अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविष्णुस्मृतिः ॥ १३
ग्रामेवापिपुरेवापि वासेनेकत्रदुष्यति । कौपीनाच्छादनंवासः कन्थांशीतापहारिणीम् ॥७१॥ पादुकेचापिगृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्यसंग्रहम् । संभाषणंसहस्त्रीभि–रालम्भप्रेक्षणेतथा ॥ ७२॥ नृत्यंगानंसभांसेवां परिवादांश्चवर्जयेत् । वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां प्रीतियत्नेनवर्जयेत् ॥ ७३ ॥ एकाकीविचरेन्नित्यं त्यक्त्वासर्वपरिग्रहम् । याचितायाचिताभ्यांतु भिक्षयाकल्पयेत्स्थितिम् ॥७४॥ साधुकारंयाचितंस्यात्प्राक्प्रणीतमयाचितम् । चतुर्विधाभिक्षुकाःस्यु कुटीचकवहूदकौ ॥ ७५ ॥ हंसःपरमहंसश्च पश्चाद्योयःसउत्तमः । एकदण्डीभवेद्वापि त्रिदण्डीवापिवाभवेत् ॥ ७६ ॥ त्यक्त्वासर्वसुखास्वादं पुत्रैश्वर्यसुखंत्यजेत् ।
ग्राम वा नगर में एक स्थान में बसने से संन्यासी को दोष लगता है । कौपीन (लंगोटी) ओढ़ने का वस्त्र, जिस में शीत न लगे ऐसी कन्था (गुदड़ी) ॥७१॥ और खडाऊ इन को ग्रहण करे । इन से भिन्न वस्तुओं का संग्रह न करै । स्त्रियों के संग बोलना–स्पर्श–देखना ॥ ७२ ॥ नाचना, गाना, सभा करना सेवा ( नौकरी ) निन्दा–इन को त्याग दे वानप्रस्थ और गृहस्थ के संग यत्न से प्रीति को त्याग दे ॥ ७३ ॥ सब प्रकार के परिग्रह ( अर्जनरक्षणावा–योगक्षेमों ) को त्यागकर अकेला विचरै–मांगने और बिना मांगने से जो भोजन मिले उस से अपना निर्वाह करै ॥ ७४ ॥ अच्छा कह कर लेने को याचित बिना मांगे जो मिले उसे अयाचित कहते हैं ये संन्यासी चार प्रकार के होते हैं–१ कुटीचक–२बहूदक ॥ ७५ ॥ ३ हंस–४ परमहंस–इन में जो २ पिछला २ है वह २ उत्तम है एक दंड को धारण करै वा तीन दंड को ॥ ७६ ॥ सब सुखों के स्वाद को त्याग पुत्र के ऐश्वर्य ( प्रताप ) के सुख को त्यागे अथवा.