भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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अत्रिस्मृतिः ॥ ६५

लाक्षालवणसंमिश्रं कुसुंभक्षीरसर्पिषः ।
विक्रेतामधुमांसानां सविप्रःशूद्रउच्यते ॥ ३७७ ॥
चौरश्चतस्करश्चैव सूचकोदंशकस्तथा ।
मत्स्यमांसेसदालुब्धो विप्रोनिषादउच्यते ॥ ३७८ ॥
ब्रह्मतत्वंनजानाति ब्रह्मसूत्रेणगर्वितः ।
तेनैवसचपापेन विप्रःपशुरुदाहृतः ॥ ३७९ ॥
वापीकूपतड़ागाना-मारामस्यसरस्सुच ।
निश्शंकंरोधकश्चैव सविप्रोम्लेच्छउच्यते ॥ ३८० ॥
क्रियाहीनश्चमूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः ।
निर्दयःसर्वभूतेषु विप्रश्चांडालउच्यते ॥ ३८१ ॥
वेदैर्विहीनाश्चपठन्तिशास्त्रं
शास्त्रेणहीनाश्चपुराणपाठाः ।


लाख, लवण कुसूम दूध, घी मिठाई शहद मांस इन को जो बेंचे उस ब्राह्मण को शूद्र कहते हैं ॥ ३७७ ॥ जो चोरी, ठगई लूट निन्दा कठोर आक्षेप करने वाला तथा मछली के मांस का लोभी हो ऐसे ब्राह्मण को निषाद बधिक हिंसक कहते हैं ॥३७८॥ जो ब्रह्म (वेद) के तत्व को न जाने और यज्ञोपवीत का जिसे अभिमान हो उसी पाप से उस ब्राह्मण को पशु कहते हैं ॥३७९॥ बावडी, कूप, ताल बाग, छोटा तालाब इनको जो निश्शंक होकर रोके उस ब्राह्मण को म्लेच्छ कहते हैं ॥३८०॥ जो ब्राह्मण के सब कर्मों से हीन हो-मूर्ख हो-सर्वधर्मों से रहित हो किसी भीप्राणी पर जिस को दया न हो ऐसे ब्राह्मण को चांडाल कहते हैं ॥३८१॥ वेद जिन्हें नहीं आता वे दर्शन शास्त्रों को पढ़ते हैं और शास्त्र जिन्हें नहीं आते वे पुराणों को पढ़ते हैं-पुराण भी जिन्हें नहीं आते वे खेती करते हैं और जिनपै खेती भी नहीं हो सकती वे भागवत नाम चिमटा ले बाल रक्षा के