्राद्ध में तत्पर हों तो वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं-जैसे मथने से सब काठों में अग्नि की स्थिति दीखती है ॥३६१॥ वैसे ही श्राद्ध के देने से धर्म का विस्तार प्रत्यक्ष दीखता है' इस में संशय नहीं है। और जो कनागतों में गंगा पर श्राद्ध करता है उसे सब फल प्राप्त होता है ॥ ३६२ ॥ सब शास्त्रों के अर्थों को जानना-सब तीर्थों में स्नान-और सब यज्ञों का