भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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विष्णुस्मृतिः ॥ ११

वार्षिकं वन्यमाहार-माहृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ५९ ॥
वनस्थधर्ममातिष्ठन्नयेत्कालं जितेन्द्रियः ।
भूरिसंवार्षिकश्चायं वनस्थः सर्वकर्मकृत् ॥ ६० ॥
आदेहपतनात्तिष्ठेन्मृत्युं चैवानकांक्षति ।
षण्मासांस्तुततश्चान्यः पञ्चयज्ञक्रियापरः ॥ ६१ ॥
कालेचतुर्थभुञ्जानो देहंत्यजतिधर्मतः ।
त्रिंशद्दिनार्थमाहृत्य वन्यान्नानिशुचिव्रतः ॥६२॥
निर्वर्त्यसर्वकार्याणि स्याच्चषष्ठान्नभोजनः ।
दिनार्थमन्नमादाय पञ्चयज्ञक्रियारतः ॥६३॥
सद्यःप्रक्षालकोनाम चतुर्थःपरिकीर्तितः ।
एवमेतेहि वैमान्या मुनयःशंसितव्रताः ॥६४॥
इति० वैष्ण० धर्म० तृतीयोऽध्यायः ॥३॥


वन के आहार (नीवारादि) को संचय करके वानप्रस्थों के धर्म में ठहरा हुआ इन्द्रियोंको जीत और आलस्य को छोड़कर ॥ ५९ ॥ काल को जो व्यतीत करे इन सब कर्मों के कर्त्ता वानप्रस्थ को भूरिसंवाषिक कहते हैं ॥ ६० ॥ २ दूसरा-मरण तक वन में रहै और मृत्यु की भी इच्छा न करे पंचमहायज्ञ करने में तत्पर हुआ छः महीने तक के अन्नका संचय करके ॥ ६१ ॥ चौथे काल (सन्ध्या) में भोजन करता हुआ धर्म से देह को त्यागता है । ३ तीसरा तीस दिन के लिये वन के अन्न का संचय करके और शुद्ध व्रत होकर ॥ ६२ ॥ सब कर्मों को करके छठे प्रहर में रात को दश बजे भोजन करे । ४ चौथा एक दिन के लिये अन्न का संग्रह करके पञ्चमहायज्ञ कर्म में तत्पर रहै ॥६३॥ यह सद्यः प्रक्षालक नाम चौथा कहा है इस प्रकार ये चारों प्रशस्त व्रतवाले मुनि पूजनीय होते हैं ॥६४॥

इति विष्णुस्मृतौ ३ अध्यायः ।