भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१० भाषार्थसहिता ॥

कृच्छ्रं चान्द्रायणंचैव तुलापुरुषमेवच ॥ ५३ ॥ अतिकृच्छ्रं प्रकुर्वीत त्यक्त्वाकामान्शुचिस्ततः । त्रिसन्ध्यंस्नानमातिष्ठेत्सहिष्णुर्भूतजान्गुणान् ॥ ५४ ॥ पूजयेदतिथींश्चैव ब्रह्मचारीवनंगतः । प्रतिग्रहनगृहणीया-त्परेषांकिंचिदात्मवान् ॥ ५५ ॥ दाताचैवभवेन्नित्यं श्रद्दधानःप्रियंवदः । रात्रौस्थण्डिलशायीस्या-त्प्रपदैस्तुदिनंक्षिपेत् ॥ ५६ ॥ वीरासनेनतिष्ठेद्वा क्लेशमात्मन्यचिंतयन् । केशरोमनखश्मश्रु नच्छिन्द्यान्नापिकर्त्तयेत् ॥ ५७॥ त्यजन्शरीरसौहार्दं वनवासरतःशुचिः । चतुःप्रकारंभिद्यन्ते मुनयःशंसितव्रताः ॥ ५८ ॥ अनुष्ठानविशेषेण श्रेयांस्तेषांपरःपरः ।


के मध्य में वन में बसता हुआ मनुष्य नित्य रहे और तिसके अनन्तर कृच्छ्र , चांद्रायण-तुला पुरुष॥५३॥ अतिकृच्छ्र इन व्रतों को निष्काम होकर शुद्धता से करे और पांचो भूतों के गुणों ( शब्द, स्पर्श, रूप-रस-गन्ध-) को सहता हुआ त्रिकाल स्नान करे ॥ ५४ ॥ वन में प्राप्त हुआ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ अतिथियों का पूजन करै और अपने आपमें नियम बद्ध रहता हुआ किसी से प्रतिग्रह (दान) न ले ॥ ५५ ॥ प्रियभाषी और श्रद्धावान् होकर जो अपने पास फल मूलादि हों उनका प्रतिदिन दान दिया करे स्वयं बनाये मंच ( चबूतरे ) पर रातमें सोवे और पैरों की अंगुलियोंसे खड़ा जप करता हुआ दिनकोविता दे ॥५६॥ अथवा अपने मनमें क्लेश मानता हुआ वीरासन से दिन में बैठा रहै और शिरके केश-रोम-नख-दाढ़ी-इनको न कैंची से कतरावे और न खुरे से कटावे ॥ ५७॥ वन वास में तत्पर शुद्ध अपने शरीर की प्रीति को छोड़ता हुआ अपने पूर्वोक्त कर्म को करे इस उत्तम प्रशस्त व्रतवाले मुनि अनुष्ठान के भेद से चारप्रकार के होते हैं॥५८॥ उनमें अगला श्रेष्ठ है-१ वर्ष भरके लिये विधि पूर्वक