अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६६ | भाषार्थसंहिता ॥ |
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पुराणहीनाःकृषिणोभवन्ति
भ्रष्टास्ततोभागवताभवन्ति ॥ ३८२ ॥
ज्योतिर्विदोऽथर्वाणः कीराःपौराणपाठकाः ।
श्राद्धेयज्ञेमहादाने वरणीयाःकदाचन ॥३८३॥
श्राद्धेचेत्पितरोघोरं दानंचैवतन्निष्फलम् ।
यज्ञेचफलहानिःस्यात् तस्मात्तान्परिवर्जयेत् ॥३८४॥
आविकाश्चित्रकारश्च वैद्योनक्षत्रपाठकः ।
चतुर्विप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८५॥
मागधोमाथुरश्चैव कापटःकीटकानजौ ।
पञ्चविप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८६॥
क्रयक्रीताचयाकन्या पत्नीसानविधीयते ।
(वैरागी) हो जाते हैं ॥ ३८२ ॥ ज्योतिषी, अथर्ववेदी, कीर (अहां तहां कंठ से जो तोते की तरह उपदेश करे) पुराण के पढ़ने वाले-इनको ब्राह्मणों के श्राद्ध यज्ञ और महान् दान में कदाचित् ही वरे अर्थात् औरों के अभाव में ही इन को अधिकार है ॥३८३॥ श्राद्ध में पूर्वोक्त ब्राह्मणों के जिमाने से पितर घोर नरक में जाते दान निष्फल होता और यज्ञ में फल की हानि होती है जिससे पूर्वोक्त ब्राह्मणों को वर्ज दे ॥३८४॥ भेड़ौं का पालने वाला, चित्र काढ़ने वाला, वैद्य और नक्षत्र पाठक (घर २ नक्षत्र तिथि जो बताता फिरे) ये चार ब्राह्मण बृहस्पति के समान बड़े विद्वान् भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं हैं ॥३८५॥ मगध देश का वासी, माथुर (चौबे), कपट देश का वासी, कीट और कान देश में जो पैदा हुए हों-ये पांच चाहे बृहस्पति के समान भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं ॥३८६॥ मोल ली हुई कन्या पत्नी (भार्या) नहीं
टि० (३८२) वेद पढ़ के धर्मानुकूल उत्तम जीविका से निर्वाह करने वाले ब्राह्मण सब से उत्तम, नैयायिकादि धर्म विषय में उन से नीचे हैं। तथा पुराण पढ़ देख कथा बांच २ जीविका करने वाले उन से भी नीचे हैं। उन से भी शंख शैली आदि करने वाले और वास्तव में साधु न होने पर भी जटाधारी तापसी आदि का वेष बनाकर पुजाने वाले सब से नीच अधर्मी हैं। जीविका परक यहां ऊंच नीच का विचार दिखाया जानो।