अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
अत्रिसमृतिः ॥ ६३
घनैर्मुक्तोयथाभानू राहुमुक्तश्चचन्द्रमाः ॥ ३६४ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापंविलङ्घयेत् । सर्वसौख्यमयं प्राप्तः श्राद्धदानान्नसंशयः ॥ ३६५ ॥ सर्वेषामेवदानानां श्राद्धदानं विशिष्यते । मेरुतुल्यंकृतं पापं श्राद्धदानं विशोधनम् ॥ ३६६ ॥ श्राद्धंकृत्वातूमर्त्यो वै स्वर्गलोके महीयते । अमृतंब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नंपयःस्मृतम् ॥ ३६७ ॥ वैश्यस्यचान्नमेवाज्यं शूद्रान्नंरुधिरंभवेत् । एतत्सर्वंमयाख्यातं श्राद्धकालेसमुत्थिते ॥ ३६८ ॥ वैश्वदेवंचहोमेच देवताभ्यर्चने जपेत् । अमृतंतेनविप्रान्नं ऋग्यजुः सामसंस्कृतम् ॥ ३६९ ॥ व्यवहारानुपूर्व्येण धर्मेणाबलिभिर्जितम् ।
फल श्राद्ध के दान से जानो इस में संदेह नहीं है ॥ ३६३ ॥ जो महापातकी वा उपपातकी हो वह पुरुष भी श्राद्ध के दान से मेघों में से निकले सूर्य और राहु से छूटे चन्द्रमा के समान शुद्ध निर्दोष होता है ॥ ३६४ ॥ और वह सब पापों से छूटा हुआ सब पापों के पार हो जाता तथा श्राद्ध के देने से सब सुखों को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥ ३६५ ॥ सब दानों में श्राद्ध का दान अधिक फल देने वाला है मेरु पहाड़ के तुल्य जो पाप किया हो तो उस से भी शुद्ध करने वाला श्राद्ध का दान है ॥ ३६६ ॥ मनुष्य श्राद्ध कर के स्वर्गलोक में पूजा जाता है ब्राह्मण का अन्न श्राद्ध में अमृत रूप क्षत्रिय का अन्न दूध रूप ॥ ३६७ ॥ वैश्य का अन्न घृत रूप और शूद्र का अन्न रुधिर रूप होता है—यह जो सब हम ने कहा है इस को श्राद्ध के समय, बलि वैश्वदेव, होम, देवताओं का पूजन, इन कामों में जपै ॥ ३६८ ॥ ऋग्वेद-यजुर्वेद सामवेद-के मन्त्रों से ब्राह्मण का अन्न निर्मल होने से अमृत रूप है ॥ ३६९ ॥ व्यवहार के क्रम से और धर्म से बलवानों को जीत कर संचय किया है इस में क्षत्री
६४ भाषार्थसहिता ॥
क्षत्रियान्नंपयस्तेन घृतान्नंयज्ञपालने ॥३७०॥
देवोमुनिर्द्विजोराजा वैश्यःशूद्रोनिषादकः ।
पशुर्म्लेंच्छोऽपिचांडालो विप्रादशविधाःस्मृताः ॥३७१॥
संध्यांस्नानंजपंहोमंदेवतानित्यपूजनम् ॥
अतिथिंवैश्वदेवंच देवब्राह्मणउच्यते ॥३७२॥
शाकेपत्रेफलेमूले वनवासेसदारतः ।
निरतोऽहरहःश्राद्धे सविप्रोमुनिरुच्यते ॥ ३७३ ॥
वेदान्तंपठतेनित्यंसर्वसंगंपरित्यजेत् ।
सांख्ययोगविचारस्थः सविप्रोद्विजउच्यते ॥३७४ ॥
अस्त्राहताश्चधन्वानः संग्रामेसर्वसंमुखे ।
आरंभेनिर्जितायेन सविप्रःक्षत्रउच्यते ॥ ३७५ ॥
कृषिकर्मरतोयश्च गवां च प्रतिपालकः ।
वाणिज्यव्यवसायश्च सविप्रोवैश्यउच्यते ॥ ३७६ ॥
का अन्न दूध रूप है और यज्ञ की रक्षा करने से वैश्य का अन्नघृतरूप है ॥३७०॥
देव, मुनि, द्विज, राजा, वैश्य, शूद्र, निषाद, पशु, म्लेच्छ, चांडाल ये दश प्रकार के (जिन को आगे कहते हैं) ब्राह्मण कहे हैं ॥ ३७१ ॥ संध्या, स्नान, + जप, + होम, देवपूजा, अतिथि सत्कार और बलिवैश्वदेव इन का-मों को नित्य नियम से जो करे-उस ब्राह्मण को देव कहते हैं ॥ ३७२ ॥ जो शाक, पत्ते, फल, मूल इन को भक्षण करे सदा ही एकान्त रहने में प्रसन्न हो तथा प्रति दिन श्राद्ध करने में जो तत्पर हो उस ब्राह्मण को मुनि कहते हैं ॥३७३॥ जो वेदान्त को नित्य पढ़े और सब के संग को त्यागे सांख्य और योग शास्त्र के विचार में जो स्थिर हो उस ब्राह्मण को द्विज कहते हैं ॥३७४॥ जिसने सब के स-म्मुख संग्राम में धनुषधारियों को शस्त्रास्त्रों से मारा हो और जिसने आरंभ में ही सब को जीता हो उस ब्राह्मण को क्षत्री कहते हैं ॥३७५॥ जो खेती के काम में मग्न हो और गौओं के पालने में तत्पर हो-जो लेन देन करता हो उस ब्रा-ह्मण को वैश्य कहते हैं ॥ ३७६ ॥
ख
अत्रिस्मृतिः ॥ ६५
लाक्षालवणसंमिश्रं कुसुंभक्षीरसर्पिषः ।
विक्रेतामधुमांसानां सविप्रःशूद्रउच्यते ॥ ३७७ ॥
चौरश्चतस्करश्चैव सूचकोदंशकस्तथा ।
मत्स्यमांसेसदालुब्धो विप्रोनिषादउच्यते ॥ ३७८ ॥
ब्रह्मतत्वंनजानाति ब्रह्मसूत्रेणगर्वितः ।
तेनैवसचपापेन विप्रःपशुरुदाहृतः ॥ ३७९ ॥
वापीकूपतड़ागाना-मारामस्यसरस्सुच ।
निश्शंकंरोधकश्चैव सविप्रोम्लेच्छउच्यते ॥ ३८० ॥
क्रियाहीनश्चमूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः ।
निर्दयःसर्वभूतेषु विप्रश्चांडालउच्यते ॥ ३८१ ॥
वेदैर्विहीनाश्चपठन्तिशास्त्रं
शास्त्रेणहीनाश्चपुराणपाठाः ।
लाख, लवण कुसूम दूध, घी मिठाई शहद मांस इन को जो बेंचे उस ब्राह्मण को शूद्र कहते हैं ॥ ३७७ ॥ जो चोरी, ठगई लूट निन्दा कठोर आक्षेप करने वाला तथा मछली के मांस का लोभी हो ऐसे ब्राह्मण को निषाद बधिक हिंसक कहते हैं ॥३७८॥ जो ब्रह्म (वेद) के तत्व को न जाने और यज्ञोपवीत का जिसे अभिमान हो उसी पाप से उस ब्राह्मण को पशु कहते हैं ॥३७९॥ बावडी, कूप, ताल बाग, छोटा तालाब इनको जो निश्शंक होकर रोके उस ब्राह्मण को म्लेच्छ कहते हैं ॥३८०॥ जो ब्राह्मण के सब कर्मों से हीन हो-मूर्ख हो-सर्वधर्मों से रहित हो किसी भीप्राणी पर जिस को दया न हो ऐसे ब्राह्मण को चांडाल कहते हैं ॥३८१॥ वेद जिन्हें नहीं आता वे दर्शन शास्त्रों को पढ़ते हैं और शास्त्र जिन्हें नहीं आते वे पुराणों को पढ़ते हैं-पुराण भी जिन्हें नहीं आते वे खेती करते हैं और जिनपै खेती भी नहीं हो सकती वे भागवत नाम चिमटा ले बाल रक्षा के
| ६६ | भाषार्थसंहिता ॥ |
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पुराणहीनाःकृषिणोभवन्ति
भ्रष्टास्ततोभागवताभवन्ति ॥ ३८२ ॥
ज्योतिर्विदोऽथर्वाणः कीराःपौराणपाठकाः ।
श्राद्धेयज्ञेमहादाने वरणीयाःकदाचन ॥३८३॥
श्राद्धेचेत्पितरोघोरं दानंचैवतन्निष्फलम् ।
यज्ञेचफलहानिःस्यात् तस्मात्तान्परिवर्जयेत् ॥३८४॥
आविकाश्चित्रकारश्च वैद्योनक्षत्रपाठकः ।
चतुर्विप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८५॥
मागधोमाथुरश्चैव कापटःकीटकानजौ ।
पञ्चविप्रानपूज्यन्ते बृहस्पतिसमायदि ॥३८६॥
क्रयक्रीताचयाकन्या पत्नीसानविधीयते ।
(वैरागी) हो जाते हैं ॥ ३८२ ॥ ज्योतिषी, अथर्ववेदी, कीर (अहां तहां कंठ से जो तोते की तरह उपदेश करे) पुराण के पढ़ने वाले-इनको ब्राह्मणों के श्राद्ध यज्ञ और महान् दान में कदाचित् ही वरे अर्थात् औरों के अभाव में ही इन को अधिकार है ॥३८३॥ श्राद्ध में पूर्वोक्त ब्राह्मणों के जिमाने से पितर घोर नरक में जाते दान निष्फल होता और यज्ञ में फल की हानि होती है जिससे पूर्वोक्त ब्राह्मणों को वर्ज दे ॥३८४॥ भेड़ौं का पालने वाला, चित्र काढ़ने वाला, वैद्य और नक्षत्र पाठक (घर २ नक्षत्र तिथि जो बताता फिरे) ये चार ब्राह्मण बृहस्पति के समान बड़े विद्वान् भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं हैं ॥३८५॥ मगध देश का वासी, माथुर (चौबे), कपट देश का वासी, कीट और कान देश में जो पैदा हुए हों-ये पांच चाहे बृहस्पति के समान भी हों तो भी श्राद्ध में पूजने योग्य नहीं ॥३८६॥ मोल ली हुई कन्या पत्नी (भार्या) नहीं
टि० (३८२) वेद पढ़ के धर्मानुकूल उत्तम जीविका से निर्वाह करने वाले ब्राह्मण सब से उत्तम, नैयायिकादि धर्म विषय में उन से नीचे हैं। तथा पुराण पढ़ देख कथा बांच २ जीविका करने वाले उन से भी नीचे हैं। उन से भी शंख शैली आदि करने वाले और वास्तव में साधु न होने पर भी जटाधारी तापसी आदि का वेष बनाकर पुजाने वाले सब से नीच अधर्मी हैं। जीविका परक यहां ऊंच नीच का विचार दिखाया जानो।
अत्रिसमृतिः ॥ ६९
तस्यांजाताःसुतास्तेषां पितृपिण्डंनविद्यते ॥३८७॥
अष्टशल्यागतंनीरं पाणिनापिबतेद्विजः ।
सुरापानेनतत्तुल्यं तुल्यंगोमांसभक्षणम् ॥३८८॥
ऊर्ध्वजङ्घेषुविप्रेषु प्रक्षाल्यचरणद्वयम् ।
तावच्चाण्डालरूपेण यावद्गंगांनमज्जति ॥३८९॥
दीपशय्यासनच्छाया-कार्पासं दन्तधावनम् ।
अजारेणुस्पृशंचैव शक्रस्यापिश्श्रियंहरेत् ॥३९०॥
गृहाद्दशगुणं कूपं कूपाद्दशगुणं तटम् ।
तटाद्दशगुणं नद्यां गंगासंख्यानविद्यते ॥ ३९१ ॥
स्रवद्यद्ब्राह्मणंतोयं रहस्यं क्षत्रियंतथा ।
वापीकूपेषुवैश्यं स्या-च्छूद्रंभाण्डोदकंतथा ॥ ३९२ ॥
तीर्थस्नानंमहादानं यच्चान्यत्तिलतर्पणम् ।
होती और उस से पैदा हुए पुत्रों को श्राद्ध करने पिंड देने का अधिकार नहीं है ॥३८७॥ अष्टशल्या (पुर) के जल को जो द्विज हाथ से पीता है वह जल मदिरा के पीने और गोमांस भक्षण के समान दूषित है इस से पुर वा चर्स आदि नामका चाम के पात्र में जल नहीं पीना चाहिये ॥ ३८८ ॥ जो खड़े हुए ब्राह्मण के दोनों चरण धोते हैं वे तब तक चांडालरूप रहते हैं जब तक गंगा स्नान न कर लें इस से बैठा कर ब्राह्मण के पग धोना उचित है ॥ ३८९ ॥ दीपक शय्या और आसन इन तीनों की छाया (जो ऊपर पड़े)—कपास के वृक्ष की दतौन बकरे की धूल का स्पर्श ये तीनों इन्द्र की भी लक्ष्मी को हरते हैं अर्थात् दीपकादि की छायादि से मनुष्यों को बचना चाहिये ॥३९०॥ घरसे दश गुणा पुण्य कूपपर कूप से दश गुणा तट पर—तट से दश गुणा नदी में स्नान से होता है—और गंगास्नान के पुण्य की संख्या (गिनती) नहीं है ॥ ३९१ ॥ बहते हुये जल की ब्राह्मण संज्ञा है—एकान्त के जल की क्षत्री और बावली तथा कूप के जल की वैश्य संज्ञा है—भांड (बरतन) में धरे जल की शूद्र संज्ञा है ॥ ३९२ पिता के मरने के अनंतर एक वर्ष तक तीर्थ स्नान और
६८ भाषार्थसहिता ॥
अब्दमेकंनकुर्वीत महागुरुनिपातः ॥३९३॥
गंगागयात्वमावास्या वृद्धिश्राद्धेक्षयेऽहनि ।
मघाणिपडप्रदानंस्या-दन्यत्रपरिवर्जयेत् ॥ ३९४॥
घृतंवायदिवातैलं पयोवायदिवादधि ।
चत्वारोह्याज्यसंस्थाना हुतंनैवतुवर्जयेत् ॥ ३९५॥
श्रुत्वैतान्नृषयोधर्मान् भाषितानत्रिणास्वयम् ।
इदमूचुर्महात्मानं सर्वेतेधर्म्मनिष्ठिताः ॥ ३९६ ॥
यइदंधारयिष्यन्ति धर्मशास्त्रमतन्द्रिताः ।
इहलोकेयशःप्राप्य तेयास्यन्तित्रिविष्टपम् ॥ ३९७॥
विद्यार्थीलभतेविद्यां धनकामोधनानिच ।
आयुष्कामस्तथैवायुः श्रीकामोमहतीं श्रियम् ॥ ३९८ ॥
इति श्रीअत्रिमहर्षिनिर्मिता स्मृतिः समाप्ता ॥
महादान और तिलों से तर्पण न करे ॥ ३९३॥ गंगा-गया-अमावस-वृद्धि श्राद्ध (नांदी मुख) क्षयी श्राद्ध कनागत का और मघा नक्षत्र में पिण्डदान इन को तो पिता के मरण के अनंतर वर्ष के मध्य में भी करै और इन से अन्य कर्मों को त्याग दे ॥३९४ ॥ घी-तिलका तेल--दूध-दही-ये चारों घी के स्थानी हैं अर्थात् घी के अभाव में इन से ही होम करे होम का त्याग कदापि न करे ॥३९५॥अत्रि ऋषि ने स्वयं कहे इन धर्मों को सब ऋषि सुनकर धर्म में भली प्रकार स्थित हुये वे सब ऋषि, महात्मा अत्रि ऋषि के प्रति यह बोले कि ॥३९६॥ जो पुरुष आलस्य को त्याग कर इस धर्म शास्त्र को जानेगे वे इस लोक में यश को प्राप्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होंगे ॥ ३९७ ॥ इस शास्त्र के पढ़ने से विद्यार्थी विद्या को धनार्थी धन को--अवस्था की जिसे इच्छा हो वह अवस्था को, तथा लक्ष्मी की जिसे इच्छा हो वह लक्ष्मी को-प्राप्त होता है ॥ ३९८ ॥
इत्यत्रिमहर्षिस्मृतिभाषा समाप्ता ॥
श्रीगणेशायनमः
अथ विष्णुस्मृतिः
अर्थात् विष्णुप्रोक्तधर्मशास्त्रप्रारम्भः ॥
विष्णुमेकाग्रमासीनं श्रुतिस्मृतिविशारदम् ।
पप्रच्छुर्मुनयःसर्वे कलापग्रामवासिनः ॥१॥
कृतेयुगेह्यपक्षीणं लुप्तोधर्म्मस्सनातन्ः ।
तत्रवैशीर्यमाणेच धर्मानप्रतिमार्गितः ॥ २ ॥
त्रेतायुगेऽथसंप्राप्ते कर्तव्यञ्चास्यसंग्रहः ।
यथासंप्राप्यतेस्माभिस्तत्त्वन्नोवक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
वर्णाश्रमाणांयोधर्मो विशेषश्चैवयः कृतः ।
भेदन्तथैवचैषांयस्तन्नोब्रूहिद्विजोत्तम ॥ ४ ॥
ऋषीणांसमवेतानां त्वमेवपरमोमतः ।
भाषार्थः-श्रुति और स्मृतियों के जानने में चतुर एकाग्र बैठे हुए विष्णु नामक ऋषि से कलाप ग्राम के वासी सब मुनियों ने यह पूछा ॥१॥ कि कृतयुग बीतने पर सनातनधर्म लुप्त होगया और कृतयुग के बीतने पर किसी ने भी धर्म का शोधन नहीं किया ॥२॥ अब त्रेतायुग वर्त्तमान है इस में धर्म का संग्रह अवश्य करना चाहिये यह धर्म जिस रीतिसे हमको प्राप्त हो वह रीति आप हम से कहिये ॥३॥ वर्ण और आश्रमों का जो धर्म और इन धर्मों की विशेषता ऋषियों ने की है और परस्पर के धर्म का भेद—यह सब हे द्विजो' में श्रेष्ठ हम से कहो ॥ ४ ॥ यहां इकट्ठे हुए ऋषियों ने तुम ही श्रेष्ठ माने हो इससे हे सुव्रत संपूर्ण धर्म का वक्ता तुम से अन्य नहीं है ॥ ५ ॥
( १ ) ये विष्णु जो धर्मशास्त्र के वक्ता हैं साक्षात् भगवान् नहीं हैं किन्तु यद्यपि सब ऋषि विष्णु के ही नाम रूप भेद हैं तथापि अन्य ऋषियों के समान विष्णु नामक भी एक ऋषि थे जिन ने इस धर्मशास्त्र को वेद का गूढाशय लेकर संक्षेप से प्रकट किया है ऐसा अनुमान है ।
२ भाषार्थसहिता ॥
धर्मस्येहसमग्रस्य नान्येावक्तास्तिसुव्रत ॥ ५ ॥ श्रुत्वाधर्मं चरिष्यामो यथावत्परिभाषितम् । तस्माद्ब्रूहिद्विजश्रेष्ठ धर्मकामाह्यमेद्विजाः ॥६॥ इत्युक्तोमुनिभिस्तैस्तु विष्णुःप्रोवाचतांस्तदा । अनघाःश्रूयतांधर्मो वक्ष्यमाणोमयाक्रमात् ॥ ७ ॥ ब्राह्मण क्षत्रियोवैश्यः शूद्रश्चैवतथापरे । एतेषांधर्मसारंयद ब्रुवतस्तन्निबोधत ॥ ८ ॥ ऋतौऋतौतुसंयोगाद्ब्राह्मणोजायतेस्वयम् । तस्माद्ब्राह्मणसंस्कारं गर्भादौतुप्रयोजयेत् ॥ ९ ॥ सीमन्तोन्नयनंकर्म नस्त्रीसंस्कारइष्यते । गर्भस्यैवस्तुसंस्कारो गर्भगर्भेप्रयोजयेत् ॥ १० ॥
भा०:-धर्म को सुनकर आपके कहने के अनुसार आचरण करेंगे इससे हे द्विजों में उत्तम तुम धर्म का वर्णन करो और ये द्विज धर्म की अभिलाषा वाले हैं ॥६॥ इस प्रकार जब उन मुनियों ने कहा उस समय उन से विष्णु ऋषि बोले कि हे शुद्ध निष्पाप मुनियो ! जिस धर्म को हम क्रम से कहेंगे उस को तुम सुनो ॥७॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और किन्हीं के मत से (शूद्र) के लिये भी धर्म का सारांश हम कहेंगे उसे तुम लोग सुनो । अर्थात् किन्हीं ऋषि आचार्यों का मत है कि शूद्र के लिये कोई भी धर्मोपदेश नहीं है । अन्यों के मत से स्मार्त्त धर्म में शूद्र को अधिकार है ॥८॥ ऋतु (रजो दर्शन से १६ दिन के भीतर) में स्त्री और पुरुष के संयोग से आप ब्राह्मण पैदा होता है इस से ब्राह्मण का संस्कार गर्भ से लेकर करे ॥९॥ सीमन्त (अतभागा) कर्म स्त्री का संस्कार नहीं है किन्तु गर्भ का है इस से प्रतिगर्भ में सीमन्त करे ॥ १० ॥
(१०) गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन ये तीनों संस्कार किन्हीं ऋषियों के मत में गर्भवती स्त्री के होते हैं और मनुष्य की पैदाइश के खेत रूप स्त्री के शुद्ध होने से सन्तान भी शुद्ध होते हैं। इस कारण गर्भाधानादि तीनों संस्कार प्रथम गर्भ में एक ही बार करे प्रतिगर्भ में नहीं। परन्तु विष्णु ऋषि का मत है कि सीमन्त संस्कार गर्भिणी का नहीं किन्तु गर्भ का ही संस्कार है इस से प्रत्येक गर्भ में कर्त्तव्य है ।
षष्ठेमासिचसंप्राप्ते अन्नप्राशनमाचरेत् ।
विष्णुस्मृतिः ॥
जातकर्मतथाकुर्यात्-पुत्रेजातेयथोदितम् ।
बहिर्निष्क्रमणंचैव तस्यकुर्याच्छिशोःशुभम् ॥११॥
षष्ठेमासिचसंप्राप्ते अन्नप्राशनमाचरेत् ।
ततोऽब्देचेक्सम्प्राप्ते केशकर्मसमाचरेत् ॥१२॥
गर्भाष्टमेतथाकर्म ब्राह्मणस्योपनयनम् ।
द्विजत्वेत्वथसम्प्राप्ते सावित्र्यामधिकारभाक् ॥१३॥
गर्भादेकादशेशैके कुर्यात्क्षत्रियवैश्ययोः ।
कारयेद्द्विजकर्माणि ब्राह्मणेनयथाक्रमम् ॥१४॥
शूद्रश्चतुर्थोवर्णस्तु सर्वसंस्कारवर्जितः ।
उक्तस्तस्यानुसंस्कारो द्विजेष्वात्मनिवेदनम् ॥१५॥
योयस्यविहितोदण्डो मेखलाजिनधारणम् ।
सूत्रंवस्त्रंचगृह्णीया-द्ब्रह्मचर्येणयन्त्रितः ॥१६॥
ब्राह्मेमुहूर्तेउत्थाय चोपस्पृश्यपयस्तथा ।
भा०- पुत्र के पैदा होते ही शास्त्र के अनुसार जातकर्म करे और उस बालक का मंगल महिने बहिर्निष्क्रमण (घर से बाहर ले जाना) करे अर्थात् चौथे महिने में मन्त्रपूर्वक सूर्यनारायण का दर्शन करावे ॥११॥ जब छः महीने का बालक हो तब उस का अन्न प्राशन संस्कार करे और जब तीन वर्ष का हो तब केशकर्म (मुण्डन) करे ॥१२॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत करे क्योंकि द्विज होने पर ही गायत्री का अधिकारी होता है ॥१३॥ गर्भ से ग्यारवें वर्ष क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत ब्राह्मण से करवावे ॥१४॥ और चौथा जो शूद्र वर्ण है वह सब संस्कारों से हीन है उस का संस्कार यही कहा है कि उक्त तीनों वर्णों को अपने आत्मा को निवेदन (अधीन) कर दे ॥१५॥ ब्रह्मचर्य (यज्ञोपवीत के समय) में जिस वर्ण का जो २ दण्ड मेखला, मृगछाला-सूत्र-वस्त्र गृह्यसूत्रकारों ने कहा है उस २ को वह २ ब्राह्मणादि धारण करे ॥१६॥ ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान-करके तीन
४ | भाषार्थसहिता ॥
त्रिराचम्यततः प्राणां-स्तिष्ठेन्मौनीसमाहितः । १७॥
अब्दैवतैःपवित्रैस्तु कृत्वाऽऽत्मपरिमार्जनम् ।
सावित्रींचजपंस्तिष्ठे-दासूर्योदयनात्पुरा ॥१८॥
अग्निकार्यंततःकुर्यात्-प्रातरेवव्रतंचरेत् ।
गुरवेतुततःकुर्यात् पादयोरभिवादनम् ॥१९॥
समित्कुशांश्चोदकुम्भ- माहृत्यगुरवेव्रती ।
प्राञ्जलिःसम्यगासीन उपस्थाययतःसदा ॥२०॥
यंयंग्रन्थमधीयीत तस्यतस्यव्रतंचरेत् ।
सावित्र्युपक्रमात्सर्वं-मावेदग्रहगोत्तरम् ॥२१॥
द्विजातिषुचरेद्भैक्ष्यं भिक्षाकालसमागते ।
निवेद्यगुरवेऽश्नीयात्संमतोगुरुणाव्रती ॥ २२ ॥
सायंसन्ध्यामुपासीनो गायत्र्यष्टशतंजपेत् ।
द्विकालभोजनार्थंच तथैवपुनराहरेत् ॥ २३ ॥
आचमन तथा तीन बार प्राणायाम कर के सावधान होकर मौन होके खड़ा रहे ॥ १७ ॥ जल देवता (आपोहिष्ठा०) इत्यादि तथा पवित्र मन्त्रों से देह का मार्जन कर के सूर्योदय पर्यन्त खड़े होके गायत्री का जप करे ॥ १८ ॥ उस के बाद अग्निहोत्र करे और प्रातःकाल के समय ही व्रत (महानाम्न्यादि) करे तत्पश्चात् गुरु के पगों में अभिवादन करे ॥ १९ ॥ फिर वह शिष्य समिधा कुश-और जल का घट गुरु के लिये लाकर हाथ जोड़ और भले प्रकार सदा गुरु के समीप बैठ कर ॥ २० ॥ जिस २ ग्रन्थ को पढ़े उस २ का व्रत करे और गायत्री के उपदेश से लेकर सब वेद के पठन पर्यन्त ॥ २१ ॥ भिक्षा के समय ब्राह्मणादि तीनों द्विजों के घरों से भिक्षा मांगकर लावे उस भिक्षा को गुरु जी को निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर ब्रह्मचारी नियमबद्ध हुआ भोजन करे ॥ २२ ॥ सायंकाल की सन्ध्या में बैठा हुआ एक सौ आठबार गायत्री जपे और सायंकालको भोजन चाहे तो उसी प्रकार भिक्षा मांगलावे ॥२३॥
विष्णुस्मृतिः ॥
५
वेदस्वीकरणेहृष्टो गुर्वधीनो गुरुहिंतः ।
निष्ठांतञ्चैवयोगच्छेन्नैष्ठिकस्सउदाहृतः ॥ २४ ॥
अनेनविधिनासम्यक्कृत्वावेदमधीत्यच ।
गृहस्थधर्ममाकांक्षन्गुरुगेहादुपागतः ॥ २५ ॥
अनेनैवविधानेन कुर्याद्दारपरिग्रहम् ।
कुलेमहतिसंभूतां सवर्णांलक्षणांन्विताम् ॥ २६ ॥
परिणीयतुषण्मासान्वत्सरंवानसंविशेत् ।
औदुंबरायणोनाम ब्रह्मचारीगृहेगृहे ॥ २७ ॥
ऋतुकालेतुसंप्राप्ते पुत्रार्थीसंविशेत्तदा ।
जातेपुत्रेत्तथाकुर्यादग्न्याधेयंगृहेवसन् ॥ २८ ॥
पुत्रेजातेऽनृनौगच्छन्संप्रदुष्येत्सदागृही ।
चतुर्थेब्रह्मचारीचगृहेतिष्ठेन्नविस्मृतः ॥ २९ ॥
इति वैष्णवधर्मशास्त्र प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
भा०- जो ब्रह्मचारी वेद पढने में प्रमत्त, गुरु के आधीन तथा गुरु का हितकारी होकर मरण पर्यंत गुरु की सेवा में ही रहे उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं ॥ २४ ॥ इस विधि से ब्रह्मचर्य धर्म को कर और वेद को पढ़के गृहस्थ धर्म की इच्छा करता हुआ गुरु के घर से आया ॥२५॥ बड़े प्रतिष्ठित कुल में पैदा हुई शुभ चिह्नोंवाली अपने वर्ण की स्त्री के साथ शास्त्रोक्त विधिसे विवाह करे ॥२६॥ विवाह करके जो छःमहीने अथवा एक वर्ष पर्यंत स्त्री से संग नहीं करता ब्रह्मचारी रहता है घर में रहते हुए भी उस ब्रह्मचारी को औदुबरायण कहते हैं ॥ २७ ॥ जब स्त्री को रजोधर्शन हो तब पुत्र की इच्छा से स्त्री का संग करे पुत्र के होने पर घर में रहता हुआ ही विधि पूर्वक अग्नि स्थापन करे ॥ २८ ॥ पुत्र के होने पर ऋतुकाल के बिना स्त्री संग करने से गृहस्थी सदा दोषी होता है और चौथे पुत्र के होने पर गृहस्थी पुरुष ब्रह्मचारी रहता हुआ भी भूल कर घर में न ठहरे किन्तु वन में जाकर तपकरे॥२९॥
इति विष्णुस्मृतौ प्रथमोऽध्यायः ॥
६ | भाषार्थसहिता ॥
अतःपरं प्रवक्ष्यामि गृहीणांधर्ममुत्तमम् ।
प्राजापत्यपदस्थानं सम्यक्कृत्यान्निबोधत ॥ ३० ॥
सर्वःकल्ये समुत्थाय कृतशौचः समाहितः ।
स्नात्वासंध्यामुपासीत सर्वकालमतन्द्रितः ॥ ३१ ॥
अज्ञानाद्यदिवामोहाद्रात्रौयद्दुरितंकृतम् ।
प्रातःस्नानेनतत्सर्वं शोधयन्तिद्विजोत्तमाः ॥ ३२ ॥
प्रविश्याथाग्निहोत्रंतु हुत्वाग्निंविधिवत्ततः ।
शुचौदेशे समासीनः स्वाध्यायं शक्तितोऽभ्यसेत् ॥३३॥
स्वाध्यायान्ते समुत्थाय स्नानंकृत्वातुमंत्रवित् ।
देवानृषीन्पितॄंश्चापि तर्पयेत्तिलवारिणा ॥ ३४ ॥
मध्यान्हे त्वथसंप्राप्ते शिष्टंभुञ्जीतवाग्यतः ।
भुक्तोपविशे विश्रान्तो ब्रह्मकिंचिद्विचारयेत् ॥३५॥
इतिहासैर्नयुंजीत त्रिकालसमयंगृही ।
भा०-इस से आगे गृहस्थियों के उत्तम धर्म को कहते हैं ब्रह्मलोक प्राप्ति फलके दाता उस कर्म को भली प्रकार सुनिये ॥३०॥ सब ब्राह्मणादि द्विज गृहस्थ प्रभात समय उठ सावधानी से शौचादि करके सदैव आलस को छोड़ कर स्नान करके संध्योपासन करें॥३१॥ अज्ञान से वा मोह से रात्रि में जो पाप किया हो उस सब को नित्य प्रातःकाल के स्नान से ब्राह्मण लोग दूर कर देते हैं ॥३२॥ फिर अग्निशाला में जाकर कल्प सूत्रोक्त विधान से अग्निहोत्र करके शुद्ध स्थान में बैठा हुआ शक्ति के अनुसार वेद का पाठ करे ॥ ३३॥ वेद पाठ के अंत में उठकर मन्त्र विधि जानने वाला द्विज फिर मन्त्र पूर्वक स्नान करके तिल और जल से देवता, ऋषि, और पितर, इनका तर्पण करे ॥ ३४ ॥ फिर मध्यान्ह काल आने पर शिष्ट ( पंच महायज्ञों से बचे हुए ) अन्न को मौन होकर भोजन विधिकरके भोग लगावे । भोजन के पीछे बैठ, और कुछ विश्राम करके कुछ वेद का विचार करे ॥ ३५ ॥ गृहस्थ पुरुष दिन के तृतीय भाग में इतिहास
विष्णुस्मृतिः ॥ ९
काले चतुर्थे संप्राप्ते गृहे वा यदि वा बहिः ॥ ३६ ॥
आसीनः पश्चिमां सन्ध्यां गायत्रीं शक्तितो जपेत् ।
हुत्वा चाथाग्निहोत्रं तु कृत्वा चाग्निपरिक्रियाम् ॥ ३७॥
बलिं च विधिवद्धुत्वा भुञ्जीत विधिपूर्वकम् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ अतिथित्वत्राव्रजेद्यदि ॥ ३८॥
तृणभूवारिवाग्भिस्तु पूजयंत्तद्यथाविधि ।
कथाभिः प्रीतिमाहृत्य विद्यादीन्विचारयेत् ॥ ३९॥
संनिवेश्याथ विप्रं तु संविशेत्तदनुज्ञया ।
यदि योगी तु संप्राप्तो भिक्षार्थी समुपस्थितः ॥ ४० ॥
योगिनं पूजयेन्नित्य--मन्यथा किल्विषी भवेत् ।
पुरे वा यदि वा ग्रामे योगी सन्निहितो भवेत् ॥ ४१ ॥
पूज्या नित्यं भवन्त्येव सर्वे चैत्रनिवासिनः ।
(महा भारत आदि) का भी कुछ पाठ वा विचार करे और सायंकाल होने पर घर में वा बाहर ॥ ३६ ॥ पश्चिम दिशा के सम्मुख बैठा हुआ सन्ध्योपा-सन करे और यथाशक्ति गायत्री का जप करे फिर सायंकाल का अग्निहोत्र अग्नि की सेवा ॥ ३७॥ और गृह्योक्त विधि से केवल बलि कर्म नामक भूतयज्ञ करके विधि पूर्वक भोजन करे । अर्थात् रात में देवयज्ञ रूप होम का निषेध है । जो दिन में वा रात्रि में कोई अभ्यागत आजाय तो ॥ ३८ ॥ तृण (आ-सन) भूमि बैठने का जगह, जल, और आदर सूचक वाणी से उस का सत्कार करे जाने आने की कथा (बड़ी कृपा की कि आप आये इत्यादि) से उस को संतुष्ट करके विद्या आदि का विचार करे ॥ ३९ ॥ अतिथि को प्रथम निद्रा करा उसकी आज्ञा लेकर आप सोवे । यदि भिक्षा के लिये योगी आजावे तो उस के समीप जाकर ॥ ४० ॥ योगी का विशेष पूजन करे अन्यथा पाप लगता है । नगर में वा ग्राम में यदि योगी प्राप्त हो ॥ ४१ ॥ तो उस योगी के आने से-वहा के निवासी सब पूजने योग्य होते हैं क्यों कि स्थान और वहां के
८ भाषार्थसहिता ॥
तस्मात्पूजयेन्नित्यं योगिनंगृहमागतम् ॥ ४२ ॥
तस्मिन्प्रयुक्तायापूजा साक्षयायोपकल्पते ।
गृहमेधिनांयत्प्रोक्तं स्वर्गसाधनमुत्तमम् ॥४३॥
ब्राह्मेमुहूर्तउत्थाय तत्सर्वं सम्यगाचरेत् ।
चतुःप्रकारंभिद्यन्ते गृहिणोधर्मसाधकाः ॥४४॥
वृत्तिभेदेनसततं ज्यायांस्तेषांपरःपरः ।
कुसूलधान्यकोवास्यात्कुंभीधान्यकएववा ॥ ४५ ॥
त्र्यहैहिकोवापिभवे-त्सद्यःप्रक्षालकोपिवा ।
श्रौतंस्मार्तचयत्किंचिद्विधानंधर्मसाधनम् ॥४६॥
गृहेतद्वसताकार्य-मन्यथादोषभाग्भवेत् ।
एवंविप्रोगृहस्थस्तु शान्तःशुक्लांबरःशुचिः ॥ ४७ ॥
मनुष्य पवित्र होजाते हैं तिस से घर में आये योगी का नित्य पूजन करे ॥४२॥ उस योगी अभ्यागत की जो पूजा की जाती है वह अविनाशी सुख देने वाली होती है । गृहस्थियों के लिये स्वर्ग का साधन जो उत्तम कर्म है वह यही है कि ॥४३ ॥ ब्राह्म मुहूर्त ( ३ अथवा ४ घड़ी रात रहे पर) में उठ कर उस (पू-र्वोक्त ) कर्म का भली प्रकार सेवन करै-धर्म के सिद्ध करने वाले गृहस्थी अ-पनी जीविका के भेद से चार प्रकार से भिन्न २ होते हैं ॥४४॥ उन में अगले-२ श्रेष्ठ हैं १ कुसूलधान्यक ( कोठे में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से ३ वर्ष नि-र्वाह हो ) २ कुंभी धान्यक ( कुंडी में इतने अन्न को जो रक्खे जिस से १ वर्ष निर्वाह हो ) ॥ ४५ ॥ ३ त्र्यहैहिक (तीन दिनका जो अन्न रक्खै ) महा प्रक्षा-लक ( प्रति दिन खाने को लाने वाला ) श्रुति वा स्मृतियों में कहा जो धर्म का साधन कर्म है ॥ ४६ ॥ घर में बसते हुये मनुष्य को यह सब करना चाहिये क्योंकि न करने से दोष का भागी होता है इस प्रकार शांत स्वभाव-शुक्ल व-स्त्रों वाला-शुद्ध-गृहस्थी ब्राह्मण ॥ ४७ ॥
विष्णुस्मृतिः ॥
प्रजापतेः परं स्थानं सम्प्राप्नोति न संशयः ।
इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वनवासं यदाचरेत् ॥ ४८ ॥
चीरवल्कलधारी स्यादाकृष्टान्नशनो मुनिः ।
गत्वा च विजनं स्थानं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ॥४९॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादन्नैर्नीवारकादिभिः ।
श्रावणेनाग्निमादाय ब्रह्मचारी वने स्थितः ॥५०॥
पञ्चयज्ञविधानेन यज्ञं कुर्यादतन्द्रितः ।
संचितं तु यदारण्यं भक्तार्थं विधिवद्वने ॥ ५१ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि वन्यमन्यत्समाहरेत् ।
आकाशशायी वर्षासु हेमन्ते च जलाशयः ॥ ५२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो भवेन्नित्यं वने वसन् ।
अच्छा उत्तम स्थान को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥
इति विष्णुस्मृतौ द्वितीयोऽध्यायः ॥
गृहस्थी वा ब्रह्मचारी जब वन में निवास करना चाहे ॥ ४८ ॥ तब चीर (चीथड़े) वा वृक्षों के वक्कल को वस्त्रों की जगह धारण करे और अकृष्टान्न (जो बिना जोते बोए पैदा हो) वन के मुन्यन्न को भक्षण करे और मौन रहे और निर्जन स्थान में जाकर भी पञ्चयज्ञों का परित्याग न करे ॥ ४९ ॥ नीवार आदि अन्न से अग्निहोत्र भी करे और श्रावण मास में अग्नि को लेकर वन में जावे और ब्रह्मचर्य धारण कर वहां रहे ॥ ५० ॥ निरालस होकर पञ्चयज्ञके विधान से यज्ञ करे। जो भोजन के लिये वनका अन्न इकट्ठा किया हो ॥५१॥ उस को आश्विन के मास में त्याग दे और वन में पैदा हुए नये अन्न को संग्रह करे और वर्षा काल में आकाश (खुले ऊंचे स्थान) में जाड़ों में जल में ॥ ५२ ॥ तथा ग्रीष्म ऋतु (गरमी) में पंचाग्नि [चारों दिशामें अग्नि जलता ता हो उसके बीच में बैठे ऊपर से सूर्य्य तपते हों इसको पञ्चाग्नि तप कहते हैं]
३
१० भाषार्थसहिता ॥
कृच्छ्रं चान्द्रायणंचैव तुलापुरुषमेवच ॥ ५३ ॥ अतिकृच्छ्रं प्रकुर्वीत त्यक्त्वाकामान्शुचिस्ततः । त्रिसन्ध्यंस्नानमातिष्ठेत्सहिष्णुर्भूतजान्गुणान् ॥ ५४ ॥ पूजयेदतिथींश्चैव ब्रह्मचारीवनंगतः । प्रतिग्रहनगृहणीया-त्परेषांकिंचिदात्मवान् ॥ ५५ ॥ दाताचैवभवेन्नित्यं श्रद्दधानःप्रियंवदः । रात्रौस्थण्डिलशायीस्या-त्प्रपदैस्तुदिनंक्षिपेत् ॥ ५६ ॥ वीरासनेनतिष्ठेद्वा क्लेशमात्मन्यचिंतयन् । केशरोमनखश्मश्रु नच्छिन्द्यान्नापिकर्त्तयेत् ॥ ५७॥ त्यजन्शरीरसौहार्दं वनवासरतःशुचिः । चतुःप्रकारंभिद्यन्ते मुनयःशंसितव्रताः ॥ ५८ ॥ अनुष्ठानविशेषेण श्रेयांस्तेषांपरःपरः ।
के मध्य में वन में बसता हुआ मनुष्य नित्य रहे और तिसके अनन्तर कृच्छ्र , चांद्रायण-तुला पुरुष॥५३॥ अतिकृच्छ्र इन व्रतों को निष्काम होकर शुद्धता से करे और पांचो भूतों के गुणों ( शब्द, स्पर्श, रूप-रस-गन्ध-) को सहता हुआ त्रिकाल स्नान करे ॥ ५४ ॥ वन में प्राप्त हुआ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ अतिथियों का पूजन करै और अपने आपमें नियम बद्ध रहता हुआ किसी से प्रतिग्रह (दान) न ले ॥ ५५ ॥ प्रियभाषी और श्रद्धावान् होकर जो अपने पास फल मूलादि हों उनका प्रतिदिन दान दिया करे स्वयं बनाये मंच ( चबूतरे ) पर रातमें सोवे और पैरों की अंगुलियोंसे खड़ा जप करता हुआ दिनकोविता दे ॥५६॥ अथवा अपने मनमें क्लेश मानता हुआ वीरासन से दिन में बैठा रहै और शिरके केश-रोम-नख-दाढ़ी-इनको न कैंची से कतरावे और न खुरे से कटावे ॥ ५७॥ वन वास में तत्पर शुद्ध अपने शरीर की प्रीति को छोड़ता हुआ अपने पूर्वोक्त कर्म को करे इस उत्तम प्रशस्त व्रतवाले मुनि अनुष्ठान के भेद से चारप्रकार के होते हैं॥५८॥ उनमें अगला श्रेष्ठ है-१ वर्ष भरके लिये विधि पूर्वक
विष्णुस्मृतिः ॥ ११
वार्षिकं वन्यमाहार-माहृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ५९ ॥
वनस्थधर्ममातिष्ठन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः ।
भूरिसंवार्षिकश्चायं वनस्थः सर्वकर्मकृत् ॥ ६० ॥
आदेहपतनात्तिष्ठेन्मृत्युं चैवानकांक्षति ।
षण्मासांस्तुततश्चान्यः पञ्चयज्ञक्रियापरः ॥ ६१ ॥
कालेचतुर्थभुञ्जानो देहंत्यजतिधर्मतः ।
त्रिंशद्दिनार्थमाहृत्य वन्यान्नानिशुचिव्रतः ॥६२॥
निर्वर्त्यसर्वकार्याणि स्याच्चषष्ठान्नभोजनः ।
दिनार्थमन्नमादाय पञ्चयज्ञक्रियारतः ॥६३॥
सद्यःप्रक्षालकोनाम चतुर्थःपरिकीर्तितः ।
एवमेतेहि वैमान्या मुनयःशंसितव्रताः ॥६४॥
इति० वैष्ण० धर्म० तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
वन के आहार (नीवारादि) को संचय करके वानप्रस्थों के धर्म में ठहरा हुआ इन्द्रियोंको जीत और आलस्य को छोड़कर ॥ ५९ ॥ काल को जो व्यतीत करे इन सब कर्मों के कर्त्ता वानप्रस्थ को भूरिसंवाषिक कहते हैं ॥ ६० ॥ २ दूसरा-मरण तक वन में रहै और मृत्यु की भी इच्छा न करे पंचमहायज्ञ करने में तत्पर हुआ छः महीने तक के अन्नका संचय करके ॥ ६१ ॥ चौथे काल (सन्ध्या) में भोजन करता हुआ धर्म से देह को त्यागता है । ३ तीसरा तीस दिन के लिये वन के अन्न का संचय करके और शुद्ध व्रत होकर ॥ ६२ ॥ सब कर्मों को करके छठे प्रहर में रात को दश बजे भोजन करे । ४ चौथा एक दिन के लिये अन्न का संग्रह करके पञ्चमहायज्ञ कर्म में तत्पर रहै ॥६३॥ यह सद्यः प्रक्षालक नाम चौथा कहा है इस प्रकार ये चारों प्रशस्त व्रतवाले मुनि पूजनीय होते हैं ॥६४॥
इति विष्णुस्मृतौ ३ अध्यायः ।
१२ भाषार्थसहिता ॥
यथोत्तमानि स्थानानि प्राप्नुवन्तिदृढव्रताः । ब्रह्मचारी गृहस्थोवा वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६५॥ विरक्तःसर्वकामेषु पारिव्राज्यंसमाश्रयेत् । आत्मन्यग्नीन्समारोप्यदत्वाचाभयदक्षिणाम् ॥६६॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छेद्व्राह्मणःप्रव्रजन्गृहात् ॥ आचार्येणसमादिष्टं लिङ्गंयत्नात्समाश्रयेत् ॥६७॥ शौचमाश्रमसम्वद्धं यतिधर्मांश्चशिक्षयेत् । अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमफल्गुता ॥६८॥ दयांचसर्वभूतेषु नित्यमेतद्यतिश्चरेन् । ग्रामान्तेवृक्षमूलेच नित्यकालनिकेतनः । ६९॥ पर्यटेत्कीटवद्भूमिं वर्षास्वेकत्रसंविशेत् । वृद्धानामातुराणांच भीरुणांसंगवर्जितः ॥७०॥
भा०जिस प्रकार ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और यतिये चारों दृढ़ व्रत हुए उत्तम स्थान (ब्रह्म लोक) को प्राप्त होते हैं वह यह है कि ॥६५॥ सब कामनाओं से विरक्त हो संन्यास का सम्यक् आश्रय लेवे कि यही सब इष्ट का साधक है अपने शरीर ही में अग्नियों का समारोप मन्त्रपूर्वक करके और स्त्री आदिकों को अभय दक्षिणा दे (ठीक २ समझा कर) ॥ ६६ ॥
घर से चलकर ब्राह्मण चौथे आश्रम में पग धरे आचार्य के कहे हुए चिह्न (दंड आदि) को यत्न से धारण करे ॥ ६७ ॥ संन्यास के (यतीनांतुचतुर्णाश्म्) शौच और संन्यासियों के धर्मों को सीखे अहिंसा-सत्य-चोरी का त्याग-ब्रह्मचर्य-अफल्गुता (निरर्थक बोलने आदि का त्याग) ॥६८॥ सब प्राणियों पर दया इतने कर्म नित्य नियम से करे-ग्राम के समीप किसी वृक्ष के नीचे सदैव स्थान रक्खे ॥ ६९ ॥ कीड़े के समान पृथ्वी पर विचरे । वर्षा काल में एक जगह बैठे विचरे नहीं और वृद्ध-रोगी-डरपोक इन का संग न करे ॥ ७० ॥
पादुकेचापिगृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्यसंग्रहम् ।
विष्णुस्मृतिः ॥ १३
ग्रामेवापिपुरेवापि वासेनेकत्रदुष्यति । कौपीनाच्छादनंवासः कन्थांशीतापहारिणीम् ॥७१॥ पादुकेचापिगृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्यसंग्रहम् । संभाषणंसहस्त्रीभि–रालम्भप्रेक्षणेतथा ॥ ७२॥ नृत्यंगानंसभांसेवां परिवादांश्चवर्जयेत् । वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां प्रीतियत्नेनवर्जयेत् ॥ ७३ ॥ एकाकीविचरेन्नित्यं त्यक्त्वासर्वपरिग्रहम् । याचितायाचिताभ्यांतु भिक्षयाकल्पयेत्स्थितिम् ॥७४॥ साधुकारंयाचितंस्यात्प्राक्प्रणीतमयाचितम् । चतुर्विधाभिक्षुकाःस्यु कुटीचकवहूदकौ ॥ ७५ ॥ हंसःपरमहंसश्च पश्चाद्योयःसउत्तमः । एकदण्डीभवेद्वापि त्रिदण्डीवापिवाभवेत् ॥ ७६ ॥ त्यक्त्वासर्वसुखास्वादं पुत्रैश्वर्यसुखंत्यजेत् ।
ग्राम वा नगर में एक स्थान में बसने से संन्यासी को दोष लगता है । कौपीन (लंगोटी) ओढ़ने का वस्त्र, जिस में शीत न लगे ऐसी कन्था (गुदड़ी) ॥७१॥ और खडाऊ इन को ग्रहण करे । इन से भिन्न वस्तुओं का संग्रह न करै । स्त्रियों के संग बोलना–स्पर्श–देखना ॥ ७२ ॥ नाचना, गाना, सभा करना सेवा ( नौकरी ) निन्दा–इन को त्याग दे वानप्रस्थ और गृहस्थ के संग यत्न से प्रीति को त्याग दे ॥ ७३ ॥ सब प्रकार के परिग्रह ( अर्जनरक्षणावा–योगक्षेमों ) को त्यागकर अकेला विचरै–मांगने और बिना मांगने से जो भोजन मिले उस से अपना निर्वाह करै ॥ ७४ ॥ अच्छा कह कर लेने को याचित बिना मांगे जो मिले उसे अयाचित कहते हैं ये संन्यासी चार प्रकार के होते हैं–१ कुटीचक–२बहूदक ॥ ७५ ॥ ३ हंस–४ परमहंस–इन में जो २ पिछला २ है वह २ उत्तम है एक दंड को धारण करै वा तीन दंड को ॥ ७६ ॥ सब सुखों के स्वाद को त्याग पुत्र के ऐश्वर्य ( प्रताप ) के सुख को त्यागे अथवा.
१४ भाषार्थसहिता ॥
अपत्येषुवसेन्नित्यं ममत्वंयत्नतस्त्यजेत् ॥ ७७ ॥ नान्यस्यगेहेभुञ्जीत भुञ्जानोदोषभाग्भवेत् । कामंक्रोधंचलोभंच तथेर्ष्या'सत्यमेवच ॥ ७८ ॥ कुटीचकस्त्यजेत्सर्वं पुत्रार्थंचैवसर्वतः । भिक्षाटनादिकेऽशक्तो यतिःपुत्रेषुसंन्यसेत् ॥ ७९ ॥ कुटीचकइतिज्ञेयः परित्राट्त्यक्तबान्धवः। त्रिदण्डंकुण्डिकांचैव भिक्षाधारंतथैवच ॥ ८० ॥ सूत्रंतथैवगृह्णीयान्नित्यमेवबहूदकः । प्राणायामेप्यभिरतो गायत्रींसततंजपेत् ॥ ८१ ॥ विश्वरूपंहृदिध्यायन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः । ईषत्कृतकषायस्य लिंगमाश्रित्यतिष्ठतः ॥ ८२ ॥ अन्नार्थंलिङ्गमुद्दिष्टं नमोक्षार्थमितिस्थितिः ।
अपने लड़कों ही में निश्चय बसे और यत्न से ममता को त्याग दे ॥ ७७ ॥ अन्य के घर में भोजन न करै क्योंकि दोष का भागी होता है और कामक्रोध लोभ ईर्ष्या, झूठ इन को छोड़ देवे ॥ ७८ ॥ पुत्र के लिये १ कुटीचक सब प्रकार से सब अन्नधनादि त्याग दे-भिक्षा मांगने आदि में असमर्थ हो तो संन्यासी अपने पुत्रों को ही अपना देह सौंपदे ॥ ७९ ॥ इस को कुटीचक कहते हैं-२ दूसरा त्याग दिये हैं बंधु जिसने ऐसा संन्यासी त्रिदंड-कुंडी और भिक्षा का पात्र ॥८० ॥ यज्ञोपवीत इन को बहूदक नित्य ग्रहण करै । प्राणायाम में तत्पर हुआ निरंतर गायत्री को जपे ॥ ८१ ॥ विश्व रूप भगवान् का हृदय में ध्यान करता हुआ इन्द्रियों को जीतकर काल को व्यतीत करै-कुछेक गेरुवा वस्त्रों को करके एक चिह्न (संन्यासकी पहचान) बनाकर अपने आश्रम में ठहरते हुए संन्यासी के ५२ ८२ ॥ चिन्ह अन्न भिक्षा मिलने के लिये नियत किये हैं मोक्ष के लिये कोई चिन्ह नहीं है ।