अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशायनमः
अथ विष्णुस्मृतिः
अर्थात् विष्णुप्रोक्तधर्मशास्त्रप्रारम्भः ॥
विष्णुमेकाग्रमासीनं श्रुतिस्मृतिविशारदम् ।
पप्रच्छुर्मुनयःसर्वे कलापग्रामवासिनः ॥१॥
कृतेयुगेह्यपक्षीणं लुप्तोधर्म्मस्सनातन्ः ।
तत्रवैशीर्यमाणेच धर्मानप्रतिमार्गितः ॥ २ ॥
त्रेतायुगेऽथसंप्राप्ते कर्तव्यञ्चास्यसंग्रहः ।
यथासंप्राप्यतेस्माभिस्तत्त्वन्नोवक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
वर्णाश्रमाणांयोधर्मो विशेषश्चैवयः कृतः ।
भेदन्तथैवचैषांयस्तन्नोब्रूहिद्विजोत्तम ॥ ४ ॥
ऋषीणांसमवेतानां त्वमेवपरमोमतः ।
भाषार्थः-श्रुति और स्मृतियों के जानने में चतुर एकाग्र बैठे हुए विष्णु नामक ऋषि से कलाप ग्राम के वासी सब मुनियों ने यह पूछा ॥१॥ कि कृतयुग बीतने पर सनातनधर्म लुप्त होगया और कृतयुग के बीतने पर किसी ने भी धर्म का शोधन नहीं किया ॥२॥ अब त्रेतायुग वर्त्तमान है इस में धर्म का संग्रह अवश्य करना चाहिये यह धर्म जिस रीतिसे हमको प्राप्त हो वह रीति आप हम से कहिये ॥३॥ वर्ण और आश्रमों का जो धर्म और इन धर्मों की विशेषता ऋषियों ने की है और परस्पर के धर्म का भेद—यह सब हे द्विजो' में श्रेष्ठ हम से कहो ॥ ४ ॥ यहां इकट्ठे हुए ऋषियों ने तुम ही श्रेष्ठ माने हो इससे हे सुव्रत संपूर्ण धर्म का वक्ता तुम से अन्य नहीं है ॥ ५ ॥
( १ ) ये विष्णु जो धर्मशास्त्र के वक्ता हैं साक्षात् भगवान् नहीं हैं किन्तु यद्यपि सब ऋषि विष्णु के ही नाम रूप भेद हैं तथापि अन्य ऋषियों के समान विष्णु नामक भी एक ऋषि थे जिन ने इस धर्मशास्त्र को वेद का गूढाशय लेकर संक्षेप से प्रकट किया है ऐसा अनुमान है ।