भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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अत्रिसमृतिः ॥ ६९

तस्यांजाताःसुतास्तेषां पितृपिण्डंनविद्यते ॥३८७॥
अष्टशल्यागतंनीरं पाणिनापिबतेद्विजः ।
सुरापानेनतत्तुल्यं तुल्यंगोमांसभक्षणम् ॥३८८॥
ऊर्ध्वजङ्घेषुविप्रेषु प्रक्षाल्यचरणद्वयम् ।
तावच्चाण्डालरूपेण यावद्गंगांनमज्जति ॥३८९॥
दीपशय्यासनच्छाया-कार्पासं दन्तधावनम् ।
अजारेणुस्पृशंचैव शक्रस्यापिश्श्रियंहरेत् ॥३९०॥
गृहाद्दशगुणं कूपं कूपाद्दशगुणं तटम् ।
तटाद्दशगुणं नद्यां गंगासंख्यानविद्यते ॥ ३९१ ॥
स्रवद्यद्ब्राह्मणंतोयं रहस्यं क्षत्रियंतथा ।
वापीकूपेषुवैश्यं स्या-च्छूद्रंभाण्डोदकंतथा ॥ ३९२ ॥
तीर्थस्नानंमहादानं यच्चान्यत्तिलतर्पणम् ।


होती और उस से पैदा हुए पुत्रों को श्राद्ध करने पिंड देने का अधिकार नहीं है ॥३८७॥ अष्टशल्या (पुर) के जल को जो द्विज हाथ से पीता है वह जल मदिरा के पीने और गोमांस भक्षण के समान दूषित है इस से पुर वा चर्स आदि नामका चाम के पात्र में जल नहीं पीना चाहिये ॥ ३८८ ॥ जो खड़े हुए ब्राह्मण के दोनों चरण धोते हैं वे तब तक चांडालरूप रहते हैं जब तक गंगा स्नान न कर लें इस से बैठा कर ब्राह्मण के पग धोना उचित है ॥ ३८९ ॥ दीपक शय्या और आसन इन तीनों की छाया (जो ऊपर पड़े)—कपास के वृक्ष की दतौन बकरे की धूल का स्पर्श ये तीनों इन्द्र की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् दीपकादि की छायादि से मनुष्यों को बचना चाहिये ॥३९०॥ घरसे दश गुणा पुण्य कूपपर कूप से दश गुणा तट पर—तट से दश गुणा नदी में स्नान से होता है—और गंगास्नान के पुण्य की संख्या (गिनती) नहीं है ॥ ३९१ ॥ बहते हुये जल की ब्राह्मण संज्ञा है—एकान्त के जल की क्षत्री और बावली तथा कूप के जल की वैश्य संज्ञा है—भांड (बरतन) में धरे जल की शूद्र संज्ञा है ॥ ३९२ पिता के मरने के अनंतर एक वर्ष तक तीर्थ स्नान और