भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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अत्रिसमृतिः ॥ ६३

घनैर्मुक्तोयथाभानू राहुमुक्तश्चचन्द्रमाः ॥ ३६४ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापंविलङ्घयेत् । सर्वसौख्यमयं प्राप्तः श्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६५ ॥ सर्वेषामेवदानानां श्राद्धदानं विशिष्यते । मेरुतुल्यंकृतं पापं श्राद्धदानं विशोधनम् ॥ ३६६ ॥ श्राद्धंकृत्वातूमर्त्यो वै स्वर्गलोके महीयते । अमृतंब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नंपयःस्मृतम् ॥ ३६७ ॥ वैश्यस्यचान्नमेवाज्यं शूद्रान्नंरुधिरंभवेत् । एतत्सर्वंमयाख्यातं श्राद्धकालेसमुत्थिते ॥ ३६८ ॥ वैश्वदेवंचहोमेच देवताभ्यर्चने जपेत् । अमृतंतेनविप्रान्नं ऋग्यजुः सामसंस्कृतम् ॥ ३६९ ॥ व्यवहारानुपूर्व्येण धर्मेणाबलिभिर्जितम् ।

फल श्राद्ध के दान से जानो इस में संदेह नहीं है ॥ ३६३ ॥ जो महापातकी वा उपपातकी हो वह पुरुष भी श्राद्ध के दान से मेघों में से निकले सूर्य और राहु से छूटे चन्द्रमा के समान शुद्ध निर्दोष होता है ॥ ३६४ ॥ और वह सब पापों से छूटा हुआ सब पापों के पार हो जाता तथा श्राद्ध के देने से सब सुखों को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥ ३६५ ॥ सब दानों में श्राद्ध का दान अधिक फल देने वाला है मेरु पहाड़ के तुल्य जो पाप किया हो तो उस से भी शुद्ध करने वाला श्राद्ध का दान है ॥ ३६६ ॥ मनुष्य श्राद्ध कर के स्वर्गलोक में पूजा जाता है ब्राह्मण का अन्न श्राद्ध में अमृत रूप क्षत्रिय का अन्न दूध रूप ॥ ३६७ ॥ वैश्य का अन्न घृत रूप और शूद्र का अन्न रुधिर रूप होता है—यह जो सब हम ने कहा है इस को श्राद्ध के समय, बलि वैश्वदेव, होम, देवताओं का पूजन, इन कामों में जपै ॥ ३६८ ॥ ऋग्वेद-यजुर्वेद सामवेद-के मन्त्रों से ब्राह्मण का अन्न निर्मल होने से अमृत रूप है ॥ ३६९ ॥ व्यवहार के क्रम से और धर्म से बलवानों को जीत कर संचय किया है इस में क्षत्री