अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ भाषार्थसहिता ॥
क्षत्रियान्नंपयस्तेन घृतान्नंयज्ञपालने ॥३७०॥
देवोमुनिर्द्विजोराजा वैश्यःशूद्रोनिषादकः ।
पशुर्म्लेंच्छोऽपिचांडालो विप्रादशविधाःस्मृताः ॥३७१॥
संध्यांस्नानंजपंहोमंदेवतानित्यपूजनम् ॥
अतिथिंवैश्वदेवंच देवब्राह्मणउच्यते ॥३७२॥
शाकेपत्रेफलेमूले वनवासेसदारतः ।
निरतोऽहरहःश्राद्धे सविप्रोमुनिरुच्यते ॥ ३७३ ॥
वेदान्तंपठतेनित्यंसर्वसंगंपरित्यजेत् ।
सांख्ययोगविचारस्थः सविप्रोद्विजउच्यते ॥३७४ ॥
अस्त्राहताश्चधन्वानः संग्रामेसर्वसंमुखे ।
आरंभेनिर्जितायेन सविप्रःक्षत्रउच्यते ॥ ३७५ ॥
कृषिकर्मरतोयश्च गवां च प्रतिपालकः ।
वाणिज्यव्यवसायश्च सविप्रोवैश्यउच्यते ॥ ३७६ ॥
का अन्न दूध रूप है और यज्ञ की रक्षा करने से वैश्य का अन्नघृतरूप है ॥३७०॥
देव, मुनि, द्विज, राजा, वैश्य, शूद्र, निषाद, पशु, म्लेच्छ, चांडाल ये दश प्रकार के (जिन को आगे कहते हैं) ब्राह्मण कहे हैं ॥ ३७१ ॥ संध्या, स्नान, + जप, + होम, देवपूजा, अतिथि सत्कार और बलिवैश्वदेव इन का-मों को नित्य नियम से जो करे-उस ब्राह्मण को देव कहते हैं ॥ ३७२ ॥ जो शाक, पत्ते, फल, मूल इन को भक्षण करे सदा ही एकान्त रहने में प्रसन्न हो तथा प्रति दिन श्राद्ध करने में जो तत्पर हो उस ब्राह्मण को मुनि कहते हैं ॥३७३॥ जो वेदान्त को नित्य पढ़े और सब के संग को त्यागे सांख्य और योग शास्त्र के विचार में जो स्थिर हो उस ब्राह्मण को द्विज कहते हैं ॥३७४॥ जिसने सब के स-म्मुख संग्राम में धनुषधारियों को शस्त्रास्त्रों से मारा हो और जिसने आरंभ में ही सब को जीता हो उस ब्राह्मण को क्षत्री कहते हैं ॥३७५॥ जो खेती के काम में मग्न हो और गौओं के पालने में तत्पर हो-जो लेन देन करता हो उस ब्रा-ह्मण को वैश्य कहते हैं ॥ ३७६ ॥
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