भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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६८ भाषार्थसहिता ॥

अब्दमेकंनकुर्वीत महागुरुनिपातः ॥३९३॥
गंगागयात्वमावास्या वृद्धिश्राद्धेक्षयेऽहनि ।
मघाणिपडप्रदानंस्या-दन्यत्रपरिवर्जयेत् ॥ ३९४॥
घृतंवायदिवातैलं पयोवायदिवादधि ।
चत्वारोह्याज्यसंस्थाना हुतंनैवतुवर्जयेत् ॥ ३९५॥
श्रुत्वैतान्नृषयोधर्मान् भाषितानत्रिणास्वयम् ।
इदमूचुर्महात्मानं सर्वेतेधर्म्मनिष्ठिताः ॥ ३९६ ॥
यइदंधारयिष्यन्ति धर्मशास्त्रमतन्द्रिताः ।
इहलोकेयशःप्राप्य तेयास्यन्तित्रिविष्टपम् ॥ ३९७॥
विद्यार्थीलभतेविद्यां धनकामोधनानिच ।
आयुष्कामस्तथैवायुः श्रीकामोमहतीं श्रियम् ॥ ३९८ ॥
इति श्रीअत्रिमहर्षिनिर्मिता स्मृतिः समाप्ता ॥


महादान और तिलों से तर्पण न करे ॥ ३९३॥ गंगा-गया-अमावस-वृद्धि श्राद्ध (नांदी मुख) क्षयी श्राद्ध कनागत का और मघा नक्षत्र में पिण्डदान इन को तो पिता के मरण के अनंतर वर्ष के मध्य में भी करै और इन से अन्य कर्मों को त्याग दे ॥३९४ ॥ घी-तिलका तेल--दूध-दही-ये चारों घी के स्थानी हैं अर्थात् घी के अभाव में इन से ही होम करे होम का त्याग कदापि न करे ॥३९५॥अत्रि ऋषि ने स्वयं कहे इन धर्मों को सब ऋषि सुनकर धर्म में भली प्रकार स्थित हुये वे सब ऋषि, महात्मा अत्रि ऋषि के प्रति यह बोले कि ॥३९६॥ जो पुरुष आलस्य को त्याग कर इस धर्म शास्त्र को जानेगे वे इस लोक में यश को प्राप्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होंगे ॥ ३९७ ॥ इस शास्त्र के पढ़ने से विद्यार्थी विद्या को धनार्थी धन को--अवस्था की जिसे इच्छा हो वह अवस्था को, तथा लक्ष्मी की जिसे इच्छा हो वह लक्ष्मी को-प्राप्त होता है ॥ ३९८ ॥

इत्यत्रिमहर्षिस्मृतिभाषा समाप्ता ॥