भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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विष्णुस्मृतिः ॥

प्रजापतेः परं स्थानं सम्प्राप्नोति न संशयः ।
इति वैष्णवे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वनवासं यदाचरेत् ॥ ४८ ॥
चीरवल्कलधारी स्यादाकृष्टान्नशनो मुनिः ।
गत्वा च विजनं स्थानं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ॥४९॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादन्नैर्नीवारकादिभिः ।
श्रावणेनाग्निमादाय ब्रह्मचारी वने स्थितः ॥५०॥
पञ्चयज्ञविधानेन यज्ञं कुर्यादतन्द्रितः ।
संचितं तु यदारण्यं भक्तार्थं विधिवद्वने ॥ ५१ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि वन्यमन्यत्समाहरेत् ।
आकाशशायी वर्षासु हेमन्ते च जलाशयः ॥ ५२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो भवेन्नित्यं वने वसन् ।


अच्छा उत्तम स्थान को प्राप्त होता है इस में सन्देह नहीं है ॥
इति विष्णुस्मृतौ द्वितीयोऽध्यायः ॥

गृहस्थी वा ब्रह्मचारी जब वन में निवास करना चाहे ॥ ४८ ॥ तब चीर (चीथड़े) वा वृक्षों के वक्कल को वस्त्रों की जगह धारण करे और अकृष्टान्न (जो बिना जोते बोए पैदा हो) वन के मुन्यन्न को भक्षण करे और मौन रहे और निर्जन स्थान में जाकर भी पञ्चयज्ञों का परित्याग न करे ॥ ४९ ॥ नीवार आदि अन्न से अग्निहोत्र भी करे और श्रावण मास में अग्नि को लेकर वन में जावे और ब्रह्मचर्य धारण कर वहां रहे ॥ ५० ॥ निरालस होकर पञ्चयज्ञके विधान से यज्ञ करे। जो भोजन के लिये वनका अन्न इकट्ठा किया हो ॥५१॥ उस को आश्विन के मास में त्याग दे और वन में पैदा हुए नये अन्न को संग्रह करे और वर्षा काल में आकाश (खुले ऊंचे स्थान) में जाड़ों में जल में ॥ ५२ ॥ तथा ग्रीष्म ऋतु (गरमी) में पंचाग्नि [चारों दिशामें अग्नि जलता ता हो उसके बीच में बैठे ऊपर से सूर्य्य तपते हों इसको पञ्चाग्नि तप कहते हैं]