भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

१२ भाषार्थसहिता ॥

यथोत्तमानि स्थानानि प्राप्नुवन्तिदृढव्रताः । ब्रह्मचारी गृहस्थोवा वानप्रस्थोयतिस्तथा ॥६५॥ विरक्तःसर्वकामेषु पारिव्राज्यंसमाश्रयेत् । आत्मन्यग्नीन्समारोप्यदत्वाचाभयदक्षिणाम् ॥६६॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छेद्व्राह्मणःप्रव्रजन्गृहात् ॥ आचार्येणसमादिष्टं लिङ्गंयत्नात्समाश्रयेत् ॥६७॥ शौचमाश्रमसम्वद्धं यतिधर्मांश्चशिक्षयेत् । अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमफल्गुता ॥६८॥ दयांचसर्वभूतेषु नित्यमेतद्यतिश्चरेन् । ग्रामान्तेवृक्षमूलेच नित्यकालनिकेतनः । ६९॥ पर्यटेत्कीटवद्भूमिं वर्षास्वेकत्रसंविशेत् । वृद्धानामातुराणांच भीरुणांसंगवर्जितः ॥७०॥


भा०जिस प्रकार ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और यतिये चारों दृढ़ व्रत हुए उत्तम स्थान (ब्रह्म लोक) को प्राप्त होते हैं वह यह है कि ॥६५॥ सब कामनाओं से विरक्त हो संन्यास का सम्यक् आश्रय लेवे कि यही सब इष्ट का साधक है अपने शरीर ही में अग्नियों का समारोप मन्त्रपूर्वक करके और स्त्री आदिकों को अभय दक्षिणा दे (ठीक २ समझा कर) ॥ ६६ ॥

घर से चलकर ब्राह्मण चौथे आश्रम में पग धरे आचार्य के कहे हुए चिह्न (दंड आदि) को यत्न से धारण करे ॥ ६७ ॥ संन्यास के (यतीनांतुचतुर्णाश्म्) शौच और संन्यासियों के धर्मों को सीखे अहिंसा-सत्य-चोरी का त्याग-ब्रह्मचर्य-अफल्गुता (निरर्थक बोलने आदि का त्याग) ॥६८॥ सब प्राणियों पर दया इतने कर्म नित्य नियम से करे-ग्राम के समीप किसी वृक्ष के नीचे सदैव स्थान रक्खे ॥ ६९ ॥ कीड़े के समान पृथ्वी पर विचरे । वर्षा काल में एक जगह बैठे विचरे नहीं और वृद्ध-रोगी-डरपोक इन का संग न करे ॥ ७० ॥